Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 38

सुभाषित

171 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

कोई भी व्यक्ति परिपूर्ण या सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकता है।
विनम्रता
अगर हम समाधान का हिस्सा नहीं है तो हम समस्या है।
चरित्र
आदत कभी भी अच्छी या बुरी नहीं होती, आदत सर्व बुद्धिमान इंसान को वश में कर लेती है। किसी चीज को पकड़ के बैठे रहना अपनी साँस रोकने के समान है।
अनासक्ति
बीस वर्ष की उम्र में इंसान अपनी इच्छा से चलता है, तीस में बुद्धि से और चालीस में अपने अनुभव से।
समय
परिवर्तन को स्वीकार करने में भी सकारात्मक सोच और थोड़ा जोखिम लेने की क्षमता होना आवश्यक है।
पुरुषार्थ
परिवर्तन के साथ, परिवर्तन की सही रफ्तार के साथ अपना कदम ताल जरूरी है।
समय
श्रेष्ठ परिणाम के लिए–सकारात्मक रवैया, आत्म विश्वास और कार्य योजना आवश्यक है।
पुरुषार्थ
कोई काम शुरू करने से पहले स्वयं से तीन प्रश्न करें–मैं ये काम क्यों कर रहा हूँ, इसके परिणाम क्या होंगे और क्या मैं सफल होऊँगा? जब गहराई से सोचने पर इन प्रश्नों के संतोष जनक उत्तर मिल जायें तभी आगे बढ़ें।
विवेक
यदि आप सच कहते हैं तो आपको कुछ याद रखने की जरूरत नहीं है।
सत्य
आप बच्चों को २० साल तक संस्कार दीजिए, वो आपको ८० साल तक सुख देंगे।
परिवार
इंसान चाहे तो जिंदगी के अंतिम पल तक अपने आपको व्यस्त रखकर कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों से बच सकता है।
स्वास्थ्य
वियोग संयोग का फल है अतः दुःख का मूल संयोग ही है इसलिए वियोग में दुःख न चाहने वाले संयोग में सुख न मानें।
अनासक्ति
यदि तुम्हें स्वाधीनता पसंद है तो दूसरों को भी अपने आधीन मत रखो।
चरित्र
लोग गहरी नींद में सोये हों तो दहाड़ और चिंघाड़ आवश्यक है।
पुरुषार्थ
यदि मन का हो जाए तो अच्छा और मन का न भी हो तो भी अच्छा ऐसी जिसकी मनःस्थिति है उसे कोई घटना दुःखी नहीं कर सकती है।
मन
सुबह मन में अशुभ विचारों की नो एन्ट्री २४ मिनट के लिए कर दो, वे २४ मिनट आपको २४ घंटे संभाल लेंगे।
ध्यान
आज के बच्चे सिखाने से नहीं करके दिखाने से सीखते हैं।
परिवार
जगत् और भगत क्रमशः साधनों और साधना में जीते हैं, एक को मौत दूसरे को मोक्ष मिलता है।
धर्म
अपने मन को जीतने वाले समस्त संसार को जीतने वाले से अधिक बलवान हैं।
मन
संसार की ऐसी कोई समस्या नहीं जो आपके मन की शक्ति से अधिक शक्ति शाली हो।
मन
एकाग्र मन मित्र है चंचल मन शत्रु है।
मन
अधिकांश बड़े लक्ष्य हासिल न हो पाने का कारण यह है कि हम छोटे कामों को करने में पहले अपना समय बिता देते हैं।
समय
यदि दुःखी रहना चाहते हो तो कोई व्यवस्था सम्भाल लो, बस उसी क्षण से दुःख अशान्ति प्रारम्भ हो जायेगी।
संतोष
शुद्ध विचारों की शक्ति वचन से बहुत अधिक है। अच्छा विचार खुशबू जैसा है।
मन
जो आपकी बात सुनते हुए इधर-उधर देखे उस पर विश्वास न करो।
विवेक
सुख देने वाले को स्वार्थ का त्याग करने पर ही पुण्य की प्राप्ति होती है।
दान
जो दूसरों की समाधि करवाता है उसकी नियम से समाधि होती है।
समाधि
जिन्दगी में जब मुसीबत आए, तो हो सके तो किसी से मदद मत माँगना क्योंकि मुसीबत चार दिन की और एहसान जिन्दगी भर का हो जाता है।
चरित्र
ज्यादा घनिष्ठता दुःखदायी होती है। विवेकी चिंतन करता है और अविवेकी चिंता करता है।
विवेक
जो प्राप्त करना चाहते हो वह देना शुरू करो।
दान
जहाँ हिम्मत समाप्त होती है वहाँ हार की शुरूआत होती है।
पुरुषार्थ
जिसकी नीति अच्छी होगी उसकी 'उन्नति' हमेशा होगी।
चरित्र
कमाएँ नीति से, दान करें प्रीति से, खर्च करें रीति से।
धन
छोटों की रक्षा करो क्योंकि छोटों के होने पर ही आप बड़े कहलायेंगे।
विनम्रता
जो व्यक्ति अपना हित चाहता है, उससे यदि भूल से भी भूल हो जाय तो वह भूल को भूल से भी भूलता नहीं है।
विवेक
आदमी को बादाम खाने से नहीं, जीवन में ठोकर खाने से अक्ल आती है।
ज्ञान
ईमानदार होने का अर्थ है, हजार मनकों में अलग चमकने वाला हीरा।
सत्य
अपने रहस्य गुप्त रखें अन्यथा ये एक दिन बर्बादी के कारण बनते हैं।
विवेक
हर कार्य समय पर करने वाला अपने लक्ष्य को पाता है।
समय
जो हमारी तारीफ करते हैं उन्हें हम हमेशा पसंद करते हैं, पर जिनकी हम तारीफ करते हैं, उन्हें हम हमेशा पसंद नहीं करते हैं।
मन
पुण्य छप्पर फाड़कर देता है, पाप थप्पड़ मार कर लेता है।
कर्म
किसी के गुजर जाने से किसी का गुजारा नहीं रुकता है।
अनासक्ति
मंत्र-मंत्रणा-औषधि जितनी गुप्त होगी उतनी प्रभावशाली होती है।
विवेक
अंदाजा लगाकर फैसला करना ना-इन्साफी है।
सत्य
पुण्य-पाप को छुपा के कर सकते हैं किन्तु छुपा के रख नहीं सकते हैं।
कर्म
कामना को सन्तुष्ट नहीं करना ही अच्छा है। उपेक्षा सबसे बड़ा दण्ड है।
संयम
सच और झूठ ज्यादा समय तक नहीं छुपता है। लायक वर्षों में बनता है नालायक एक क्षण में।
सत्य
दूसरों को नालायक कहने वाला कभी लायक नहीं हो सकता है।
विनम्रता
स्त्री शक्ति पर और पुरुष सौन्दर्य पर विश्वास करता है।
Misc.
शीतकाल में अग्नि, दूध का भोजन, राजा से सम्मान, इष्ट का दर्शन अमृत है।
Misc.
सर्वप्रथम माँ ही पूर्ण गुरु हैं, तत्पश्चात् गुरु ही पूर्ण माँ होते हैं।
परिवार
कामी, क्रोधी, लोभी, अहंकारी, मद्यपायी, व्यसनी सूर्योदय में भी नहीं देख पाते हैं।
संयम
लोहे को उसकी जंग नष्ट करती है, आदमी को उसकी सोच और घमण्ड नष्ट करता है। किसी से अपेक्षा नहीं रखना ही मेहनत का मूल्य है।
विनम्रता
आवश्यक समय पर ही शोभता है जैसे मुकुट सिंहासन पर ही शोभता है।
विवेक
राग में अवगुण दिखाई नहीं देते हैं, द्वेष में गुण दिखाई नहीं देते हैं।
अनासक्ति
ईमानदारी की जड़ें बहुत गहरी होती हैं। पुण्यात्मा सफल, पापात्मा असफल होता है।
सत्य
काम, अर्थ और यश में किया गया यत्न निष्फल भी हो सकता है पर धर्म कार्य के प्रारम्भ का संकल्प निष्फल नहीं होता क्योंकि मन में भाव आते ही पुण्य बंध प्रारम्भ हो जाता है।
धर्म
बदला लेना अपनी उन्नति में बाधाएँ खड़ी करना है।
क्षमा
जिसकी भवितव्यता निकट है उस पर ही जिनवाणी का प्रभाव पड़ता है।
कर्म
कार्य की सिद्धि पुरुषार्थ से होती है परन्तु होगी तभी जब भाग्य साथ देगा।
पुरुषार्थ