Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Speech

वाणी

450 सूत्र · पृष्ठ 6 / 6

शान्ति है अभिप्राय जिनका ऐसे भगवान के निर्दोष वचन जितने शीतल होते हैं, उतना शीतल न चन्द्रमा होता है, न चन्दन, न गङ्गा का जल और न ही स्फटिक का हार शीतल होता है।
वाणी
भाषण जिव्हा की खुजलाहट और बौद्धिक व्यापार है और प्रवचन जीवन का निचोड़ है, प्रवचन में विद्वत्ता नहीं हार्दिकता होती है।
वाणी
चुगली, निन्दा, हास्य, कठोर, झूठ, प्रलापरूप तथा और भी शास्त्र विरुद्ध वचन निन्द्य कहलाते हैं। हास्यगर्भ– एक अप्रैल को लोग झूठ बोलकर हँसी उड़ाते हैं अथवा जिन वचनों से किसी की हँसी उड़ाई जा रही हो। कर्कश– पवनञ्जय ने अञ्जना से कहा मरजा, मुख न दिखा ये कर्कश वचन कहलाते हैं। प्रलपित– असीमित बोलना। उत्सूत्र-बच्चों को गाली देना, आगम विरुद्ध बोलना। सावद्य– नाक कान आदि के छेदन के वचन कहना। मारण– बच्चों आदि को मारना। वाणिज्य– पाप वर्धक व्यापार के वचन बोलना, जैसे साबुन, माचिस आदि के बेचने को कहना।
वाणी
सात मील चलने के बराबर एकघण्टे बोलने में शक्ति का व्यय होता है।
वाणी
मौन रहो तो मूरख कहते, बोलो तो वाचाल। नहीं बोलो तो गूँगा कहते, ये दुनिया का हाल।।
वाणी
जन्म के साथ जीभ तो मिल जाती है पर जीवन बीत जाने पर भी उसका सदुपयोग करने की कला नहीं आ पाती है।
वाणी
मर्म घातक एक वाक्य ही सारे उपकार को नष्ट कर देता है।
वाणी
अन्धों के अन्धे होते हैं, इतना बोलने से महाभारत हो गया, अतः हर शब्द सोच कर बोलना चाहिए।
वाणी
जो छेदन, भेदन, मारण, शोषणयुक्त व्यापार या चोरी आदि के वचन हैं वे सब पाप युक्त वचन हैं।
वाणी
जो वचन दूसरे जीवों को अप्रीति, भय, खेद, वैर, शोक तथा कलह कारक एवं अन्य भी सन्ताप कारक हों वे सभी अप्रिय वचन जानना चाहिए। ये सभी प्रकार के वचन असत्य के अन्तर्गत आते हैं इन वचनों को नहीं बोलना चाहिए।
वाणी
जीभ पर लगी चोट सबसे जल्दी ठीक होती है पर जीभ से लगी चोट मुश्किल से ठीक होती है।
वाणी
अग्नि से जला हरा भरा वन तो पुनः हरा भरा हो जाता है, किन्तु जिह्वा रूपी अग्नि से जला चिरकाल तक हरा भरा नहीं होता है।
वाणी
लोक में ज्ञान और विवेक रहित मनुष्य मूर्ख माना जाता है, किन्तु जो विना पूँछे बोलता है वह मूर्ख शिरोमणि माना जाता है।
वाणी
सारे लोक में प्रिय, सार्थक, निर्मल और मनोहारी वाक्यों के होते हुए भी अज्ञानी पुरुष कठोर वचन क्यों बोलता है?
वाणी
मैं जो बन्धन में पड़ा, इसका दोषी कौन। यह वाणी का दोष है सबसे बेहतर मौन।।
वाणी
बिन स्वारथ कैसे सहे, कोई कड़वे बैन। लात खाय पुचकारिये, होय दुधारू धेनु।।
वाणी
बहुत पढ़े तो क्या पढ़े, बोलें नहिं विचार। हने पराई आत्मा, जीभ बहे तलवार।।
वाणी
शेर को गधा कहा– एक लकड़हारा जङ्गल में लकड़ियाँ लेने गया, वहाँ एक शेर को दयनीय स्थिति में देखा, तो डरते–डरते शेर के पास गया, शेर को काँटा लगा था जिससे वह चल नहीं पा रहा था, लकड़हारे ने साहस करके शेर का काँटा निकाल दिया, शेर ने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा, आप मेरे ऊपर लकड़ी रखकर ले जाया करो, शेर के ऊपर लकड़ी लाने से वह थोड़े ही समय में धनवान बन गया, पड़ोसी ने पूँछा आपकी सम्पन्नता का राज क्या है, लकड़हारे ने कहा मुझे एक गधा मिल गया है, उस पर लकड़ी रखकर लाता हूँ, जिससे मुझे बहुत लाभ हुआ है, ये शब्द शेर ने सुन लिए, दूसरे दिन जब लकड़ी लेने जङ्गल गया, तो शेर ने कहा! आपने मुझसे कल गधा कहा था, अब या तो आप मेरे गले पर कुल्हाड़ी मार दो नहीं तो मैं तुम्हे खा जाऊँगा, लकड़हारे ने अपनी जान बचाने के लिए शेर के गले पर कुल्हाड़ी मार दी जिससे शेर मर गया, शेर कुल्हाड़ी की मार सहन कर गया पर गधा शब्द सहन नहीं कर सका। अतः हमें सोच समझ कर बोलना चाहिए।
वाणी
बोले तो फँसे– कलाकार ने कला से मौत को जीत लिया, एक जैसे सात पुतले बनाये, खुद बीच में बैठ गया, मौत हैरान हो गई, बोली! 'और तो सब ठीक है लेकिन' कलाकार बोला क्या कमी रह गयी है? मौत ने कहा बस तुम बीच में बोल गये, यही कमी रह गयी है।
वाणी
जिस महात्मा ने प्रसन्नमुख होकर एक बार प्रेम से बात की उसने क्या–क्या उपकार नहीं किया? व क्या–क्या नहीं दिया?
वाणी
समय पर दिया गया धन्यवाद करोड़ों रुपयों से भी कीमती होता हैं।
वाणी
वाणी से व्यक्ति की पहचान- एक बार जङ्गल में राजा, मन्त्री, कोतवाल, और सिपाही ये चारों भटक गये, उन्हें रास्ते में एक अन्धा व्यक्ति दिखा, राजा ने उससे पूँछा क्यों सूरदास जी क्या यहाँ से हमारे मन्त्री, कोतवाल, सिपाही निकले हैं? सूरदास ने कहा नहीं राजन्। थोड़ी देर में वहाँ से मन्त्री निकला, तो उसने पूँछा, क्यों सूरदास क्या यहाँ से हमारे राजा निकले हैं? सूरदास ने कहा हाँ मन्त्री जी। थोड़ी देर में कोतवाल निकला, तो वह भी अन्धे से पूँछता है, क्यों रे सूरदास क्या यहाँ से हमारे राजा, मन्त्री निकले हैं? उसने कहा हाँ कोतवाल जी। थोड़ी देर में वहाँ से सिपाही निकला, उसने भी अन्धे से पूँछा क्यों वे अन्धे क्या यहाँ से हमारे राजा निकले हैं? उसने कहा हाँ सिपाही। अन्धें ने वाणी से राजा, मन्त्री, कोतवाल, सिपाही को जाना।
वाणी
जैसे मयूर पङ्ख में धूलि नहीं लगती, कमल को कीचड़ नहीं छूता, वैसे ही उत्तम वक्ता की जिव्हा को अपशब्द नहीं छूता है।
वाणी
प्रतिपद उदार भावों से युक्त, चमत्कार गर्भित और भाव प्रेषण में निपुण वाणी सैकड़ों में किसी एक को ही प्राप्त होती है।
वाणी
उचित वाणी जिस प्रकार मनुष्य को अलंकृत करती है, उस प्रकार चन्द्रमा के समान उज्ज्वल बाजूबन्ध, स्नान, लेप, फूल और सजाए हुए बाल अलंकृत नहीं करते, आभूषण तो नष्ट हो जाते हैं पर वाणी जीवन्त रहती है।
वाणी
चन्दन, चन्द्रमा और चन्द्रकान्त मणि की माला उस प्रकार सन्तुष्ट नहीं करती, जिस प्रकार कर्णप्रिय वाणी मनुष्य को सन्तुष्ट करती है।
वाणी
उच्च कुल के मनुष्य के हाथ में कमल का चिन्ह नहीं होता एवं व्यभिचारी की सन्तान के सिर में सींग नहीं होते किन्तु जब वाणी का प्रयोग करता है तो जाति कुल का प्रमाण अपने आप हो जाता है।
वाणी
कोयल काको देत है, कौआ काको लेत। मीठी वाणी बोल के मन सबका हर लेत।।
वाणी
'अप्रिय कटुक कठोर शब्द नहीं कोई मुख से कहा करे'।
वाणी
वचन चातुर्य-चार महिलायें एक साधु से बात करने के बहाने आती हैं, और पहली ने कहा विचारणीय बाबा! पानी दे दो, दूसरी ने कहा बाबा अग्नि दे दो, तीसरी ने कहा बाबा गोद में ले लो, चौथी महिला ने कहा बाबा आपके खेत में पशु घुस गये हैं, साधु चारों का एक ही उत्तर देते हैं कि 'वारि नहीं है', पानी को भी वारि कहते हैं, अग्नि वारी नहीं, वारी मतलब छोटी सी नहीं है, खेती वारी नहीं है।
वाणी
सत्य और सुन्दर- एक काना राजा था, उसने कई बड़े–बड़े चित्रकारों को बुलावाया, और आदेश दिया कि जो भी राजा का ऐसा चित्र बनाए जो सुन्दर भी हो और सत्य भी, तो कई चित्रकारों ने अपनी कला दिखायी, राजा ने एक चित्र देखा जिसमें एक आँख नहीं थी, राजा बोला ये सत्य है पर सुन्दर नहीं, दूसरे चित्र में दोनों आँखें थी, राजा बोला ये सुन्दर है पर सत्य नहीं, तीसरा चित्र दिखाया गया, जिसमें राजा धनुष से बाण को खींचता है, और एक आँख बन्द है, जैसे निशाना साध रहा हो, राजा देखकर प्रसन्न हो गया बोला यह सुन्दर भी है और सत्य भी, अतः वाणी ऐसी बोलो जो सत्य भी हो और सुन्दर भी।
वाणी
बोल उठे अवसर विना, ता को रहे न मान। जैसे कार्तिक बरसते, निन्दे सकल जहान।।
वाणी
बहु सुनवो कम बोलवो, यो है चतुर सुजान। इसीलिये विधि ने रची, एक जीभ दो कान।।
वाणी
वाणी से ही गधे पर बैठाया जाता है, वाणी से ही हाथी पर बैठाया जाता है।
वाणी
एक वचनकला ही पूर्ण कला है, अन्य कलाओं से क्या प्रयोजन है, हजारों वृद्ध गायों से एक कामधेनु का होना अच्छा है।
वाणी
कम बुद्धिमान ज्यादा बोलता है, ज्यादा बुद्धिमान कम बोलता है।
वाणी
तुम मत बोलो काम को बोलने दो, प्रभावपूर्ण बोलना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।
वाणी
'क्यों रे', 'तू क्या कर रहा है', इत्यादि ग्रामीण भाषा बोलने वाले व्यक्ति के वचन असत्य की कोटि में आते हैं।
वाणी
घड़े और नारियल की कीमत आवाज से होती है, अतः अच्छे शब्द बोलने में दरिद्रता नहीं होना चाहिए।
वाणी
एक हीरा सैकड़ों काँच के टुकड़ों को मात कर देता है, उसी प्रकार कठोर शब्द काँच हैं और मीठे शब्द हीरे हैं।
वाणी
अनुभवी फालतु बात नहीं हित की बात करता है।
वाणी
मूर्ख गप्पों से, विद्वान सत्य से, अहङ्कारी प्रणाम से प्रभावित होता है।
वाणी
जिसका हृदय कोमल है, उसकी वाणी कड़वी कैसे हो सकती है, पर जिसकी वाणी मीठी हो उसका हृदय निर्मल हो यह जरूरी नहीं है।
वाणी
मौन- आत्म हित की साधना में मौन सहायक है वार्तालाप नहीं, असत्य बोलने की तरह असत्य सुनने से भी पाप होता है अतः यत्न पूर्वक बचन बोलना चाहिए।
वाणी
वाणी के संस्कार में अन्तर–ये मेरे बाप की लुगाई है, ये मेरी जननी/माँ हैं।
वाणी
बाँसुरी की विशेषता–विना बुलाये नहीं बोलती, जब भी बोलती है तो मीठा बोलती है, भीतर बाहर से गाँठ रहित होती है।
वाणी
वाणी को अश्व की तरह बाँध कर रखना चाहिए, अन्यथा किसी भी विपत्ति रुपी गड्ढे में गिरा देती है।
वाणी
वाणी बोलकर अपने को, और सुनकर श्रोता को आनन्द की प्राप्ति नहीं हुयी तो बोलने का श्रम व्यर्थ है।
वाणी
बोलने के लिए सिर्फ वाणी की जरूरत होती है, किन्तु चुप रहने के लिये वाणी और विवेक दोनों की जरूरत पड़ती है।
वाणी
अपमान के वचन से भूख–प्यास ख़त्म हो जाती है और सम्मान पूर्ण वचन से भूख खुल जाती है।
वाणी
आपके सम्बोधन अच्छे होंगे तो आपके सम्बन्ध अच्छे होंगे।
वाणी
सम्यग्दृष्टि उपगूहन अङ्ग का पालन करता है, पैशून्य (चुगली या निन्दा) नहीं करता है।
वाणी
अगर मात्र एक उपाय से जगत को अपने बस में करना चाहते हो तो अपनी वाणी रूपी गाय को पर की निन्दा रूपी धान मत चरने दो।
वाणी
प्रिय वचन बोलने से सभी प्राणी सन्तुष्ट होते हैं, इसलिए प्रिय वचन ही बोलना चाहिए। अतः वचनों में दरिद्रता नहीं होना चाहिए।
वाणी
प्रिय और सार्थक, प्राणीमात्र की हितकारी वाणी बोलनी चाहिए तथा शाश्वत् धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की सिद्धि के लिए मौन रहना चाहिए।
वाणी
लक्ष्मी, मित्र, बान्धव, बन्धन और मरण सभी जिव्हा के अग्र भाग में बसते हैं, जिस तरह जिव्हा का उपयोग करोगे वैसा ही फल मिलेगा।
वाणी
वाणी ऐसी बोलिए, मन का आपा खोय। औरों को शीतल करे, आपहु शीतल होय।।
वाणी
अन्धे को अन्धा कहो, तुरतई पड़ है टूट। धीरे–धीरे पूँछ लो, कैसे गयी है फूट।।
वाणी
तुम बोलो या न बोलो इस बात का गम नहीं है। तुम मुस्कुराकर देख लो, यह भी बोलने से कम नहीं है।।
वाणी
वचन में चतुराई- राजा ने हाथी की रक्षा महावत को सौंपी और कहा कि हाथी को कोई कष्ट नहीं होना चाहिए। जो व्यक्ति राजा को हाथी की मृत्यु का समाचार देगा, उसको मृत्यु दण्ड होगा, कुछ दिन बाद हाथी मर गया, अब कौन राजा से कहे, सब सङ्कट में थे, एक वृद्ध ने जाकर कहा राजन! आज हाथी की विलक्षण दशा है, भोजन बन्द, स्पन्दन बन्द है, स्वर्गवास हो गया, राजा ने कहा हाथी मर गया? वृद्ध ने कहा! हमने मरना कहाँ कहा।
वाणी
आवश्यकों का पालन करते समय, मलमूत्र का विसर्जन करते समय, पाप कार्य में, वमन के समय अथवा वाणी सम्बन्धी दोष से बचने के लिए हमेशा मौन रहना चाहिये।
वाणी
जिसके द्वारा निर्दोष मौन का पालन किया जाता है उसकी वाणी शास्त्र से सम्बन्धित, मनोरम एवं ग्रहण करने योग्य होती है।
वाणी
जो दुष्ट सभा में श्रोताओं का समय बर्बाद करता है, वह मूर्ख मौन का आलम्बन क्यों नहीं लेता है?
वाणी
महापुरूष बोलकर कम, मौन से अधिक उपदेश देते हैं।
वाणी
पिता से प्रश्न- बादशाह ने सोचा जब बीरबल इतना चतुर है तो बीरबल के पिता कितने चतुर होगें? बीरबल से कहा कि कल तुम अपने पिता को सभा में लाना। सभा में गये, बादशाह ने प्रश्न किया– दो लोगों में झगड़ा हो गया हो तो क्या करना चाहिये? वे मौन रहे, दो दिन बाद बीरबल सभा में आये, तब बादशाह ने कहा तुम्हारे पिता जी बड़े मूर्ख हैं, बीरबल ने कहा हमारे पिताजी ने भी यही कहा था, कि तुम्हारे बादशाह बड़े मूर्ख हैं, हमने उनके प्रश्न का उत्तर दिया, लेकिन वो समझे नहीं, दो लोगों में झगड़ा हो तो मौन रहना चाहिए, बादशाह बीरबल की बात को सुनकर शर्मिन्दा हो गये।
वाणी
ज्यादा बोलना लघुता उत्पन्न करता है और मौन उन्नति का कारण है, आबाज के कारण पायल को पैरों में रखा जाता है और चुप रहने से हार गले में सुशोभित होता है।
वाणी
माता, पिता, स्त्री, भाई, बहिन, पुत्र, बालक, बीमार, आचार्य, अतिथि, तपस्वी, वृद्ध, वैद्य, हिस्सेदार, सेवक, आश्रित रहने वाले सम्बन्धी तथा मित्रों के साथ सदा वचन कलह न करने वाला मनुष्य तीनों जगत को जीत सकता है।
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हँस की सभा में बगुला और कोयल की सभा में कौआ जब तक मौन रहता है तब तक सम्मान पाता है।
वाणी
बोलना कला है, मौन रहना उससे भी ऊँची कला है, ज्ञानियों की सभा में मौन अज्ञानियों का आभूषण है।
वाणी
हे मेघ! तू कठोर क्यों गरजता है, बरसता तो कुछ ही बून्दे है, मत बरस-मत बरस किन्तु कठोर गर्जना तो शीघ्र छोड़ दे 'यहाँ पर भी मेघान्योक्ति के माध्यम से कहा गया है कि' हे धनवान्! तू याचकों को देता तो थोड़ा है और डांटता बहुत है, तू भले ही दान मत दे, पर डाँटना तो शीघ्र छोड़ दे।
वाणी
सामान्य साधु के अवर्णवाद से जब मनुष्य दुर्गति को प्राप्त होते हैं तो केवली के अवर्णवाद से कहाँ जावेंगे?
वाणी
जो ज्यादा वचन बोलता है, उससे अहिंसा का पालन नहीं होता है।
वाणी
पर की निन्दा के समान पाप न भूत में हुआ है न भविष्य में होगा और अपनी निन्दा के समान पुण्य न भूत में हुआ है न भविष्य में होगा।
वाणी
वचनगुप्ति- पाप के हेतु स्त्री कथा, राज कथा, चोर कथा और भोजन कथा न करना तथा झूठ आदि वचनों से निवृत्ति होना वचनगुप्ति है अथवा मौन रहना वचनगुप्ति है।
वाणी
ऋद्धिधारी मुनिराज का शरीर कुष्ठ रोग से पीड़ित था, उनको देखकर आपने निन्दा की और सात सौ लोगों ने समर्थन किया, जिससे उन सभी को कुष्ठी होना पड़ा, अतः प्राणों का वियोग होने पर भी कभी मुनियों की निन्दा नहीं करना चाहिए।
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