Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 37

कुटिल नीति पर नहीं, धर्म नीति पर चलें

186 सूत्र · पृष्ठ 2 / 4

अनुभव के बिना बोलना विनाश का कारण होता है।
वाणी
अनुभव मनुष्य का सबसे अच्छा अध्यापक होता है, पर मूर्ख लोग इससे कुछ नहीं सीख पाते हैं।
ज्ञान
अत्यधिक अनुशासन से व्यक्ति विद्रोही बन जाता है।
संयम
अन्याय में सहयोग करना अन्याय करने के ही समान है।
सत्य
अपराध को दण्ड से नहीं, विवेक से रोको।
विवेक
दूसरों की गलती पर स्वयं को सजा देना और स्वयं की गलती पर दूसरों को सजा देना सबसे बड़ा अपराध है।
क्षमा
अभिप्राय समझे बिना बे-मतलब किसी बात पर टीका-टिप्पणी करना वैसा ही है जैसे एक गधा दूसरे गधे की आवाज सुनकर रेंकने लगता है।
वाणी
अच्छाई का अभिमान बुराई की जड़ है।
विनम्रता
स्वार्थ और अभिमान का त्याग करने से साधुता आती है।
विनम्रता
अमीर लोगों की सिर्फ सुविधाएँ मत देखें उनके अन्दर की दुविधाएँ समझें, जिन्हें वे छिपाए बैठे हैं।
विवेक
आँखों से गिरा आँसू और नजरों से गिरा इंसान कभी नहीं उठ सकता है।
चरित्र
आँसुओं को देखकर कठोर पत्थर हृदय भी पिघल जाता है।
मन
अनुशासन हीनता और आचरण हीनता ही देश की गरीबी का सबसे बड़ा कारण है।
चरित्र
जैसे व्यवहार की तुम दूसरों से अपेक्षा रखते हो वैसा ही व्यवहार तुम दूसरों के प्रति भी करो। यदि अपनी दुर्दशा से बचना हो तो दुराचरण मत करो।
चरित्र
कामयाबी के लिए जरूरी है–जो सलाह आप दूसरों को देते हैं, उस पर पहले खुद अमल करें।
समृद्धि
विश्व में व्यक्ति को जाति भाई ही तैराते हैं और जाति भाई ही डुबोते भी हैं, जो सदाचारी हैं, वे तैराते हैं और जो दुराचारी हैं, वे डुबो देते हैं।
संगति
सच्चा बोल (एक दाम) और सच्चा तोल 'व्यापार उन्नति' का मार्ग है।
सत्य
जो जैसा होता है उसे दूसरे भी वैसे ही नजर आते हैं।
मन
बिना आत्मविश्वास का आदमी उस बूँद के समान है जो समुद्र से दूर हो चुकी है और जिसका नष्ट होना निश्चित है।
पुरुषार्थ
आत्मविश्वास के अभाव में परमात्मा भी आपकी मदद नहीं कर सकते हैं।
पुरुषार्थ
बुरी आदतों से क्षुद्रता का आभास होता है।
चरित्र
क्रोधाग्नि, कामाग्नि, जठराग्नि और दावाग्नि को जीतने वाला ही आनंद को प्राप्त करता है। सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति कोमलता के भाव, गुणों में दोष न देखना, क्षमा, धैर्य और मित्रों का अपमान न करना तथा संयमपूर्वक रहना ये सब गुण आयु को बढ़ाने वाले हैं।
संयम
प्रभु का भूषण क्षमा, स्त्री का आभूषण लज्जा, सैनिक का भूषण शौर्य तथा तपस्वियों का आभूषण वैराग्य है।
क्षमा
जब कोई मनुष्य किसी दूसरे के दोषों पर अँगुली उठाता है तो उसे ध्यान रखना चाहिए कि उसकी शेष तीन अँगुलियाँ उसी की ओर संकेत कर रही होती हैं।
विवेक
इज्जत जब चली जाती है तो लाखों प्रशंसाओं से भी वापस नहीं आती है।
चरित्र
ईमानदारी की जड़ें बहुत गहरी होती हैं।
सत्य
घृणा से घृणा को नष्ट नहीं किया जा सकता। घृणा को दूर करने के लिए स्नेह की आवश्यकता है।
अहिंसा
प्रेम कहता है आगे बढ़ो और प्रतिस्पर्धा कहती है कि मेरे पीछे रहो।
चरित्र
घृणा व द्वेष से ग्रसित व्यक्ति दूसरों को सुख नहीं पहुँचा सकता है।
क्षमा
ईर्ष्या अपनी हीनता के बोध से जन्म लेती है और वह उस हीनता को दूर नहीं करती, सिर्फ दबाती है। ईर्ष्या रखने वाले मनुष्य को इतना दुःख अपनी असफलता पर नहीं होता जितना दुःख दूसरे की सफलता देखकर होता है।
क्षमा
जिस आदमी के भीतर घृणा है, उसके लिए सारा जगत् शत्रु हो जाता है और जिस आदमी के भीतर प्रेम होता है, उसके लिए सारा जगत् मित्र हो जाता है।
अहिंसा
स्त्रियाँ सिर्फ ईर्ष्या से दुःखी होती हैं।
क्षमा
टकराव टालिए क्योंकि टकराव ही बिखराव का कारण है।
क्षमा
ईर्ष्या की आग को बुझा दीजिए नहीं तो यह आपको जलाकर राख कर देगी।
क्षमा
दूसरे के गुण देखना-दोष न ढूँढ़ना उन्नति का मार्ग है।
विवेक
अति क्रोध, कटुवाणी, दरिद्रता, बंधु से वैर, नीच की संगत और अकुलीन की सेवा नरक में रहने वाले के चिह्न हैं।
क्षमा
मनुष्य के जीवन की सफलता इसी में है कि वह उपकारी के उपकार को कभी न भूले, उसके उपकार से भी बढ़कर उसका उपकार कर दे।
चरित्र
सबके मन की तो वह तीन लोक के नाथ भी नहीं कर सकते हैं।
संतोष
धर्मात्माओं के उपदेश एक दृढ़ लाठी के समान हैं क्योंकि वह पतन से बचाते हैं।
धर्म
गुण के बिना रूप व्यर्थ, होश न हो तो जोश व्यर्थ, भूख न हो तो भोजन व्यर्थ और सदुपयोग न हो तो धन व्यर्थ ही समझें।
चरित्र
उपसर्ग करने वाला नहीं उपसर्ग सहने वाला सदा याद किया जाता है।
संयम
कर्ज लेना कष्ट लेना है।
धन
उधार लेकर खाना उस प्रकार है जैसे घास जलाकर ठंडी दूर करना, किंचित् दुःख दूर करता है बाद में दुःख का ही कारण है।
धन
कर्ज लेने की आदत गरीबी को निमंत्रण देती है।
धन
कर्ज लेने की आदत से बचो, यदि लेना ही पड़े तो समय पर चुकाओ। कर्ज लेना भी भिक्षावृत्ति के समान है।
धन
ऋण पत्थर की चट्टान से भी भारी होता है।
धन
कर्ज को दोस्ती की कैंची कहते हैं।
धन
अपना कार्य इस तरह कीजिए कि वह आपकी पहचान बन जाए।
पुरुषार्थ
अपने कर्तव्य में प्रयत्नशील रहना और चुप रहना बदनामी से बचने का सबसे अच्छा तरीका है।
पुरुषार्थ
व्यक्ति को अपने घर की दुरावस्था आगन्तुकों के समक्ष प्रकट नहीं करना चाहिए।
परिवार
जो काम घड़ों जल से नहीं होता, उसे दवा के दो घूँट कर देते हैं।
विवेक
योजना धैर्य से बनाइये और काम पूरी गति से कीजिए।
पुरुषार्थ
यदि पहली बार में सही काम करेंगे तो सीखेंगे कैसे?
पुरुषार्थ
चालाकी द्वारा कभी कोई बड़ा काम नहीं होता है।
चरित्र
जो छोटे-छोटे कामों के पीछे बहुत ज्यादा पड़े रहते हैं, वे अक्सर बड़े कामों के लिए नाकाबिल बन जाते हैं।
पुरुषार्थ
हमेशा अपने काम से काम रखें, व्यर्थ के विवाद में न पड़े।
वाणी
आत्मा जिस कार्य से सहमत नहीं, उस कार्य को करने में शीघ्रता मत करो।
विवेक
उसी कार्य को करना ठीक है जिसे करके पछताना न पड़े।
विवेक
जो काम वचन से नहीं हो पाता वह युक्ति से शीघ्र हो जाता है।
विवेक
जिसके भीतर कोई भी इच्छा नहीं होती, उसकी आवश्यकता की पूर्ति प्रकृति स्वतः करती है।
संतोष