Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 37

कुटिल नीति पर नहीं, धर्म नीति पर चलें

186 सूत्र · पृष्ठ 3 / 4

जो सदा हमारे साथ नहीं रहेगा और हम सदा जिसके साथ नहीं रहेंगे, उसको प्राप्त करने की इच्छा करना अथवा उससे सुख लेना मूर्खता है, पतन का कारण है।
अनासक्ति
जो दूसरों की आजादी छीनता है, वही वास्तव में कायर है।
चरित्र
शुरूआत किसी भी कार्य का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है।
पुरुषार्थ
क्रोध, पानी और मन सदा नीचे की ओर बहता है।
मन
कठोरता एक कमजोर आदमी की झूठी ताकत है।
क्षमा
कुदरत ने हमें ऐसा बनाया है कि हम अपनी पीठ नहीं देख सकते और उसे दूसरे ही देख पाते हैं इसलिए दूसरा जो कुछ देखता है, उससे हमें फायदा उठाना चाहिए।
विनम्रता
लोगों को उनकी गलतियाँ सीधे तरीके से न बतायें।
वाणी
मनुष्य को अपनी गलती निःसंकोच स्वीकार कर लेनी चाहिए।
विनम्रता
हमारी जिंदगी इतनी लंबी नहीं है कि हम सिर्फ अपनी ही गलतियों से सीखें, अतः बुद्धिमानी इसी में है कि दूसरों की गलतियों से भी सीख लें।
ज्ञान
देशकाल परिस्थिति के अनुसार चिन्तन को नया स्वरूप देते रहना चाहिए न कि पुरानी प्रशंसाओं में डूबना चाहिए।
ज्ञान
जो धर्म के पीछे दौड़ता है, धन उसके पीछे दौड़ता है।
धर्म
नैतिक मूल्यों का पतन ही आज की राजनैतिक और सामाजिक अव्यवस्था का मूल कारण है।
चरित्र
अन्याय की भूमि पर न्याय की फसल पैदा होना असंभव है।
सत्य
न्याय पुस्तकों को पढ़कर नहीं, अपराधी के हालातों को देखकर करना चाहिए।
सत्य
मनुष्य में आधे गुण तो तभी विदा हो जाते हैं, जब वह दासता ग्रहण करता है।
चरित्र
दुःखी व्यक्ति ही दूसरे को दुःख देता है। पराधीन व्यक्ति ही दूसरे को अपने अधीन करता है।
मन
मधुर वाणी से सबको सींचना सीखो। मधुर व्यवहार से सबको खींचना सीखो ॥ क्रोध की जीत से हर हार अच्छी है। अगर किसी का दिल जीतना है तो प्रेम करना सीखो॥
वाणी
बड़ों के कहने का नहीं, व्यवहार का असर पड़ता है। माँ की शिक्षाओं का नहीं, दुलार का असर पड़ता है ॥ तुमने तो चाबी उल्टी पकड़ ली है, ताला कैसे खुले। आदमी पर फटकार का नहीं, प्यार का असर पड़ता है ॥
परिवार
जब गंध अधिक बढ़ती है, तब बाग उजड़ जाते हैं। जब आवाज अधिक बढ़ती है, तब राग बिगड़ जाते हैं ॥ क्योंकि हर चीज की एक सीमा होती है बन्धुओं! जब स्वार्थ अधिक बढ़ता है, तब व्यवहार बिगड़ जाते हैं ॥
संयम
मानव को क्रोध से नहीं प्रेम से जीतो। क्रोध को क्रोध से नहीं क्षमा से जीतो ॥ आप यदि किसी का दिल जीतना चाहते हो। तो अधिकार से नहीं, समर्पण व प्रेम से जीतो ॥
क्षमा
किसी की तरफ न देखना या मुँह से न बोलना, यह उसका सबसे बड़ा तिरस्कार है।
वाणी
निरोग रहना, ऋणी न होना, परदेश में न रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल होना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निडर होकर रहना; ये छह मनुष्य लोक के सुख हैं।
संतोष
ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, असन्तोषी, क्रोधी, सदा शंकित रहने वाला और दूसरे के भाग्य पर जीवन निर्वाह करने वाला; ये छह सदा दुःखी रहते हैं।
संतोष
जो व्यक्ति नास्ता लिए बिना लम्बे मार्ग पर चल देता है वह चलता हुआ भूख-प्यास से पीड़ित होकर दुःखी होता है, इसी प्रकार जो व्यक्ति धर्म किए बिना परभव में जाता है वह व्याधि रोग से पीड़ित एवं दुःखी होता है।
धर्म
साहस, कायरता और हँसी छूत की बीमारी के समान हैं।
संगति
बुद्धि यह है कि अपने कानों की अपेक्षा अपनी आँखों पर भरोसा करो।
विवेक
निरर्थक कलह करना मूर्खों का काम है, बुद्धिमानों को इसका त्याग करना चाहिए, ऐसा करने से लोक में यश मिलता है और अनर्थ का सामना नहीं करना पड़ता।
क्षमा
अभिप्राय समझने वाला व्यक्ति ही बुद्धिमान होता है।
ज्ञान
बुद्धिमान मनुष्य अपने अनुभवों से सीखता है किन्तु और महान् दूसरों के अनुभवों से भी सीखता है।
ज्ञान
पृथ्वी पर अत्यन्त बुद्धिमान मनुष्य तीन में से एक को अवश्य प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं-अल्प आयु वाला या दरिद्र अथवा सन्तान हीन होता है।
कर्म
यदि आप अच्छा बनना चाहते हो तो अपने आपको सबसे बुरा समझो।
विनम्रता
जो दूसरों में डर का संचार करता है, वह स्वयं सदैव डर से आतंकित रहता है।
मन
बीती बातों को भुला देने में ही आपकी भलाई है।
समय
अपने अन्दर की शान्ति व शक्ति को पहचानिए इसी में भलाई है, जो बात अच्छी न लगे उस पर प्रतिक्रिया मत कीजिए, क्षण भर के लिए चुप रहिए।
मन
भविष्य को समझने के लिए अतीत का अध्ययन करना आवश्यक है क्योंकि हमें वही गलतियों से बचाता है।
समय
जो मनुष्य अपना भेद अपने सेवक को बताता है, वह सेवक को अपना स्वामी बना लेता है।
विवेक
वह भेद जिसे तुम गुप्त रखना चाहते हो, किसी से न कहो, चाहे वह तुम्हारा परम विश्वासी क्यों न हो, गुप्त बात को जितनी अच्छी तरह आप स्वयं छिपा सकते हैं, दूसरा न छिपा सकेगा।
विवेक
युद्ध मानव-जाति का विनाशक है, अतः उससे बचने के सभी उपाय काम में लिए जाने चाहिए।
अहिंसा
आपका घर उतना ही बड़ा होना चाहिए जिसकी आप स्वयं देखभाल कर सकें, स्वच्छ साफ-सुथरा रख सकें।
परिवार
रहस्य उसी पर प्रकट हो सकता है जिसे तीव्र अंतर्दृष्टि प्राप्त है और जो एक मिनट भी व्यर्थ नहीं खोता है।
ध्यान
तौलने से अनाज की रक्षा होती है, फेरने से पान की रक्षा होती है, बारम्बार देखभाल करने से गौओं की रक्षा होती है, मैले वस्त्रों से स्त्रियों की रक्षा होती है, संयम से आत्मा की रक्षा होती है, बाड़ी से खेत की रक्षा होती है और अच्छे संस्कारों से परिवार की रक्षा होती है।
संयम
आपत्ति के लिए धन की रक्षा करें, धन के द्वारा स्त्री की रक्षा करें और स्त्री एवं धन दोनों के द्वारा सदा अपनी रक्षा करें।
धन
राजनीति कहती है–हाथ आए दुश्मन को छोड़ना और अपनी हार खरीदना एक ही चीज के दो नाम हैं। यदि जनता की पहुँच नेता तक हो और नेता हित, मित, प्रिय वचन बोलता हो तो वह नेता नेताओं का शिरोमणि बन जाता है।
चरित्र
प्रजातंत्र का अर्थ है कि उसमें निम्न से निम्न और उच्च से उच्च मानव को प्रगति का समान अवसर मिले।
Misc.
अच्छी बातों को ग्रहण कीजिए फिर चाहे वे किसी की भी क्यों न हो।
ज्ञान
आपका विचार तभी तक आपका है जब तक आप दूसरों के सामने प्रकट न करो।
विवेक
न इतने नरम बनो कि निचोड़े जाओ और न इतने सख्त बनो कि तोड़े जाओ।
चरित्र
विपत्ति के आने पर अपनी रक्षा के लिए व्यक्ति को अपने पड़ोसी शत्रु से भी मेल कर लेना चाहिए।
विवेक
स्त्री, धूर्त, आलसी, डरपोक, क्रोधी, पुरुषत्व के अभिमानी, चोर, कृतघ्न और नास्तिक का विश्वास नहीं करना चाहिए।
विवेक
व्यक्ति नीति के पथ पर जितना आगे बढ़ेगा आत्मा का उतना ही विकास होगा।
चरित्र
ऋण, अग्नि, शत्रु और द्वेष को कभी बढ़ने नहीं देना चाहिए।
विवेक
शान्ति कायम रखने का सर्वाधिक प्रभावशाली तरीका युद्ध के लिए तैयार रहना है।
Misc.
खून का दाग खून से नहीं धुलता, उत्तेजना-उत्तेजना से शांत नहीं होती, हमें स्वयं शांत होना होगा।
क्षमा
जो सद्गुरु से प्राप्त हो जाता है, वह शास्त्रों से प्राप्त नहीं हो सकता।
ज्ञान
जब सब तरकीबें असफल हो जाएँ, तो सच बोल दीजिए।
सत्य
वही समाज सदैव सुखी रह सकता है जिसने नैतिक गुणों को अपने जीवन में आत्मसात कर लिया है।
चरित्र
अत्यधिक संसर्ग से किसका अनादर नहीं होता? 'अतिपरिचयादवज्ञाः'।
संगति
किसी के सम्मान को भरी सभा में नष्ट करना मृत्यु के समान कष्टकारी है।
वाणी
धर्म, काम और अर्थ सम्बन्धी कार्यों को करने से पहले न बताएँ, करके ही दिखाएँ, ऐसा करने से अपनी मंत्रणा दूसरों पर प्रकट नहीं होती है।
विवेक
जिस प्रकार दवा चाहे वह कड़वी क्यों न हो रोग दूर कर देती है, उसी प्रकार सहृदयतापूर्ण सलाह चाहे वह कितनी ही कटु क्यों न हो, हमें सही रास्ता दिखाती है।
ज्ञान