लक्ष्मी वसति जिव्हाग्रे, जिव्हाग्रे मित्र बान्धवाः। बन्धनं चैव जिव्हाग्रे, जिव्हाग्रे मरणं ध्रुवं।।
लक्ष्मी, मित्र, बान्धव, बन्धन और मरण सभी जिव्हा के अग्र भाग में बसते हैं, जिस तरह जिव्हा का उपयोग करोगे वैसा ही फल मिलेगा।
Wealth, friends, kinsmen, bondage, and death all dwell on the tip of the tongue; as you use your tongue, so will be the fruit.
— आराध्य सूत्र · #33
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