Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Devotion

भक्ति

456 सूत्र · पृष्ठ 2 / 7

आँख खुले तो जिनदेव को देखना एवं आँख बंद हो तो निजदेव को देखना चाहिए।
भक्ति
श्रावक अभिषेक के समय प्रभु के और आहार दान के समय गुरु के अति निकट होता है, तब दो बासों के घर्षण के समान भक्ति व चारित्र की ज्योति प्रकट होती है।
भक्ति
जो कुछ आपके पास है अतिशीघ्र प्रभु को समर्पित कर दो क्योंकि पता नहीं किस क्षण सब छोड़कर जाना पड़ जाये।
भक्ति
आपत्ति, दुःख और चिंताएँ इसलिए आती हैं कि परमात्मा को याद करने का समय निकाल सकें, आत्मदर्शन कर सकें तथा दूसरों के दुःखों का अनुभव कर सकें।
भक्ति
जो भक्ति में तत्पर होता हुआ जिनालय में चंदोबा देता है वह निश्चित ही एक छत्र राज्य प्राप्त कर निर्वाण प्राप्त करता है।
भक्ति
जो मनुष्य पुण्य के हेतु जिनालय में घण्टा देता है वह घण्टा आदि से सहित विमान को प्राप्त कर मुक्ति का वर होता है।
भक्ति
अनुशासन, कर्त्तव्यनिष्ठा और विश्वसनीयता ये तीन ऐसे गुण हैं, जिन्हें देखकर गुरु खुश होते हैं।
भक्ति
सन्त के हाथों से लिखा गया हर शब्द 'ग्रन्थ' होता है और सन्त के मुँह से निकला हुआ हर शब्द 'मंत्र' होता है।
भक्ति
गुरु अच्छा और सच्चा होना चाहिए।
भक्ति
गुरु जीवन को साक्षर नहीं अपितु सार्थक भी करते हैं।
भक्ति
गुरु से कुछ छिपाने का तात्पर्य है स्वयं को अशुद्ध रखना।
भक्ति
स्वाध्याय से भी अधिक श्रेष्ठ है गुरु सेवा।
भक्ति
गुरु के निर्देशन के आगे अपना चिन्तन एक किनारे रखना चाहिए।
भक्ति
जहाँ गुरुओं के प्रति भक्ति व प्रेम उमड़ता है वहाँ कर्त्तव्य स्वयं दौड़ लगाने लगते हैं।
भक्ति
सम्यक् शिष्य गुरु के वचन को अमृत समझकर स्वीकार करता है।
भक्ति
गुरु वही हो सकता है, जो गुणों और चरित्र में ज्यादा भारी है।
भक्ति
संन्यासी का जन्म माँ की कोख से नहीं, गुरु के वरद हस्त से होता है।
भक्ति
गुरु के निकट होकर दूर होना श्रेष्ठ नहीं, दूर होकर निकट होना अतिश्रेष्ठ है।
भक्ति
गुरु का विश्वास पात्र बनना, उनका मन जीतना, जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
भक्ति
जिसके जीवन की डोर गुरु के हाथ होती है उसकी पतंग आकाश में नहीं अनन्त आकाश की भी यात्रा करती है।
भक्ति
गुरु स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं, परमार्थ सिद्धि के लिए उपदेश देते हैं।
भक्ति
जैसे चार सौ चाचा की अपेक्षा एक पिता श्रेष्ठ होता है, वैसे ही हजारों संतों की अपेक्षा एक गुरु श्रेष्ठ होता है।
भक्ति
यदि आपका शिष्यत्व ही झूठा है तो आप कभी गुरु न पा सकोगे।
भक्ति
बुद्धिमान लोग गुरु का ऋण बहुत मानते हैं क्योंकि ऋण तो आसानी से लौटाए जा सकते हैं किन्तु ज्ञान का ऋण सबके लिए लौटाना सम्भव ही नहीं है।
भक्ति
यदि इहलौकिक व पारलौकिक सुख-प्राप्ति में बाधा न पड़ती हो तो गुरु के वचनों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
भक्ति
भगवान् बैठे हुए मुनि हैं और 'मुनि' चलते फिरते भगवान् हैं।
भक्ति
सन्तों के शब्द उन्हें समझ में आते हैं, जो श्रद्धा से भरे होते हैं।
भक्ति
सन्त जलते हुए दीप हैं, जो बुझे हुए दीपों को जलाते हैं।
भक्ति
पदार्थ का स्पर्श करते ही जिह्वा स्वाद को जान लेती है उसी प्रकार श्रद्धालु भी पलक झपकते ही सन्त को पहचान लेते हैं।
भक्ति
सन्तों की कृपा दृष्टि भाग्य तक बदल देती है।
भक्ति
हृदय का मैल जल से नहीं, सन्तों की चरण रज से साफ होता है।
भक्ति
तपस्वी का मुख मंडल ऐसा होना चाहिए कि जो तपस्वी नहीं है, वे भी तपस्या की ओर उन्मुख हो जाएँ।
भक्ति
मन में भगवान् का स्मरण बना रहे और मर्यादा का उल्लंघन न हो, यही सन्त का लक्षण है, संत प्रत्यक्ष शिक्षा न देते हों, तो भी उनकी सेवा करनी चाहिए।
भक्ति
धनी लोग तो दूसरे को नौकर बनाते हैं, पर सन्त लोग दूसरे को भी सन्त ही बनाते हैं। संत जिस पर प्रसन्न होते हैं वह सदा सुखी रहता है।
भक्ति
दुनिया पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं करना, वह कब, किस ओर लुढ़क जाए पता नहीं, गुरु जो रास्ता दिखाए, बस उसी पर चलना। वह सुई कभी नहीं खोती जिसमें धागा होता है। उसी प्रकार वह जीव कभी नहीं रोता जिसके अंदर जिनवाणी रूपी सूत्र होता है।
भक्ति
दूध में चावल मिलाने से खीर बनती है, सद्गुरु के चरणों में झुकने से तकदीर बनती है।
भक्ति
सच्चे गुरु से ज्यादा कठिन समर्पित शिष्य का मिलना है।
भक्ति
गुरु के चरणों में समर्पण सिर पर ही नहीं सिद्धालय में भी बिठा देता है।
भक्ति
गुरु को शिष्य के मन का और शिष्य को गुरु के तन का ख्याल रखना चाहिए।
भक्ति
गुरु जो करें वह नहीं अपितु गुरु जो कहें वह करना चाहिए।
भक्ति
कितनी भी परेशानी आ जाये पर आप गुरु को मत छोड़ना।
भक्ति
दीक्षा गुरु एक हो सकते हैं, शिक्षा गुरु अनेक हो सकते हैं परन्तु श्रद्धा गुरु तो तीन कम नौ करोड़ होते हैं।
भक्ति
गुरु को खुश करने का उपाय सिर्फ गुरु की विनय है।
भक्ति
संसार में भाई तो इस लोक में प्रीति उत्पन्न करता है किन्तु गुरु तो इसलोक परलोक दोनों में प्रीति उत्पन्न करते हैं।
भक्ति
गुरु आज्ञा भंग करने वाले शिष्य की कभी समाधि नहीं हो सकती है।
भक्ति
गुरु को मनाने में अहंकार का भूत चढ़ सकता है, पर गुरु की मानने से कल्याण होता है।
भक्ति
जो गुरु, शिष्य को एक अक्षर भी पढ़ाता है, उसे पृथ्वी पर ऐसा कोई पदार्थ नहीं जिसे देकर ऋण रहित हो सकें।
भक्ति
शिष्य को गुरु के पास आनंद प्राप्त न हो तो उसे दूसरे गुरु का आश्रय ले लेना चाहिए।
भक्ति
जीवन में गुरु गुणगान कहने से कभी पीछे न हटें।
भक्ति
जिससे एक अक्षर भी सीखा हो, उसका आदर करो।
भक्ति
सन्तों के चरण छूने से पुण्य मिलता है और उनके आचरण को छूने से परमात्मा मिलता है।
भक्ति
मुनियों को नमस्कार करने से उच्च गोत्र, दान देने से भोग, उपासना से पूजा प्रतिष्ठा, भक्ति से सुन्दर रूप की और स्तवन से कीर्ति की प्राप्ति होती है।
भक्ति
हे वीतराग! तुम्हारी पूजा करने की अपेक्षा तुम्हारी आज्ञा का पालन करना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
भक्ति
परमेश्वर पर विश्वास करने वाले व्यक्ति को ऐसा कोई व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे किसी को असुविधा हो।
भक्ति
दुनिया में वे लोग अभागे नहीं जिनके पास दुकान-मकान, कार-बंगला, धन-दौलत, पुत्र-सम्पदा नहीं, बल्कि सच्चे अभागे तो वे हैं जिनके पास प्रभु भक्ति के लिए और सत्संग के लिए समय नहीं है अर्थात् जिनके ऊपर प्रभु की छत्रछाया व गुरु की कृपा नहीं है।
भक्ति
आज के बुद्धिमान व्यक्ति 'श्रद्धा-विश्वास' को मूर्खता की श्रेणी में रखते हैं।
भक्ति
शास्त्रों को साधुओं के लिए और मूर्तियों को पुजारियों के लिए सौंप दिया इसलिए मंदिर खाली हो गये हैं।
भक्ति
किसी का सहारा लिए बिना कोई ऊँचा नहीं चढ़ सकता, अतः सबको किसी प्रधान आश्रय का सहारा लेना चाहिए।
भक्ति
प्रार्थना से आन्तरिक शक्ति बढ़ती है।
भक्ति
जहाँ गुरु निन्दा चल रही हो वहाँ कान ढक लेना चाहिए या अन्यत्र चले जाना चाहिए क्योंकि जो दूसरों के द्वारा की गई गुरु अथवा स्वामी की निन्दा को सुनता है तथा सुनकर कुपित नहीं होता वह पुरुष कृतघ्न कहलाता है।
भक्ति
लोगों की विचित्रता देखो–परमात्मा की पूजा के लिए बहाने बनाते हैं कि समय नहीं है और कुर्सी के राग में कम्बल पैसों को बाँटने घर-घर घूमते हैं, लौकिक पद की लोलुपता में पैसा बाँट कर समय बर्बाद कर रहे हैं और परम पद के लिए समय नहीं है।
भक्ति
करना चाहते हो तो सेवा करो, जानना चाहते हो तो अपने आप को जानो और मानना चाहते हो तो प्रभु को मानो तीनों का परिणाम एक ही होगा।
भक्ति
राम के योग्य काम किए बिना राम नाम लेना पूर्ण सार्थक नहीं है।
भक्ति
प्रतिमा को देखकर अपनी प्रतिभा को जगाएँ।
भक्ति
१०० काम छोड़कर स्नान, १००० काम छोड़कर भोजन, लाख काम छोड़कर प्रभु दर्शन और करोड़ काम छोड़कर सत्संग करना चाहिए।
भक्ति
गलत कार्य करने के पश्चाताप का एक मात्र उपाय है पंचपरमेष्ठी की आराधना करना।
भक्ति
प्रेम के बिना जीवन उस वृक्ष की तरह है जिसमें फल कभी नहीं लगते हैं।
भक्ति
भगवान् तो मात्र मन्दिर में मिलते हैं पर भगवान् बनने की भावना तो लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश में हो सकती है।
भक्ति
भगवान् की पूजा ही न करें अपितु भगवान् बनने का पुरुषार्थ भी करें।
भक्ति
प्रमुदित, उत्साहित मन से जो साधना व आराधना की जाती है, वह प्रबल फल को प्रदान कराती है।
भक्ति
महापुरुषों का सर्वश्रेष्ठ सम्मान हम उनका अनुकरण करके ही करते हैं।
भक्ति
दु:ख में साथ देने वाला भगवान् होता है, सुख में साथ देने वाला इंसान, लेकिन आप क्या हैं?
भक्ति
जीते जी आप जिनके न हो पाये तो कम से कम मरते वक्त तो उनके हो जाइये।
भक्ति
दवा से तन स्वस्थ होता है किन्तु दुआ से मन स्वस्थ होता है।
भक्ति
दवा के लिए धन चाहिए, जबकि दुआ के लिए सच्चा सहज सरल मन चाहिए।
भक्ति