Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 38

सुभाषित

171 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

यदि आप अपने को तुच्छ, निर्धन क्षुद्र कीट मान बैठते हैं, तब आप वही हो जाएँगे।
मन
सौजन्य वह आवरण है जिससे कई पापों को ढँका जा सकता है।
चरित्र
सौजन्य से आत्मीयता पैदा होती है।
चरित्र
धार्मिक कर्तव्यों का अनुष्ठान, उत्साहपूर्वक धनोपार्जन, प्रसन्नतापूर्वक कामपुरुषार्थ में प्रवृत्ति, शरीर शुद्धि तथा दुष्टजनों के स्पर्श से उत्पन्न हुए दोषों को दूर करने के लिए स्नान किया जाता है।
धर्म
स्वाधीन होकर जियो, स्वाभिमान बढ़ेगा।
चरित्र
स्वाधीन की कुटिया अच्छी किन्तु पराधीनता का स्वर्ग भी अच्छा नहीं है।
चरित्र
दूसरों के लिए गड्ढा खोदने से पहले स्वयं उसमें उतरना पड़ता है।
कर्म
स्वयं को बदलने वाला ही संतोषी तथा सदाचारी हो सकता है।
चरित्र
बिना परिचय के किसी के साथ मजाक नहीं करना चाहिए।
वाणी
स्नान तन को, ध्यान मन को, दान धन को, योग जीवन को, प्रार्थना आत्मा को, व्रत स्वास्थ्य को, क्षमा रिश्तों को और परोपकार किस्मत को शुद्ध करता है।
धर्म
डूबता है तो पानी को दोष देता है, गिरता है तो पत्थर को दोष देता है, इंसान भी बड़ा अजीब है कुछ नहीं कर पाता तो किस्मत को दोष देता है।
कर्म
अगर किसी देश को भ्रष्टाचार मुक्त और सुंदर मन वाले लोगों का देश बनाना है तो, समाज के तीन सदस्य सक्षम हैं–माता-पिता और गुरु।
परिवार
ये आठ कभी दूसरों का दुःख नहीं समझते–१. राजा, २. वेश्या, ३. यमराज, ४. अग्नि, ५. छोटा बच्चा, ६. चोर, ७. भिखारी, ८. कर वसूल करने वाला।
Misc.
लक्ष्मी उद्योग के अनुसार, कीर्ति दानानुसार, विद्या अभ्यास अनुसार, बुद्धि कर्मानुसार होती है।
कर्म
अपने दुश्मन को हजार मौके दो कि वो आपका दोस्त बन जाये, लेकिन अपने दोस्त को एक भी ऐसा मौका न दो कि वो आपका दुश्मन बन जायें।
संगति
जिसने व्याकरण नहीं पढ़ा वह जन्मान्ध है, जो न्यायशास्त्र से रहित है वह गूँगा है, जो साहित्य से रहित है वह लँगड़ा है और जो कोष से रहित है, वह निर्धन है।
ज्ञान
प्रार्थना से आन्तरिक शक्ति बढ़ती है।
भक्ति
जिसकी वाणी व्याकरण से शुद्ध नहीं है और जिसकी बुद्धि नयों से शुद्ध नहीं है वह पुरुष दूसरों के भरोसे क्लेश उठाते हुए अन्धे के समान है।
ज्ञान
खेती से दुर्भिक्ष नहीं होता, जाप से पाप नहीं होता, मौन से कलह नहीं होती और जागने से भय नहीं होता है।
पुरुषार्थ
रोग उत्पत्ति के चार कारण–अधिक खाना, अधिक सोना, अधिक विषय सेवन, मलमूत्र का निरोध।
स्वास्थ्य
अच्छे नेता और नेता बनाने की चेष्टा करते हैं, बुरे नेता अनुयायी बनाने की चेष्टा करते हैं।
चरित्र
जो व्यक्ति एक पाठशाला खोलता है वह एक जेल खाना बंद कर देता है।
ज्ञान
अच्छी जिंदगी जीने के दो तरीके हैं, जिसे पसंद करते हैं उसे हासिल कीजिए या फिर जो हासिल है उसी को पसंद करना शुरू कर लीजिए।
संतोष
शीशा पत्थर साथ रहें तो बात नहीं घबराने की। बस इतना सा ध्यान रहें कि जिद न हो टकराने की ॥
परिवार
धरम रहे अरु धन बचे, रोग समूल नशाय। ऐसे लाभ उठाइए, देसी औषध खाय ॥
स्वास्थ्य
जो जितनी अधिक खुशामद चाहेगा या करावेगा उसे उतना ही परेशान होना पड़ेगा।
विनम्रता
प्रशंसा मुक्ति नहीं बंधन है।
अनासक्ति
किसी से कुछ नहीं चाहना ही सुख और दूसरे से आशा करना ही दुःख है।
संतोष
बदमाशी, चालाकी, कूटनीति आदि का ज्ञान तो ठीक है परन्तु उस ज्ञान का उपयोग ढाल की तरह स्वयं की रक्षा के लिए करना चाहिए तलवार की तरह दूसरों के घात के लिए नहीं।
विवेक
ख्याति की चाह न करने वाला ही सच्चा अध्यात्म योगी व सुखी होता है।
अनासक्ति
व्यक्ति का स्वभाव समझकर अनुकूल व्यवहार करने से किसी को संक्लेश नहीं होता है।
विवेक
नियत दान देने वालों के आवश्यक खर्चों में कभी कमी नहीं आती है।
दान
तुम्हारे द्वारा यदि दूसरों को लाभ होता हो, उसमें उनका भविष्य व सौभाग्य अन्तरंग कारण समझो, एहसान का भाव मत रखो।
दान
सम्पत्ति होने पर तृष्णा से, व्यवस्था से, भय से सदैव आकुलित होता है और विपत्ति आने पर घबड़ाकर दुःखी होता है।
धन
प्रशंसा में अपने आपके स्वरूप को भूलकर व प्रशंसा करने वालों के अनुकूल चर्या बनाकर और कष्ट उठाकर व्याकुल बनना पड़ता है।
विनम्रता
कायर पुरुष शस्त्रधारी होने पर भी वैरी का घात नहीं कर सकता, उसी प्रकार विषय-कषायी व्यक्ति बहुत ज्ञान होने पर भी दुर्गति के दुःख नष्ट नहीं कर सकता है।
संयम
इनका मुझ पर बड़ा स्नेह है, यह सोचना भ्रम है यदि परीक्षा करनी हो तो उनके प्रतिकूल होकर देख लीजिए।
अनासक्ति
अपने दुःखी होने में जो अपना अपराध सोचते हैं? वे व्याकुल नहीं होते और जो पर का अपराध सोचते हैं वे बिना विपदा दुःखी बने रहते हैं।
विवेक
दोष ही दिखाई दें तो 'अपने' और गुण दिखें तो 'पर के' तभी कल्याण हो सकता है।
विनम्रता
बाह्य चरणानुयोग के विषय में किसी समूह में बैठकर चर्चा करना झगड़ा मोल लेना है।
वाणी
निःस्वार्थ सेवा में तत्पर रहने से लोक प्रियता आती है।
दान
जब हम दूसरों का अपमान करते है तो स्वयं का सम्मान खोते हैं।
विनम्रता
लोक व्यवहार निभाते समय सबके हित का ध्यान रखना मनुष्य जीवन में ऊँचे उठने का यह एक मन्त्र है।
चरित्र
धन, शक्ति और दक्षता केवल जीवन के साधन है खुद जीवन नहीं।
धन
बिना हथौड़े की चोट के पत्थर भी भगवान् नहीं बनता है।
पुरुषार्थ
प्रत्येक लक्ष्य का अंतिम लक्ष्य सुख-शान्ति प्राप्त करना है।
संतोष
हर सफल व्यक्ति खुश और सुखी हो जरूरी नहीं है।
समृद्धि
जिस क्षण आप उन चीजों को करना छोड़ देते हैं जो आपको पर्वत के शिखर तक ले गयी उसी क्षण आप नीचे घाटी में गिरना शुरू कर देते हैं।
पुरुषार्थ
अगर कार्यक्षेत्र अपनी पसंद और रुचि का है तो आप जीवन में सफल होंगे।
समृद्धि
अगर आप जीवन में योजना बनाने में विफल रहे तो आपने विफल होने की योजना बना ली है।
पुरुषार्थ
तैयारी करने में फैल होना फैल होने की तैयारी करना है।
पुरुषार्थ
आप सही का चुनाव कर अमीर नहीं बन सकते लेकिन आप अमीर है तो लोग आपको सही अवश्य कहेंगे।
धन
डरपोक अपनी मृत्यु से पहले कई बार मरते हैं, बहादुर मौत का स्वाद बस एक बार चखते हैं।
चरित्र
आप किसी व्यक्ति की गहराई का अंदाजा उसके परिवेश से आसानी से लगा सकते हैं निवास का पता बताते ही व्यक्ति का मूल्य समझ में आता है।
संगति
प्रसंग के अनुसार परिधान का चयन आवश्यक है।
विवेक
अगर आपका घर अमीरों के बीच है तो आपकी सोच अमीरों जैसी होगी।
संगति
अच्छी लोकेशन में घर होने से बच्चों को संस्कार भी अच्छे मिलेंगे क्योंकि बच्चे काफी वक्त घर के बाहर कालोनी में बिताते हैं।
परिवार
हमारी वाणी, विचार और व्यवहार पर हमारे जीवन की सफलता निर्भर करती है।
चरित्र
सृष्टि ने हर इंसान को सब कुछ समान दिया है लेकिन जिसने अपनी सोच को बड़ा रखा वह बहुत आगे निकल गया है।
मन
जिस व्यक्ति ने कभी गलती नहीं की उसने कभी कुछ नया करने की कोशिश नहीं की है।
पुरुषार्थ