केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं, हाराः न चन्द्रोज्ज्वलाः, न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं, नालंकृता मूर्धजाः। वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं, या संस्कृता धार्यते, क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं, वाग्भूषणं भूषणं।।
उचित वाणी जिस प्रकार मनुष्य को अलंकृत करती है, उस प्रकार चन्द्रमा के समान उज्ज्वल बाजूबन्ध, स्नान, लेप, फूल और सजाए हुए बाल अलंकृत नहीं करते, आभूषण तो नष्ट हो जाते हैं पर वाणी जीवन्त रहती है।
As refined speech adorns a person, moon-bright armlets, bathing, ointments, flowers, and dressed hair do not; ornaments perish, but the ornament of speech lives on.
— आराध्य सूत्र · #24
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