Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Knowledge & Wisdom

ज्ञान

800 सूत्र · पृष्ठ 6 / 11

जो देशों में भ्रमण करता है और जो विद्वानों के सान्निध्य में रहता है, उसकी बुद्धि जल पर पड़े तेल के समान विस्तृत हो जाती है नहीं तो जल में पड़े जमे घी के समान संकुचित रहती है।
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आयु बढ़ने से, यश फैलने से, बार-बार प्रश्नों को पूछने से, गुरु के साथ रहने से, स्वयं ही अच्छी तरह विचार करने से, अच्छे लोगों के साथ वार्तालाप करने से, मन में प्रेम भाव बढ़ाने से और अनुकूल स्थान में वास करने से मनुष्य की बुद्धि परिपक्व हो जाती है।
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अध्ययन आनन्द, अलंकरण तथा योग्यता के लिए उपयोगी है।
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अक्षरों का उच्चारण ऐसे ढंग से करना चाहिए जैसे व्याघ्री कोमल बच्चों को दाँतों से पकड़े हुए भी उन्हें गिराने और कटने से बचाती हैं।
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भले ही भुजाओं में बल न हो पर मस्तिष्क में ज्ञान तो होना ही चाहिए।
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शिक्षित मनुष्य अशिक्षित मनुष्यों से उतने ही श्रेष्ठ हैं, जितने जीवित मनुष्य मृतकों से श्रेष्ठ है।
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मनुष्य ने जगत् में जो कुछ सत्य और सुंदर पाया है और पा रहा है उसी को साहित्य कहते हैं।
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साहित्य, संगीत और कला में जिनकी रुचि नहीं होती ऐसे मनुष्य बिना सींग-पूँछ वाले निरे पशु होते हैं।
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केश श्वेत होने से कोई वृद्ध नहीं होता, जो युवा होते हुए भी अध्ययन शील है, देवगण उसी को वृद्ध श्रेष्ठ मानते हैं।
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अहंकार, क्रोध, भोग, रोग और आलस इन पाँच कारणों से व्यक्ति शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता है।
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सच्ची शिक्षा तो वह है जिसके द्वारा हम अपने को, आत्मा को, ईश्वर को और सत्य को पहचान सकें।
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जीवन को सफल बनाने के लिए शिक्षा की जरूरत है, डिग्री की नहीं, हमारी सही डिग्री है—हमारा सेवाभाव, हमारी नम्रता, हमारे जीवन की सरलता, अगर यह डिग्री नहीं मिली और हमारी आत्मा जाग्रत नहीं हुई, तो कागज की डिग्री व्यर्थ है।
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शिक्षित के लिए सभी देश और सभी नगर अपने बन जाते हैं।
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साहित्य का लक्षण मनुष्यता ही है, जिस पुस्तक से यह उद्देश्य सिद्ध नहीं होता, जिससे मनुष्य का अज्ञान कुसंस्कार और अविवेक दूर नहीं होता, जिससे मनुष्य शोषण और अत्याचार के विरुद्ध सिर उठाकर खड़ा नहीं हो पाता, जिससे वह छीना-झपटी, स्वार्थ परता और हिंसा के दल-दल से उबर नहीं पाता वह पुस्तक किसी काम की नहीं है।
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ज्ञानी पुरुषों को संसार का भय नहीं होता है।
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पुस्तकालय ऐसा मंदिर है जहाँ प्राचीन संतों के सद्गुणों से परिपूर्ण तथा निर्भ्रान्त पाखण्ड रहित अवशेष सुरक्षित रखे जाते हैं।
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जो व्यक्ति पढ़ता है, लिखता है, सूक्ष्म निरीक्षण करता है, प्रश्न पूछता है और विद्वानों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि सूर्य से कमलनियों के समान विकसित हो जाती है।
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विद्वान् पुरुष सर्वत्र आनन्द में रहता है और सर्वत्र उसकी शोभा होती है, उसे कोई डराता नहीं है और किसी के डराने पर वह डरता भी नहीं है।
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पतित अथवा पथभ्रष्ट होकर भी बुद्धिमान पुरुष पुनः उठ जाता है किन्तु मूर्ख नहीं उठ पाता है।
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कभी कोई प्रज्ञा से पार नहीं पा सकता है।
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मनुष्य अध्ययन से पूर्ण, वार्तालाप से तत्पर और लेखन से सटीक बनता है।
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अकेला विद्वान् लाखों मूर्खों को जीत सकता है।
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द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अधिक कल्याणकारी है।
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जो उपदेश नहीं सुनते, वे भर्त्सना सुनने के लिए मजबूर होते हैं।
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जिस उपन्यास को समाप्त करने के बाद पाठक अपने अंदर उत्कर्ष का अनुभव करें, उसमें सद्भाव जाग उठे, वही सफल उपन्यास है।
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पढ़कर आनन्द के अतिरेक से आँखें यदि गीली न हो जायें तो वह कहानी कैसी?
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शास्त्र कटु औषधि के समान अविद्या रूप व्याधि का नाश करता है, काव्य आनन्ददायक अमृत के समान अज्ञान रूप रोग का नाश करता है।
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विद्वानों का उपदेश जिन्हें न तो शब्द ज्ञान है और न अर्थ ज्ञान, उनके लिए भी कर्ण प्रिय होता है।
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गुरु शिष्य को यदि एक अक्षर भी पढ़ा देता है, तो दुनिया में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जिसको देकर शिष्य ऋण रहित हो सकता है।
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अध्ययन करने वाले का मूर्खत्व और जप करने वाले का पाप नहीं रहता है।
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सभी लोग स्वभाव से ही ज्ञान चाहते हैं।
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जिस प्रकार सदा माँजा जाने वाला दर्पण निर्मल रहता है, उसी प्रकार ज्ञान अभ्यास से पुरुषों की बुद्धि निर्मल रहती है।
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इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह कुछ भी नहीं है।
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प्रकृति की अपेक्षा अध्ययन के द्वारा अधिक मनुष्य महान् बने हैं और अध्ययन केवल एकान्त में किया जाता है।
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आज पढ़ना सब जानते हैं, पर क्या पढ़ना चाहिए, यह कोई नहीं जानता है।
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जिसे पुस्तक पढ़ने का शौक है, वह सब जगह सुखी रह सकता है।
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पढ़ने से सस्ता कोई मनोरंजन नहीं, न कोई खुशी उतनी स्थायी है।
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जो पुस्तकें तुम्हें सबसे अधिक सोचने के लिए विवश करती हैं, वे पुस्तकें तुम्हारी सबसे बड़ी सहायक हैं।
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पुस्तकों की कीमत रत्नों से भी अधिक है क्योंकि रत्न बाहरी चमक-दमक दिखाते हैं जबकि पुस्तकें अन्तःकरण को उज्ज्वल करती हैं।
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अगर आपके पास दो रुपये हैं तो एक रुपये से भोजन और एक रुपये से अच्छी पुस्तक खरीदें, भोजन जीवन देगा, अच्छी भोजन जीवन जीने की कला देगी।
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पुस्तक पास में हो तो मित्रों की कमी नहीं खटकती है।
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पुस्तकें विचारों के युद्ध में अस्त्र का काम करती है।
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यदि कोई पुस्तक पढ़ने के योग्य है तो वह खरीदने के योग्य भी है।
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सिर्फ पुस्तकें पढ़ने से कुछ नहीं सीखा जा सकता, जब तक कि उन पर मनन न किया जाये।
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पुस्तक से रहित कमरा आत्मा से रहित शरीर के समान है।
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आज के लिए और सदा के लिए सबसे बड़ा मित्र हैं अच्छी पुस्तकें।
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रात-रात भर प्रार्थना करने कि अपेक्षा एक घंटा दूसरों को ज्ञान देने में खर्च करना अधिक अच्छा है।
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वह लेखक सबसे अच्छा लिखता है, जो अपने पाठकों का सबसे कम समय लेकर उन्हें सबसे अधिक ज्ञान देता है।
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लेखनी तलवार से अधिक शक्तिशाली होती है।
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विपत्ति में भी जिस हृदय में सद्ज्ञान उत्पन्न न हो, वह एक ऐसा सूखा वृक्ष है जो पानी पाकर पनपता नहीं बल्कि सड़ जाता है।
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विद्वान् की संसार में प्रशंसा होती है, विद्वान् सारे भूमंडल का गौरव है, विद्या से सभी कुछ मिल जाता है और विद्या की सभी जगह पूजा होती हैं।
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ज्ञान प्राप्त करने के लिए श्रद्धावान होना आवश्यक है उसके साथ इन्द्रिय संयम भी, तब शीघ्र ही शान्ति की प्राप्ति होती है।
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आजकल शिक्षा तो रोटी कमाने का एक धंधा सा हो गया है, यह शिक्षा नहीं, मजदूरी है, उससे राष्ट्र की उन्नति नहीं, उलटे अवनति ही होगी।
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अशिक्षित बालक किसी सभा में जाने पर उपेक्षित रहता है, जैसे हंसों के बीच बगुला।
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शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य व्यक्तित्व का विकास कर आत्म निर्भर बनना है।
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संसार में जितने प्रकार की प्राप्तियाँ हैं, उनमें शिक्षा सबसे बढ़कर है।
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विदेशी माध्यम के द्वारा वास्तविक शिक्षा असंभव है।
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स्वाध्याय ज्ञान, संयम और आत्म विकास का सर्वोत्तम साधन है।
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बलवान से बुद्धिमान और शक्तिमान से ज्ञानवान अधिक शक्तिशाली होता है।
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विनम्रता, जिज्ञासा और सेवा से ज्ञान प्राप्त होता है, ज्ञान के समान पवित्र करने वाली और कोई चीज नहीं है।
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शिक्षित लोग ही आँख वाले कहलाते हैं अशिक्षितों के शिर में तो केवल दो गड्ढे होते हैं।
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विद्वान् जहाँ कही भी जाता है, ज्ञान और मधुर व्यवहार की वजह से अपने साथ आनन्द ले जाता है, लेकिन वहाँ से विदा होता है तो पीछे दुःख छोड़ जाता है विद्वान् का वियोग लोगों को खटकता है।
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विद्वान् के लिए सभी जगह उसका घर है और सभी जगह उसके स्वजन हैं फिर लोग मरने के दिन तक विद्या प्राप्त करते रहने में असावधानी क्यों करते हैं?
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मनुष्य ने एक जन्म में जो विद्या प्राप्त कर ली है, वह उसे समस्त आगामी जन्मों में भी उच्च और उन्नत बनायेगी।
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विद्वान् का दरिद्र होना निःसन्देह बुरा है किन्तु मूर्ख के अधिकार सम्पत्ति का होना तो और भी बुरा है।
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सूक्ष्म तथा शुभ तत्त्वों में जिसकी बुद्धि का प्रवेश नहीं है, उसकी सुन्दर देह मिट्टी की अलंकृत मूर्ति के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
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यदि कोई मनुष्य विद्वान् न हो, तो भी उसे उपदेश सुनने दो क्योंकि जब उसके ऊपर संकट पड़ेगा, तब उन उपदेशों से ही उसे कुछ सान्त्वना मिलेगी।
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जो पुस्तकों के ज्ञान द्वारा अपनी सहजबुद्धि की अभिवृद्धि कर लेते हैं, उनके लिए कौन-सी बात इतनी कठिन है, जो उनकी समझ में न आ सके।
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जो लोग अपने प्राप्त किए हुए ज्ञान को समझाकर दूसरों को नहीं बता सकते हैं, वे उस फूल के समान हैं, जो खिलते तो हैं पर सुगन्धि नहीं देते हैं।
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विद्वानों की विद्वत्ता अपने पूर्ण तेज के साथ सुसम्पन्न गुणियों की सभा में ही चमकती है। सर्व जनहिताय की बुद्धि से उपदेश देना किन्तु मूर्खों की बातों पर ध्यान न देना।
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तुमने जो ज्ञान प्राप्त किया है, उसको विद्वानों के सामने खोलना सीखो और जो बात तुम्हें मालूम नहीं है, वह उन लोगों से सीख लो, जो उसमें दक्ष है।
ज्ञान
स्वाध्याय से बढ़कर सज्जनों के लिए कोई अच्छी आदत नहीं हो सकती है।
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मैंने अब जाना कि त्याग से बड़ा सुख नहीं है, विद्या के समान नेत्र नहीं है तथा समीचीन दृष्टि के समान बल नहीं है।
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ज्ञानाभ्यासी जीव तीन गुप्ति का धारक जितेन्द्रिय और एकाग्रचित्त होता है इसलिए सम्यग्ज्ञान उत्कृष्ट तप है।
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शास्त्र रूपी अमृत का पान करने से कान सफल होते हैं कुशास्त्र सुनने से पाप देने वाले होते हैं।
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