Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Speech

वाणी

450 सूत्र · पृष्ठ 5 / 6

मुखरता छोटा बनाती है और मौन उन्नति करने वाला होता है, मुखर नूपूर को पैर में और मौन हार को कण्ठ में पहना जाता है।
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अज्ञानी के लिए मौन से श्रेष्ठ कुछ नहीं है और यदि वह यह युक्ति समझ ले तो अज्ञानी न रहे।
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बहुत-सा विचार थोड़े शब्दों में व्यक्त करना एक महती कला है।
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झूठे आरोपों का सर्वोत्तम उत्तर मौन है।
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बहुत बोलने वाला कदाचित् ही अपने कहे का पालन करता है।
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आँकड़ों की अपेक्षा तथ्य अधिक जोर से बोलते हैं।
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कड़ी बात भी हँसकर कही जाये तो मीठी हो जाती है।
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दूसरों के अप्रिय वचन सुनकर भी उत्तम व्यक्ति सदाप्रिय वाणी ही बोलते हैं।
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मीठे बोल से ही बदले में मीठा व्यवहार मिलता है।
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मीठे शब्दों के रहते हुए भी जो मनुष्य कड़वे शब्दों का प्रयोग करता है, वह मानों पके फलों को छोड़कर कच्चे फल खाता है।
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यदि समस्त प्रजा की पहुँच राजा तक हो और राजा कभी कठोर वचन न बोले, तो उसका राज्य सबसे अपार रहेगा।
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जो वाक् कला मित्रों को और भी घनिष्ठता के सूत्र में आबद्ध करती है तथा विरोधियों को भी अपनी ओर आकर्षित करती है, बस वही यथार्थ वक्तृता है।
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जो आदमी सुवक्ता है और गड़बड़ाना या डरना नहीं जानता है विवाद में उसको हरा देना किसी के लिए संभव नहीं है।
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जिसकी वक्तृता परिमार्जित और विश्वासोत्पादक भाषा में सुसज्जित होती है, सारी पृथ्वी उसके संकेत पर नाचती है।
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जो लोग अपने मन की बात थोड़े से चुने हुए शब्दों में कहना जानते है वास्तव में उनको अधिक बोलने की आदत नहीं होती है।
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वक्ता बुद्धिमान श्रोताओं के समक्ष भाषण देने में किसी प्रकार की चूक नहीं करते हैं।
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1.वक्ता का सभी शास्त्रों का विधिवत् अध्ययन हो, 2.श्रोताओं की मानसिकता समझे, 3.गूढ़ और गम्भीर विषय योग्यता देखकर देवे, 4.इधर-उधर की बातें न करे, 5.अधिक देर नहीं बोले, 6.प्रथमानुयोग का रस पिलाये, 7.भाषण गन्ने की तरह सरस व छोटा होना चाहिए बाँस की तरह नीरस व लम्बा नहीं होना चाहिए।
वाणी
गरजने वाले मेघ और ज्यादा बोलने वाले वक्ता सुलभ हैं, किन्तु दयालु वक्ता और जल वाले मेघ दुर्लभ हैं।
वाणी
जो समस्त शास्त्रों के रहस्य का ज्ञाता है, लोक स्थिति को जानता है, जिसे किसी प्रकार की आशा नहीं है, प्रतिभावान है, मन्द कषायी है, प्रश्न पूँछने के पहले ही जिसने उत्तर देख लिया है, प्राय: प्रश्नों को सहन करने वाला है, प्रभुत्व सम्पन्न है, दूसरों का मन हरने वाला है, पर की निन्दा नहीं करता है, गण में प्रमुख है, गुणों का भंडार है, स्पष्ट और मिष्ट भाषी है ऐसा वक्ता होता है।
वाणी
विनय से स्वाध्याय करने वाला त्रिगुप्ति धारी होता है, उसके मुख से असत्य, रूक्ष, कठोर, स्वप्रशंसात्मक, परनिन्दात्मक वाणी नहीं निकलती है।
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वक्ता धर्मसभा में पास हो जाते हैं, किन्तु पर्व में महावीर जयन्ती, अक्षय तृतीया, दीवाली, आदि में फैल हो जाते हैं, वहाँ सामान्य जनसमुदाय वाला उपदेश होना चाहिए विद्वानों की अपेक्षा बच्चों को समझाना कठिन है।
वाणी
सम्मइ सूत्र के कर्ता आचार्य सिद्धसेन बहुत बड़े वादी थे, नगर-नगर में जाकर वाद करते थे और जीत लेते थे, एक बार एक नगर में गये, पता लगा यहाँ कोई अत्यन्त निपुण वादी है, अभी जङ्गल गया है, सिद्धसेन जी जङ्गल चले गये जैसे-तैसे उसको ढूँढ़ लिया, सिद्धसेनजी ने कहा हमसे वाद करो, उसने कहा भाई राजा के सामने वाद करना ठीक है नहीं तो निर्णय कौन करेगा, सिद्धसेनजी नहीं माने बोले ग्वालों को बुलाओ गाय श्रोता होगीं ग्वाले जज होंगे, ऐसा ही किया, सिद्धसेनजी दो घण्टे तक संस्कृत में बोलते रहे, ग्वाले संस्कृत क्या जानें? प्रतिवादी आया उसने बढ़िया नाचना गाना प्रारम्भ किया, सब ग्वाले प्रसन्न हो गये, तब सिद्धसेनजी ने कहा भैया तुम जीते हम हारे, 'वक्ता को द्रव्य, क्षेत्र, काल का जानने वाला होना चाहिए'।
वाणी
करोड़ गुणों की तुलना में भारी औचित्य गुण है, दान तथा प्रिय वचनों के द्वारा दूसरे को सन्तुष्ट करने का नाम औचित्य गुण है, इस गुण की बड़ी महिमा है, एक ओर एक औचित्य गुण और दूसरी ओर गुणों की राशि, औचित्य गुण के विना गुणों की राशि विष तुल्य प्रतीत होती है, यदि मनुष्य में प्रिय वचनों के द्वारा दूसरे को सन्तोष दिलाने की क्षमता न हो तो उसके सभी गुण व्यर्थ हैं।
वाणी
डण्डा मारकर छत्ते से शहद नहीं मिलती, अतः दादागिरी की अपेक्षा मिठास से काम लीजिए।
वाणी
व्यक्ति अपनी जुबान ठीक करले तो जन्मपत्री की गड़बड़ी और शनि की साढे साति कुछ नहीं बिगाड़ सकती है।
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सोच के बोलें, न कि बोल के सोचें, बोलने से पहले एक बार सोचो, लिखने के पहले दो बार सोचो, और करने से पहले तीन बार सोचो, लोगों के मना करने से पूर्व बोलना बन्द कर दो।
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अपनी समस्याओं व कठिनाइयों का विज्ञापन मत करिये- मानव की प्रकृति के अनुसार कोई भी आपकी समस्याओं में दिलचस्पी नहीं रखता, हर एक व्यक्ति सिर्फ अपनी समस्याओं में रुचि रखता है। आपकी समस्याएं सुनकर सामने वाला ऊब जायेगा या अपने से अधिक परेशान समझकर क्षणिक सन्तोष का अनुभव करेगा। आपकी मानसिक कमजोरी या बचपना समझेगा। अपनी समस्याओं का हल किसी समझदार से लीजिए। लगातार शिकायत व नोंक-झोंक से बचिए। विना पूँछे ज्यादा स्पष्टीकरण और सफाई न दीजिए। लोग अपनी मानसिकतानुसार जो सोचते हैं, सोचने दीजिए।
वाणी
सराहना करना चाहिए- अच्छे कर्मचारी को यह बताने से न चूकिए कि कम्पनी के लिए उनका कितना महत्त्व है, इससे प्रोत्साहन मिलता है।
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शिष्टाचार- जी, श्री, आप, धन्यवाद और कृपया शब्दों का उदारता से उपयोग कीजिए।
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रहस्यों को अपने तक सीमित रखिए। उनको बताने के लोभ से बचिए। अपने घनिष्ट मित्र को भी कोई रहस्य बताने से पहले दोबार विचार कीजिए। जो लोग आपके चारों ओर रहते हैं उनके नाम याद रखिए।
वाणी
आप असहमत हो या सहमत जब लोग बोल रहें हों, तो उनके बीच में टोकने की प्रवृत्ति को रोकिए, चाहे वह चीज आप पहले से जानते हों या नहीं। ध्यान से और पूरी तरह सुनिये अपनी बारी आने पर ही बोलिये। एवं क्रोध किये विना असहमत होना सीखिए।
वाणी
जब तक पूँछा न जाए, लोगो को विना माँगे सलाह न दीजिए, अपने वचनों का पालन कीजिए।
वाणी
काम या व्यापार की बातें सड़क पर न कीजिए। प्रशंसा सबके सामने कीजिए, आलोचना एकान्त में।
वाणी
किसी से पहले कभी न कहिए वह थका हुआ उदासीन या बीमार दिखाई दे रहा है।
वाणी
जब निंदा करने का अवसर आये तो अपनी जुबान बन्द रखिए, दूसरों को सदैव गलत मत समझिए, निर्णय लेने से पहले दोनों पक्षों को सुन लीजिये, ये छोटी-छोटी बातें समय पर बहुत प्रभाव डालती हैं।
वाणी
प्रशंसा का एक वाक्य व्यक्ति की जिन्दगी बदल देता है, कटाक्ष करने से हृदय से अपना स्थान मिट जाता है।
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'मौन' शक्ति व आनन्द का अक्षय कोष है, एक घण्टे का मौन सात घण्टे की गहरी नींद के बराबर है, और एक घण्टा बोलने से सात कि.मी. चलने बराबर शक्ति खर्च होती है।
वाणी
लगातार शिकायत और नौंक झोंक से बचें, विना पूँछे ज्यादा स्पष्टीकरण और सफाई न दें।
वाणी
कठोरता, कटुता, कर्कस वाणी और घटिया व्यवहार ये सब प्रभावी व्यक्तित्व के दुश्मन हैं।
वाणी
नम्रता, मिष्ठवाणी और मधुर व्यवहार आपके श्रेष्ठ मित्र हैं।
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अपनी प्रशंसा, पर की निन्दा, महापुरुषों से ईर्ष्या और अप्रासङ्गिक बहुत बोलना, ये कार्य अपने आप को नीचे गिरा देते हैं।
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किसी को उसकी गलतियाँ न बतायें वरना वह आपकी गलतियाँ ढूँढ़ने लगेगा।
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अपने कर्मचारी से भी इतने धैर्य और शान्ति से बात करें, कि वह अपने कर्तव्य के लिये सहज प्रेरित हो जाय।
वाणी
ज्ञानी को बोलना और अज्ञानी को मौन अखरता है, वाणी के मौन से मन का मौन और भी श्रेष्ठ है।
वाणी
सत् और असत् पुरुषों में बहुत बोलना सत्यव्रत है, सत् और असत् पुरुषों में परिमित बोलना भाषा समिति है, सज्जनों में ही अधिक या कम बोलना सत्य धर्म है इस प्रकार इन तीनों में अन्तर है।
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जरूरत से ज्यादा बोलने का मतलब यह नहीं होता कि आप बातचीत में कुशल हैं।
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बहसबाजी अहङ्कार की लड़ाई से ज्यादा कुछ भी नहीं है, असहमत हुये विना असहमति जताना कला है।
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जुबान को ताले की नहीं, लगाम की जरूरत पड़ती है।
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मधुर वचन बोलने वालों के पास दरिद्रता कभी नहीं आती है।
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जो बात वाणी प्रकट नहीं कर पाती उस बात को आँखे आसानी से बोल देती हैं।
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विना बुद्धि का वक्ता, विना लगाम के घोड़े की तरह होता है।
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जीभ का घाव जल्दी भरता है पर जीभ से किया घाव कभी नहीं भरता है।
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आपसे त्याग नहीं बनता तो कोई बात नहीं, पर त्यागी की निन्दा तो मत करो।
वाणी
ज्यादा न बोलें, विना मांगे सलाह न दें, ज्यादा टोका-टाकी न करें, व्यङ्ग भरी भाषा न बोलें तो झगड़े से बच सकते हैं।
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जहाँ आपका काम बोल रहा हो वहाँ आप न बोलें।
वाणी
कुछ प्रश्नों के उत्तर मौन से दिये जा सकते हैं।
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व्यक्ति बोलकर जितना कष्ट पाता है उतना मौन रहकर नहीं। 'मूर्खों से बात न करें, समय बचेगा।
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कम बोलने का गुण आ जाय तो व्यक्ति बहुत बड़ा साधक बन जाय।
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जो अधिक सुनता है और कम बोलता है वही व्यक्ति बुद्धिमान है।
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शिकायत, उपालम्भ(उलाहना) या आरोप लगाने से पूर्व सोचिए 'क्या यह बात बहुत बड़ी है'?
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छः बोल- 1.कम बोलों, 2.धीरे बोलो, 3.मीठा बोलो, 4.आदर से बोलों, 5.समझ के बोलों, 6.किसी के बीच में न बोलों।
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दूसरों के साथ हँसिये, दूसरो पर मत हँसिये, तुम बर्फ के समान विशुद्ध और पवित्र रहो, तब भी निन्दा से नहीं बच सकते हो।
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नासमझ दूसरों को समझाना चाहता है, उसकी बात भीतर से नहीं मुँह से निकलती है, इसलिए कानों तक रहती है हृदय तक नहीं पहुँचती है।
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अनुभवी हित की बात करता है फालतू बात नहीं करता है।
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कभी किसी के वाद-विवाद में न उलझें।
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चोट पहुँचाने वाली हँसी मजाक से सदैव बचें।
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दूसरों की कमजोरी पर, मजबूरी पर व्यङ्ग बाण न चलायें।
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व्यवहार कुशल लोगों से 'व्यवहार' सम्बन्धी बारीकी को सीखने का प्रयत्न करें, किसी से कटु सत्य न बोलें, प्रिय वक्ता बनें, सत्य को भी विनम्रता से बोलें, प्रत्येक शब्द को हृदय तराजू पर तौलें तब बोलें।
वाणी
क्या आप कम बोलते हैं?
वाणी
क्या आप दूसरों की बात ध्यान से सुनते हैं?
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उतना भार उठाओ साथी, जितना ले चल सकते हो। उतनी बात कहो तुम मुख से, जितनी पूर्ण कर सकते हो।
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जीवन में मिठास चाहिए तो अपने व्यवहार, विचार, आचार में माधुर्य लाओ, चाय में चीनी डालना भूल जाओं तो कोई बात नहीं, मगर बोली में चीनी डालना मत भूलो, विना चीनी की चाय तो डायबिटीज के मरीजों के काम आती है, विना मिठास की वाणी किसी के काम में नहीं आती है।
वाणी
भला बुरा लखिये नहीं, आये अपने द्वार। मधुर बोल जस लीजिये, नातर अजस तैयार।।
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अत्यन्त दुःखी को मधुर वाणी और वात्सल्य की जरूरत होती है।
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भैंस और खेती को लेकर आलसी मित्रों में विवाद-दो मित्र आपस में बैठे-बैठे चर्चा छेड़ देते हैं, एक कहता है 'हम इस साल खेती करेंगे' दूसरा कहता है 'हम इस साल भैंसें खरीदेंगे', पहला कहता है आपकी भैंसे मेरे खेत में नहीं आना चाहिए, दूसरा कहता है पशु हैं आयेंगे तो हम क्या करेंगे, इसी बात को लेकर दोनों में झगड़ा हो जाता है, और आपस में एक दूसरे का सिर फोड़ देते हैं, अतः व्यर्थ की चर्चा नहीं छेड़ना चाहिए।
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