Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 38

सुभाषित

171 सूत्र · पृष्ठ 3 / 3

स्वयं की गलतियों को स्वीकार करना स्वयं की उम्र बढ़ाना है।
विनम्रता
जिस घर में कार्य करने के पहले बड़ों से सलाह नहीं ली जाती उन्हें बाद में वकीलों से सलाह लेना पड़ती है।
परिवार
चिन्ता करोगे तो भटक जाओगे, चिंतन करोगे तो भटके हुए को रास्ता दिखाओगे।
मन
कार्य की सिद्धि चिंता से नहीं पुण्य एवं पुरुषार्थ से होती है।
पुरुषार्थ
यदि दुःख नहि चाहते तो संसार से सुख मत चाहो।
अनासक्ति
जो दूसरों के दुःख से दुःखी होता है, उसको अपने दुःख से दुःखी नहीं होना पड़ता है।
अहिंसा
दुर्जन निंदा के बिना नहीं रहता, जैसे कुत्ता सब रसों को खाकर भी विष्ठा के बिना संतुष्ट नहीं होता है।
वाणी
मेरे लिए पर के दोष अहितकारी नहीं हैं अपितु पर के गुण हितकारी हैं किन्तु मेरे स्वयं के दोष मेरे लिए अहितकारी हैं।
विवेक
कोई व्यक्ति इतना अमीर नहीं होता की अपना गुजरा समय खरीद सके और न कोई इतना गरीब होता है कि अपना आने वाला कल न बदल सके।
समय
प्रमाद से त्याग रूप धन नष्ट हो जाता है।
पुरुषार्थ
जो पूर्वापर विचार कर निर्णय लेता है सफलता उसके चरण चूमती है।
विवेक
जो अनुभव विहीन होता है, रीति-नीति से शून्य होता है, वह अवसर और साधन मिलने पर भी इष्ट कार्य की सिद्धि नहीं कर पाता है।
विवेक
एक सच्चा नेता लोगों के विचारों के पीछे नहीं चलता बल्कि वह लोगों के विचारों को बदल देता है।
चरित्र
परधन, परस्त्री त्रिजगत् निन्द्य हैं।
चरित्र
प्रज्ञावान वही व्यक्ति है, जो सुनता अधिक और बोलता कम है।
वाणी
प्रज्ञाशील लोग सर्वप्रथम सामने वाले की बात को पूर्ण सुनते हैं, तदुपरांत ही अपना मौन खोलते हैं, निज प्रज्ञा का परिचय प्रज्ञापूर्वक ही देना शोभनीय है।
वाणी
पराधीनता नरक के समान दुःखदायी होती है।
संयम
वीर का परिचय वीरता से, ज्ञानी का परिचय वाणी से, साधु का साधना से परिचय होता है।
चरित्र
जो पाप में तैरता है, वह दुःख में अवश्य डूबता है।
कर्म
जिस व्यक्ति का पुण्य क्षीण हो जाता है, उसके पवित्र विचार भी नष्ट हो जाते हैं।
कर्म
मन के जुड़े बिना मन्त्र प्रभाव हीन हो जाते हैं।
णमोकार
यदि मन वश में हो गया तो इन्द्रियों से कभी पाप नहीं हो सकता है।
मन
जीवन में यदि बुरा वक्त नहीं आता है तो अपने में छिपे गैर और गैरों में छिपे हुए अपने नजर नहीं आते हैं।
विवेक
अपनी प्रशंसा, पर की निंदा, महापुरुषों से ईर्ष्या और असम्बद्ध अप्रासंगिक एवं बहुत बोलना, ये कार्य अपने आपको नीचे गिरा देते हैं।
चरित्र
वाचालता अल्पज्ञता की पहचान है।
वाणी
विचार बीज की तरह होते हैं, जैसा बीज बोओगे वैसा-वैसा फल पाओगे।
मन
विरोध गुणी और प्रसिद्धि का मापदण्ड है।
विविध
स्त्री का चाम नहीं काम प्यारा होता है, इसलिए स्त्री परिवार में सेवा करके घर को स्वर्ग बना देती है।
परिवार
स्नेह रहित मनुष्य सुखी होता है और स्नेह सहित दुःखी होता है क्योंकि जैसे बालू को कोई नहीं पेलता परन्तु तेल सहित तिल को घानी में पेला जाता है।
अनासक्ति
स्वर्ग-नरक स्वयं के भीतर है जैसा सोचोगे वैसा पाओगे। जिस घर में बड़े-छोटे की मर्यादा है, वह घर स्वर्ग है।
परिवार
व्यक्ति को परखने की कसौटी उसके आचार-विचार हैं।
चरित्र
अगर आज आप समय को बर्बाद करोगे तो कल समय आपको बर्बाद कर देगा।
समय
उथला पानी, उथला ज्ञान, उथला संयम समय पाकर ये सभी जल्दी सूख जाते हैं।
ज्ञान
सम्मान से जीने का महान् तरीका है कि हम वो बनें जो हम होने का दिखावा करते हैं।
चरित्र
संकल्प से रहित व्यक्ति शून्य है पूर्ण नहीं, संकल्प के दृढ़ होने पर 'शक्ति' स्वयं आती है।
पुरुषार्थ
असत्य बोलने से मनुष्य विकृत जीभ वाले गधा, ऊँट, बिलाव, काग, विवेक रहित, मूर्ख तथा गूँगे होते हैं।
सत्य
झूठे दिलासे से स्पष्ट इंकार बेहतर है।
सत्य
सत्य शान्त होता असत्य शोर मचाता है।
सत्य
हठ प्रारम्भ में प्रभावी लगता है, सत्य अन्त में विजय पाता है।
सत्य
सत्य पर नहीं चलना शरीर या मन की कमजोरी है पर स्वीकार नहीं करना यह श्रद्धा की कमी है।
सत्य
सत्य वाणी संयम पर आधारित है।
सत्य
संसार में जितने जीव दुःखी हैं, हो रहे हैं, होंगे, वे सब संयोग का फल भोग रहे हैं।
कर्म
संसार में अपमान सबसे बड़ा दण्ड है।
विविध
संसार असत्य हो या सत्य पर उससे हमारा सम्बन्ध निःसंदेह असत्य है।
अनासक्ति
ध्यान रखना सुख वस्तु से नहीं संतुष्टि से मिलता है, जिसे जिसमें संतुष्टि है उसे उसमें सुख है।
संतोष
आहार, भय, मैथुन, परिग्रह ये संज्ञायें सम्यग्ज्ञान को नष्ट कर डालती हैं।
ज्ञान
धैर्य के बिना लक्ष्मी नहीं मिलती, शूरता के बिना विजय नहीं मिलती, दान के बिना यश नहीं मिलता, ज्ञान के बिना मोक्ष नहीं मिलता है।
पुरुषार्थ
कोई भी चीज अपने न्याय नीति से कमाये पैसों से खरीदो तो शौक अपने आप कम होंगे।
संतोष
सुन्दरता की तलाश में चाहे आप सारी दुनिया का चक्कर लगा आयें लेकिन सुन्दरता अगर आपके अन्दर नहीं तो कहीं नहीं मिलेगी।
चरित्र
जिन्होंने दूसरों की राहों में अन्धेरे बिछाये हैं, उन्हें कभी उजाले नहीं मिल पाये हैं।
कर्म
सुख ही शान्ति है यह भ्रम है, शान्ति ही सुख है यह सच है।
संतोष