अपि दावानलप्लुष्टं, शाड्वलः जायते वनं। न लोका सुचिरेणापि, जिह्वानल कदर्थितः।।
अग्नि से जला हरा भरा वन तो पुनः हरा भरा हो जाता है, किन्तु जिह्वा रूपी अग्नि से जला चिरकाल तक हरा भरा नहीं होता है।
A lush forest burned by fire turns green again, but one scorched by the fire of the tongue does not recover for a very long time.
— आराध्य सूत्र · #17
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