Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Knowledge & Wisdom

ज्ञान

800 सूत्र · पृष्ठ 7 / 11

हम बच्चों पर इतना बोझ डाल देते हैं कि उनकी सोचने की क्षमता क्षीण हो जाती हैं, अतः उन्हें पर्याप्त समय देकर उनकी प्रतिभा को उभारना और एक अच्छा विचारक बनाना ताकि वे भविष्य में समाज को नयी संरचनात्मकता दे सकें।
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जगत् में सब भाषाओं को जन्म देने वाली कौन है? चमकती हुई संस्कृत। कहो वेद की जननी कौन है? ओजमयी संस्कृत। अनुपम व सरस साहित्य से सम्पन्न कौन हैं? श्रेष्ठ संस्कृत। कहो भारत के अनुरूप भाषा कौन है? सुरभारती संस्कृत।
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सच्ची शिक्षा का लक्ष्य बुद्धिमत्ता के साथ चरित्र का विकास करना है।
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वार्तालाप से बुद्धि विकसित होती है किन्तु प्रतिभा की पाठशाला तो एकान्त ही है।
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तर्क शास्त्र को तुम भली-भाँति सीख लो, जिससे कि मानव समुदाय के सामने बिना भयातुर हुए बोल सको।
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अच्छी पुस्तकें हीरा-मोती से ज्यादा कीमती हैं क्योंकि हीरा-मोती बाहर को चमकाते हैं, पुस्तकें हृदय को चमकाती हैं।
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राजा, प्रधान श्रावक और साधु का मरण होने पर, ग्रहण आदि के समय तथा पर्व के दिनों में सिद्धान्त ग्रन्थों को नहीं बांचना चाहिए। अमावस्या और पूर्णिमा का पाठ गुरु घातक है, चतुर्दशी का पाठ शिष्य घातक है, अष्टमी का पाठ दोनों का घातक है और प्रतिपदा पाठ का घात करने वाली है।
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जितना पुण्य धन-धान्य से पूर्ण इस समस्त पृथ्वी का दान में देने से मिलता है उससे अधिक पुण्य स्वाध्याय करने से मिलता है।
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स्वाध्याय का परित्याग कर देने से उत्तम कुल भी नीच कुल हो जाते हैं।
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स्वाध्याय वाणी का तप है।
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संसार में बहुत से बड़े आदमी स्वाध्याय के बल पर ही ऊँचे चढ़े हैं, स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई तो निमित्त मात्र है।
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स्वाध्याय हमें मनोबल प्रदान करता है एवं हतोत्साहित होने पर रामबाण दवा का काम करता है।
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स्वाध्याय यानि स्व का स्व के लिए स्व के द्वारा अध्ययन करना स्वाध्याय है।
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स्वाध्याय परमतप है गुणश्रेणी निर्जरा का कारण है।
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स्वाध्याय करने से सदाचार का पालन होता है, इन्द्रियों का दमन होता है, राग-द्वेष आदि विकारों की मंदता होती है, मन की चंचलता रुकती है, सद्गुणों का विकास होता है, वैराग्य दृढ़ होता है, परिणामों में निर्मलता होती है, आत्मा में विशुद्धि बढ़ती है और मोक्षमार्ग प्रशस्त होता है। ''स्वाध्याय का फल शान्ति धारण करना है।''
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स्वाध्याय करना कभी बंद मत कर देना क्योंकि समाधि के समय अंतिम श्वासों तक स्वाध्याय ही काम आयेगा।
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पंचमकाल में परिणामों को वश में करने वाली विद्या तो सिर्फ स्वाध्याय है।
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स्वाध्याय करने वाला कभी अनाचारी नहीं होता, आँखों को अक्षरों में और मन को अर्थ निकालने में लगा देने से अनर्थ होना बंद हो जाता है।
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अज्ञानी के दो-चार-पाँच-छह-आठ आदि उपवास करने में जितनी विशुद्धि कर्म निर्जरा होती है, उससे बहुगुणी विशुद्धि निर्जरा भोजन करते हुए शास्त्र पढ़ने से होती है।
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जो आत्मा के स्वरूप को जानने में कुशल व निपुण है, उनके तप व संयम होता है, समभावी के वैराग्य होता है, शास्त्र पढ़ने वाले के तप, संयम, वैराग्य; तीनों होते हैं, अत: शास्त्र अवश्य पढ़ना चाहिए।
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जहाँ पर अच्छी पुस्तकें हैं, वहाँ से व्यसन, पाप, कषाय, राग-द्वेष आदि विकारों व रोगों को भगाना कठिन नहीं है।
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आपके पास दो रुपये हैं तो एक रुपये से रोटी खरीदिये और एक रुपये से अच्छी किताब, रोटी जीवन देगी और अच्छी किताब जीवन जीने की कला देगी।
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पुस्तक का मूल्य रत्नों से भी अधिक है, क्योंकि रत्न बाहरी चमक दिखाते हैं जबकि पुस्तकें मन और भविष्य को उज्जवल करती हैं।
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आपके पास दो रुपये हैं तो एक से रोटी खरीदिए और दूसरे से अच्छी किताब, रोटी जीवन देगी और किताब जीने की कला देगी।
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पैसों से आप क्या खरीद सकते हैं और क्या नहीं खरीद सकते हैं? पैसे से आप मनोरञ्जन के साधन खरीद सकते हैं, पर खुशी नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप पुस्तकें खरीद सकते हैं, पर दिमाग नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप बिस्तर खरीद सकते हैं, पर नींद नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप साधु के उपकरण खरीद सकते हैं, पर साधुता नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप भोजन खरीद सकते हैं, पर भूख नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप मकान खरीद सकते हैं, पर घर नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप शानदार वस्तुएं खरीद सकते हैं, पर संस्कृति नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप दवाई खरीद सकते हैं, पर स्वास्थ्य नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप मन्दिर खरीद सकते हैं, पर भगवत्ता नहीं खरीद सकते हैं। किन्तु स्वाध्याय के द्वारा आप वह सब खरीद सकते हैं जो-जो आपकी इच्छा है।
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पुस्तक का मूल्य रत्नों से भी अधिक है, क्योंकि रत्न बाहरी चमक दिखाते हैं जबकि पुस्तकें मन को उज्ज्वल करती हैं।
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बारह तपों में स्वाध्याय के समान तप न हुआ, न है, न होगा, जो कर्म अन्य तपस्वी करोड़ो भवों में निर्जीर्ण करता है, उसे स्वाध्यायी अन्तमुहूर्त में ही निर्जीर्ण करता है। स्वाध्याय के द्वारा भोजन करते हुए भी अनशन आदि से अनन्त गुणी विशुद्धि प्राप्त होती है, वह स्वाध्याय तप मरण के समय आराधना की सिद्धि के लिए सदा करना चाहिए, अतः श्रुत भावना से पृथक्त्व वितर्क और एकत्व वितर्क रूप शुक्ल ध्यान होते हैं, शुक्ल ध्यान से केवलज्ञान की प्राप्ति और केवलज्ञान से अन्त में मुक्ति की प्राप्ति होती है।
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जो साधक निरन्तर सिद्धान्तशास्त्रों का अध्ययन करता है, उस बुद्धिमान् के पूर्ण मनोगुप्ति होती है।
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हेय और उपादेय रूप तत्त्व के प्रकाश का इच्छुक भव्यजीव बोधि और समाधि को देने वाले तथा परमार्थ सत् वस्तुस्वरूप का कथन करने वाले पुराण और चरित्ररूप प्रथमानुयोग को अन्य तीन अनुयोगों से अधिक अध्ययन में लायें क्योंकि आँखों में पानी इसी अनुयोग से आता है।
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शास्त्र के प्रथमानुयोग से प्रशम, करणानुयोग से संवेग, चरणानुयोग से अनुकम्पा और द्रव्यानुयोग से आस्तिक्य सम्यक्त्व के ये चार गुण पुष्ट होते हैं।
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ज्ञान की आग में जलकर व्यक्ति सूरज बने या न बने, पर दीपक तो बन ही जाता है।
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अध्ययन का दृढ़ सङ्कल्प, वाणी माधुर्य, अध्ययन में परिश्रम, विनयशीलता, निश्छलता, गुरू में आस्था और भक्ति, समय का सदुपयोग, संयम, सेवावृत्ति, उत्साह, जिज्ञासा, अनुशासन प्रियता, अनालस्यता, एवं जिस विद्या का अध्ययन किया जा रहा है उस पर विश्वास हो।
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अहङ्कार, उद्दण्डता, अनुशासन हीनता, आलस्य और विलासी जीवन, अनास्था, असंयम, इन्द्रियों की दासता, अध्ययन में अरुचि, असहिष्णुता, झगड़ालु स्वभाव, वाचालता, कटुवचन, गुरुओं के प्रति अनास्था, अनादर।
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शिष्यगण में प्रेम, उसकी उन्नति का भाव, अच्छे संस्कार देना, ज्ञान का भण्डार, पाण्डित्य, सदाचार, निर्लोभता, कर्तव्य परायणता, सुबोध पाठन शैली, सहिष्णुता, ज्ञानपिपासा, अध्ययन–अध्यापन, सतत शिष्य अभ्युदय की कामना, काव्यात्मक शैली विकसित करता हो।
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1.मनन, 2.गहन अध्ययन, 3.ऊहापोह, 4.हेय उपादेय को समझना, 5.शास्त्रों का संग्रह करना, 6.सेवा भावी होना, 7.एकाग्रता से सुनना, 8.पठित विषय का स्मरण रखना।
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चौदह प्रकार के श्रोता- 1.मिट्टी, 2.चलनी, 3.भैसा, 4.हँस, 5.तोता (जितना सुना उतना याद रखना), 6.बिल्ली(चालाक), 7.बगुला(ढ़ोंगी), 8.मशक, 9.बकरा(देर से समझता है और तीव्र कामी होता है), 10.जोंक, 11.फूटे घड़े की तरह, 12.पशु (किसी के दबाव में सुनना), 13.सर्प, 14.शिला की तरह, ऐसे चौदह प्रकार के श्रोता होते हैं।
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आरोग्य, बुद्धि, विनय, पुरुषार्थ और शास्त्र सम्बन्धी राग, ये पाँच पठन की सिद्धि करने वाले अन्तरङ्ग कारण हैं और आचार्य, पुस्तक निवास, सहायक और भोजन ये पाँच पठन की वृद्धि करने वाले बाह्य कारण हैं।
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चतुराई प्राप्त करने के पाँच साधन देशभ्रमण, ज्ञानियों से मित्रता, उत्तम स्त्री, राजसभा में प्रवेश, अनेक शास्त्रों का स्वाध्याय करना।
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स्वाध्याय से मन एकाग्र होता है, प्रज्ञा वृद्धि, स्वार्थ त्याग की भावना, श्रमपूर्वक अभ्यस्त विद्या ही इस लोक और परलोक के कार्यों को सिद्ध करती है।
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त्याग, संयम, आचार-विचार, और कर्तव्यनिष्ठा का बोध शिक्षा से ही होता है।
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अहिंसा और सत्य का घनिष्ठ सम्बन्ध शिक्षा के साथ है।
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जो नैतिकता और आध्यात्मिकता का विकास न करे, वह शिक्षा व्यर्थ है।
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विद्या को चोर चुरा नहीं सकता है, भाई बाँट नहीं सकता है, राजा माँग नहीं सकता हैं, वजन भी नहीं है, व्यय करने पर नित्य बढ़ती है अत: सर्व धनों में विद्या धन प्रधान है।
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काम के समान व्याधि नहीं, मोह के समान शत्रु नहीं, क्रोध के समान अग्नि नहीं है और ज्ञान के समान सुख नहीं है।
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जहाँ पर विद्वान नहीं होते हैं वहाँ पर अल्प बुद्धि भी प्रशंसनीय होता है, जिस प्रकार जहाँ पर वृक्ष नहीं होते हैं, वहाँ एरण्ड का पेड़ ही वृक्ष माना जाता है।
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अनेक संशयों को दूर करने वाला, परोक्ष पदार्थ को दिखाने वाला सबका नेत्र स्वरूप शास्त्र ज्ञान जिसके पास नहीं है वह अन्धा ही है।
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जिस प्रकार गन्ध से हीन फूल सुशोभित नहीं होते, उसी प्रकार विशाल कुल में उत्पन्न और रूप यौवन से सम्पन्न होने पर भी, विद्या से हीन व्यक्ति सुशोभित नहीं होते हैं।
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जैसे गधा चन्दन के भार को ढोता हैं पर चन्दन का ज्ञाता नहीं होता, उसी प्रकार शब्द ज्ञानी भी बहुत शास्त्रों का ज्ञाता होता हैं पर आत्मा का ज्ञाता नहीं होता है।
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जिसके द्वारा विषयों के राग से विरक्त हो, रत्नत्रय से राग किया जाए, मित्रता बढ़े, उसे जिनशासन में ज्ञान माना है।
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विद्या माता की तरह रक्षा करती है, पिता की तरह हित में लगाती है, स्त्री की तरह खेद को दूर करके रमाती है, लक्ष्मी को बढ़ाती है, दिशाओं में कीर्ति का विस्तार करती है और कल्पवृक्ष की तरह क्या-क्या सिद्ध नहीं करती है?
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पुस्तक की विद्या और दूसरे को दिया हुआ धन समय आने पर काम में नहीं आता है अत:विद्या को कण्ठस्थ करना चाहिए और धन को पास में रखना चाहिए।
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विद्वत्ता से वंश का पता चलता है, वैभव प्राप्त होता है सज्जन लोग सेवा करते हैं, सभा में सदस्यता प्राप्त होती है, ज्यादा क्या कहें? विद्वान् सर्वत्र पूजा जाता है।
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विद्वत्ता और राजापना बराबर नहीं हो सकते क्योंकि राजा तो अपने देश में ही पूजा जाता है किन्तु विद्वान् तो सर्वत्र पूजे जातें हैं।
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राजा की पूजा अपने देश में होती है, मुखिया की पूजा अपने गाँव में होती है, मूर्ख अपने घर में ही पूजा जाता है किन्तु विद्वान की सर्वत्र पूजा होती है।
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विद्या मनुष्यों का सुन्दर रूप है, ढका हुआ गुप्त धन है, विद्या भोगों को, यश को, सुख को करने वाली है विद्या गुरुओं की भी गुरु है, विद्या विदेश में बन्धु के समान है, विद्या देवता के समान रक्षक है, राजाओं के द्वारा विद्या की पूजा की जाती है धन की नहीं अत: जो विद्या से रहित है वह पशु के समान है।
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न्यूनता रहित, अधिकता रहित, जैसा का तैसा, विपरीतता रहित, सन्देह रहित जानने को गणधर देव सम्यग्ज्ञान कहते हैं। जैसे आगम में 36 इंच लम्बा 24 इञ्च चौड़ा पानी का छन्ना, जिसे दोहरा करने पर सूर्य की किरणे न दिखे ऐसा होना चाहिए, अगर इकहरा से तिहरा से कटे-फटे छेद वाले छन्ने से पानी छाना तो सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र नहीं है।
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श्रुत का पार नहीं है, समय अल्प और बुद्धि मंद है, अत: वह अवश्य सीखना चाहिये जिससे जन्म, जरा और मरण का नाश हो जाए।
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यद्यपि भव-भव में आराधित निर्मलज्ञान को भूल जाते हैं, फिर भी वह सकलवस्तु विषयी केवलज्ञान को प्रकट कर देता है।
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सामान्य शास्त्र की अपेक्षा विशेष शास्त्र बलवान होता है, विशेष रहित सामान्य गधे के सींग के समान अभाव रूप होता है, जैसे आदिनाथ जी का आहार सामान्य से एक साल में, विशेष रूप से तेरह माह सात दिन के बाद हुआ था।
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'या विद्या सा विमुक्तये' विद्या वह है जो मुक्ति को प्राप्त कराये, किन्तु 'सा विद्या या भुक्तये' आज कल विद्या वह हो गई है जो भुक्ति अर्थात् सांसारिक सुख प्राप्त कराए।
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किसी आम के वृक्ष तले दो व्यक्ति कहीं से आए थे, एक लगा पत्तों को गिनने दूजे ने फल खाए थे। खाने वाला चतुर मात्र गिनने वाला मूरख जानो, इसी तरह ज्ञानी और अनुभवी को पहचानो।।
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ज्ञान ही भव का कूल है, ज्ञान ही दु:ख का मूल। राग रहित अनुकूल है राग सहित प्रतिकूल।। चुन-चुन इसमें उचित को, मत चुन अनुचित भूल। सब शास्त्रों का सार है, समता बिन सब धूल।।
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स्वाध्याय से मिलता ज्ञान, पूज्य जगत में हो विद्वान्। है यह सुख सम्पति की खान, कोई वस्तु न इसके समान।। स्वाध्याय से पाते बुद्धि, स्वाध्याय से मन की शुद्धि। स्वध्याय से मिलता ज्ञान, इसके बिन नर पशु समान।। आत्मज्ञान धन गुप्त महान, ज्ञानदान से बढता मान। भाई बाँटे हरे न चोर, यथा शक्ति इस धन को जोड़।। सुख में दुख में एक समान, जिनवाणी है मात समान। माता सकल गुणों की खान, इससे बने वीर भगवान।।
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खोदो जितना स्रोत को, उतना मिलता नीर। सीखें जितना ही अधिक, उतनी मति गम्भीर।।
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शिक्षित को सारी मही, घर है और स्वदेश। फिर क्यों चूके जन्म भर, लेने से उपदेश।।
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जो भी सीखा जीव ने, एक जन्म में ज्ञान। उससे अग्रिम जन्म भी, होते उच्च महान।।
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परिजन धन कछु न चले, मरण समय में साथ। ज्ञान अडिग निज की निधि, भव भव जावे साथ।।
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सरस्वती के भण्डार की बड़ी अपूरव बात। ज्यों खर्चें त्यों त्यों बढ़े, बिन खर्चें घट जात।।
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बनती हैं भूमिकाएं प्रथमानुयोग से, आती है योग्यताएं चरणानुयोग से। पकती हैं पात्रताएं करणानुयोग से, तब झलकती है आत्मा द्रव्यानुयोग से।।
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तन रोगों की खान, धन भोगों की खान। ज्ञान सुखों की खान, दुख खान अज्ञान।।
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ज्ञान अन्न के समान है जैसे अन्न को अच्छी तरह पचा लेने के बाद ही अपना होता, उसी प्रकार पढ़ा हुआ ज्ञान आत्मसात करने पर ही अपना होता है।
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अनुभव हीन का ज्ञान बाचाल होता है, अनुभवी का ज्ञान गम्भीर, मौन और विनम्र हो जाता है।
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पापाचार से बचने के लिए ज्ञान की साधना जरूरी है।
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सम्यग्ज्ञान युक्त मन हो तो धर्म में लगता है, विषयों से विरक्त होता है, नम्रता धारण करता है।
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ज्ञानदायिनी माँ सरस्वती के चार हाथ हैं जिनमें क्रम से वीणा, शास्त्र, माला और आशीर्वाद के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं जिनसे हमें निम्न लिखित सीख प्राप्त होती है- 1.कम बोलो, काम का बोलो, 2.मीठा बोलो, 3.धीरे बोलो, 4.जरुरत होने पर बोलो। 2.शास्त्र से-ज्ञानी, करे कर्म की हानि। 3.माला से मौन एवं मन साधा जाता है, कायक्लेश तप की साधना होती है, पञ्च परमेष्ठी की भक्ति होती है, ध्यान की साधना होती है। 4.आशीर्वाद सबको अभयदान करना, सब जीवो पर मैत्री भाव करना, हथेली की तरह सबके प्रति साफ़ दिल होना, हमेशा शत्रु पर भी प्रसन्न होना सिखाता है।
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