Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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1104 सूत्र · पृष्ठ 13 / 15

जीवन में तेरह गुण- आत्मसंयम, मौनभाव, नियमितता, दृढसङ्कल्प, मितव्ययता, उद्यमता, लगन, न्याय, परिमित वचन, स्वच्छता, शान्ति, पवित्रता एवं विनम्रता ये 13 गुण जीवन में विकास के हेतु हैं।
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उदारता, दयालुता, नम्रता, स्नेह युक्त और परोपकार करने वालों को कुछ भी असम्भव नहीं है।
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लोक व्यवहार के लिये छः बातें- 1.किसी को डांटना नहीं, 2.दबाना नहीं, 3.अलोचना नहीं करना, 4.गुणों की हार्दिक प्रशंसा करना, 5.किसी की ज्यादा निगरानी नहीं करना, 6.गुणवानों के प्रति नम्रता रखना।
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आभूषण- हाथ का आभूषण दान, कण्ठ का आभूषण सत्य, कान का आभूषण शास्त्र श्रवण, मीठे वचनों पूर्वक दान, गर्व रहित ज्ञान, क्षमा युक्त वीरता आभूषण है।
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तीन बातें- चैतन्य स्वभाव की प्रतीति करो, प्रेम पूर्ण व्यवहार करो, आलस कभी मत करो।
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सात बातें दुःखदायी- अधिक बोलना, व्यर्थ भटकना, अधिक शयन, अधिक भोजन, अधिक शृङ्गार, हीन भावना औरअहङ्कार दुःखदायी है।
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यशस्वी के आठ गुण- शान्त स्वभाव, उत्साह, सत्यनिष्ठा, धैर्य, सहनशक्ति, नम्रता, समता, साहस।
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चार काम न करों- बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो, और बुरा मत सोचो।
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पहले लोग दरवाजे पर लिखते थे- 'शुभ लाभ', 'बाद में लक्ष्मी जी सहाय करें' फिर 'वेलकम' अब 'कुत्ते से सावधान रहें' लिखने लगे हैं, अर्थात् हृदय की विशालता एवं विशुद्धि कम होती जा रही है।
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सीधे चलने पर गॉड(भगवान) बनते हैं उलटे चलने पर डॉग(कुत्ता) बनते हैं, निर्णय आपका है।
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पाँच भकार- 1.भाषा, 2.भेष, 3.भ्रातृ प्रेम, 4.भाव, 5.भोजन ये सब भारतीय संस्कृति के अनुरूप सात्विक होने चाहिए।
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बैल का दाँत, गाय का दूध, घोड़े की चाल व्यक्ति का व्यवहार एवं कन्या का रूप बिकता है।
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कलहकारी व्यक्ति की मूर्खता के चार गुण होते हैं– अहङ्कारी होना, दुर्वचनी, हठी, अहितकारी वाणी बोलना।
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विशालहृदय में ईर्ष्या का वास नहीं होता है तथा घृणा सेवा में बाधक है।
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समर्पित को धोखा देना महापाप है।
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जीवन भर रावण का काम किया, अन्त में शव को 'राम नाम सत्य है' सुनाते हैं। यह विडम्बना नहीं तो क्या है?
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जीवन आदर्श से बदलता है उपदेश से नहीं।
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आज परोपकार गौण और यश लिप्सा मुख्य हो गयी है।
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जीवन में इतने ज्यादा मीठे न बनें कि लोग चखें और चटकर जायें और इतने कडवे भी न बनें कि लोग चखें और थूँ-थूँ करने लग जायें।
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चिड़ियों की तरह हवा में उड़ना और मछलियों की तरह पानी में तैरना सीखने के बाद अब हमें इंसानों की तरह जमीन में चलना सीखना बाकी है।
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जय, विजय और प्रभुत्व की आकाङ्क्षा मानवता से पतित कर दानव बना देती है।
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सोच बदले विना चारित्र नहीं बदलता है, अभी तो उजाला दिख रहा है ऐसा मानकर भोजन कर लेते हैं, आलू का त्याग है झोल का नहीं, ऐसा मानकर झोल ले लेते हैं, जब तक चारित्र के प्रति दृढ़ता नहीं होती तब तक चारित्र नहीं पलता है।
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आपका उत्तम बर्ताव ही सौभाग्य को आकर्षित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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क्या आप दूसरों से ली गई वस्तु का पूरा ध्यान/सुरक्षा रखते हैं?
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क्या आप समाज और संस्कृति के संरक्षण में योगदान देने की भावना रखते हैं?
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क्या आप किसी के मेहमान बनते समय उसके काम में हाँथ बटाते हैं?
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जो सुख चाहो मित्र तुम तज दो बातें चार। चोरी चुगली जामनी (जमानत) और पराई नार।।
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क्या आप कभी दुष्टजनों के बीच भी सज्जनता का परिचय देते हैं?
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चन्दन बार-बार घिसे जाने पर भी उत्तम गन्ध से युक्त रहता है, सोना बार-बार तपाये जाने पर भी सुन्दर रहता है, गन्ना बार-बार निचोड़े जाने पर भी मधुर रहता है, सचमुच ही प्राणान्त होने पर भी महात्माओं की प्रकृति में विकार नहीं आता है।
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जो सम्पत्ति में विनय से नम्रीभूत रहते हैं, विपत्ति में स्वाभिमान रूप पर्वत के शिखर पर आरूढ़ रहते हैं और ज्ञान होने पर मौन रहते हैं या कम बोलते हैं ऐसे आश्चर्य कारक चारित्र के धारक सज्जन पृथिवी में जयवन्त रहते हैं एवं श्रेष्ठ माने जाते हैं।
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कामधेनु पशु है, कल्पवृक्ष लकड़ी है पारसमणि पत्थर है और चिन्तामणि भी पाषाण है अतःसज्जनों की समानता किसी से नहीं हो सकती है।
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जो किसी पर दोषारोपण कर प्रवचन नहीं करता, ईर्ष्या नहीं करता, अपनी स्तुति नहीं करता, दूसरे का उपहास नहीं करता, दूसरे की गुप्त बात नहीं कहता, क्रोध को मारता है, शान्ति को स्थिर रखता है, प्रीति से पीछे नहीं हटता तथा अहङ्कार रहित होता है उसे सत्पुरुष सदा 'सज्जन' कहते हैं।
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जो विना बुलाये किसी के घर में प्रवेश करता है, विना पूँछे बहुत बोलता है, अविश्वसनीय पर विश्वास करता है वह मूर्ख अधम नर है।
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दुर्जन चलनि की तरह दोषों को यत्न पूर्वक ग्रहण करता है और गुणों को दूर से ही छोड़ देता है।
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पिता का वंश निरर्थक है गुण ही सर्वत्र पूजे जाते हैं, लोग कृष्णजी को नमस्कार करते हैं उनके पिता को नहीं।
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सज्जनों के दूर रहने पर भी गुण दूत की तरह काम करते हैं जिस प्रकार केतकी की गन्ध को सूंघकर भोरें स्वयं आ जाते हैं।
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फूलों का सार इत्र है, जीवन का सार चरित्र है।
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हर्ष से परिपूर्ण दृष्टि और प्रीति से लहराता मन, सज्जनों को इतना ही सत्कार उचित जान पड़ता हैं, शेष कार्य शिष्टाचार का विस्तार है।
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आप की संस्कृति वस्त्रों पर हमारी संस्कृति चरित्र पर- विवेकानन्दजी अमेरिका गये, लोगों ने देखा, ये एक चोला पहन कर आये हैं, क्या यही विवेकानन्द हैं? हम लोग समझते थे कि ये टिप-टॉप होंगे, फिर एक व्यक्ति ने पूँछ लिया कि आपके देश की यही संस्कृति है? विवेकानन्दजी ने कहा आप की संस्कृति वस्त्रों पर टिकी है, हमारी संस्कृति चरित्र पर टिकी है, वस्त्र तो दर्जी बना सकता है पर चरित्र का निर्माण सिर्फ गुरू ही कर सकते हैं।
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न कोई प्यार, न कोई प्रशंसा- ईमानदार व्यक्ति किसी विद्वान के पास पहुँचा, बोला मैं ईमानदारी से जीवन यापन करता हूँ, पर कोई मेरी प्रशंसा नहीं करता और न प्यार, विद्वान ने कहा ईमानदारी अच्छी बात है, पर उसके साथ मधुर व्यवहार और सेवाभाव भी जुड़ा रहना चाहिये, यदि आप इतना करते हो तो फिर प्रशंसा की कमी नहीं रहेगी और न प्यार पाने की शिकायत करना पड़ेगी।
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इंसान की भूख इतनी बढ़ गयी कि वह संस्कृति और नैतिक मूल्यों को भी खाने लगा है।
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देश के प्रति ईमानदार- जापान में दो भारतीयों ने सिगरेट पीकर सड़क पर डाल दी, कुछ बच्चों ने उठाकर कचरादान में डाल दी, पूँछा आप क्या कर रहे हैं? बच्चों ने कहा! हम अपने देश की सड़कों को गन्दा नहीं देख सकते, आप अतिथि हैं इसलिये आपका स्वागत है।
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एक भारतीय विदेश इलाज कराने गया, उसको दूध की आवश्यकता थी, दूध वाले से माँगा, उसने कहा आज नहीं मिल सकता, कण्ट्रोल का दूध है, तुम चाहों तो मकान मालिक से लेलो, भारतीय ने कहा तुम पानी क्यों नहीं मिला लेते, उसने कहा तुम देश के गद्दार हो, विवाद हो गया, मकान मालिक ने उसको घर से निकाल दिया, गद्दार को हमारे देश में स्थान नहीं है।
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अच्छे इंसान बनाने की योजना- आइंस्टीन से किसी ने पूँछा संसार में इतना दुःख कलह क्यों है, जबकि विज्ञान ने एक से बढ़कर एक सुख-साधन दिये हैं, उत्तर मिला कि बस एक कमी रह गयी कि अच्छे मनुष्य बनाने की योजना नहीं बनी, देश व सम्प्रदाय के पक्षधर सभी दिखते हैं, पर ऐसे लोग नहीं दिखते जो अच्छे इंसान बनाने की योजना बनाये।
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व्यर्थता- गुण न हो तो रूप व्यर्थ है, नम्रता न हो तो विद्या व्यर्थ है, साहस न हो तो हथियार व्यर्थ है, होश न हो तो जोश व्यर्थ है, उपयोग न हो तो धन व्यर्थ है, भूख न हो तो भोजन व्यर्थ है, परोपकार जो न कर सके उसका जीवन व्यर्थ है।
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हम प्रगति की ऊँचाईयों को छू रहे हैं, और दूध की जगह दारू पी रहे हैं।
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पाश्चात्य संस्कृति- ए से एप्पल अर्थात् खाने से शुरू होती है, जेड से जेबरा (गधा) बनाकर समाप्त होती है, भारतीय संस्कृति अ से अरहन्त से शुरू होती है, ह से हरि अर्थात् भगवान् के नाम पूर्वक पूर्ण होती है।
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संस्कारित शिला- उद्यान में लतायें अपनी सुगन्धी दशों दिशाओं में फैला रही थी, वहीं एक विशाल शिला पड़ी थी, लतायें उसको देखकर हँसती और कहती की तुम इतने विशालकाय होकर भी पैरों से रौंदे और ठुकराये जाते हो, वह लज्जित होता था, उस उद्यान में एक शिल्पी आया, उसने संस्कारित करके मूर्ति बना दी, पुष्प मूर्ति के चरणों में पड़ा था, पुष्प ने पूँछा आपकी ये अवस्था कैसे हुयी कि मैं लोगों के सिर पे बैठने वाला, आज आपके चरणों में पड़ा हूँ? उत्तर दिया! शिल्पी ने 'अनावश्यक कलेवर हटाकर' संस्कारित कर दिया गुरु ने प्राणप्रतिष्ठा करके मुझे पूज्य बना दिया, 'जन्मतो जायते शूद्रः संस्कारात् द्विजमुच्यते' अर्थात् जन्म से सभी शूद्र होते हैं, संस्कार से ही उच्च कुलीन माने जाते हैं।
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मिट्टी का घड़ा, महिला के शिर पर खड़ा- जमीन में पड़ी मिट्टी ने घड़े से पूँछा, तुम्हारा और हमारा अंश और वंश एक है, फिर तुम सिर पर विराजे हो और मैं पैरों के नीचे पड़ी हूँ? घड़े ने कहा बहिन सत्य है किन्तु हमने खूब संस्कार रूप यातनाएँ सही हैं, कुम्हार ने सबसे पहले परिवार से जुदा किया, खोदा, पानी में गलाया, फिर रौंदा, लौंदा बनाकर चाक पर रखकर घुमाया, चीवर(कपड़े) से काटा, लकड़ी से पीटा, धूप में सुखाया, अवा में पकाया, इतने कष्ट सहे, तब सुन्दरी के सिर का सिंहासन मिला है, इसी प्रकार मानव को संस्कार मिलता है, तो पूज्य बनता है, गर्भ में भी संस्कार मिलता है, अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश करना गर्भ में ही सीख लिया था, किन्तु सुभद्रा को नींद आने से चक्रव्यूह से निकलना नहीं सीख पाया था, संस्कार से मुनि या राजा बनते हैं, राजरानी मदालसा ने अपने बैटों को मुनि के संस्कार डाले, खिलाती, सुलाती, झुलाती, पिलाती तब 'सिद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि, संसार माया परिवर्जितोऽसि। संसारस्वप्नं तज मोहनिद्रां, मदालसा वाक्यमुवाच पुत्र!॥' हे पुत्र! तु सिद्धों के समान है, केवलज्ञानियों के समान है, कर्म कलुषता से रहित है, संसार की माया से रहित है, तु संसार को स्वप्न के समान समझकर मोह रूपी निद्रा को छोड़ इत्यादि संस्कारों से सात बेटे मुनि बन गये, तब ससुरजी ने कहा बेटा एक पुत्र ऐसा दो, जो राज्य को चला सके, तब मदालसा ने उसको राजा बनने के संस्कार डाले 'त्वं शूरोऽसि (तुम शूर हो), त्वं वीरोऽसि (तुम वीर हो)' इत्यादि संस्कार देने से वह राजा बना।
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युग के आदि में भरत-बाहुबली लड़े थे, इसलिए हमने लड़ना सीखा, बाद मे उन्होंने संयम लिया, पर हमने संयम लेना नहीं सीखा, महाभारत सुनकर आये किसी व्यक्ति से पूँछा कि क्या सीखा? बोला! चाहे लड़ मरो, मगर किसी को पाँच पैसा भी मत दो, अर्थात् व्यक्ति बुराई ग्रहण करता है अच्छाई नहीं यह उसकी कमी है।
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योगत्रय का संस्कार-मन का संस्कार- सीता ने राम से कहा, कि लोगों के कहने से मुझे छोड़ा, पर धर्म नहीं छोड़ना। सीता रावण के यहाँ रही पर रावण का रूप और वैभव देखकर भी अडिग रही यह मन का संस्कार है। वचन का संस्कार जैसे- अंधे व्यक्ति से 'हे सूरदास जी! यहाँ से कोई निकला है'? मन सन्तुष्ट करने वाले वचन बोलना वचन का संस्कार है। काय का संस्कार- लोह मयी आभूषण पहनाने पर भी पाण्डव अडिग रहे, सुकौशल स्वामी को व्याघ्री ने खाया पर वे अडिग रहे।
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मैं रिश्वत वालों का अन्न नहीं लेता- एक थानेदार के पड़ोस में एक भिखारी भीख माँग रहा था, पड़ोसी ने दुत्कार दिया, वह आगे बढ़ गया, थानेदार को दया आई, भिखारी को आवाज देते हुये कहा! ठहरो मैं खाना भेजता हूँ, भिखारी अनसुनी करके आगे बढ़ गया, थानेदार ने समझा इसने सुना नहीं, उसने नौकर से कहा उसे रोटी दे आओ, नौकर ले गया, तो भिखारी ने मनाकर दिया, कहा! मैं रिश्वत लेने वाले का अन्न-जल ग्रहण नहीं करता, नौकर ने भिखारी को चार गालियाँ सुनाई और वापस आ गया, उसने थानेदार को बताया, थानेदार सुनकर सन्न रह गया, बहुत गुस्सा आई दर-दर का भिखारी होकर मेरी उपेक्षा करता है, लेकिन मन आत्म ग्लानि से भर गया, सब कुछ होने के बाद भी थानेदार को उथल-पुथल मच गई, उसने रिश्वत लेना छोड़ दिया, एक वर्ष बाद वही भिखारी दरवाजे पर खड़ा भीख माँग रहा था, 'दाता रोटी दे दो' थानेदार ने कहा मेरे जैसे रिश्वत खोर का तुम अन्न कैसे खाओगे? भिखारी ने हँसकर कहा! आप रिश्वत नहीं लेते, आपकी चरण रज माथे, थानेदार ने उसके चरण पकड़ लिए, और कहा! तुम मेरे सच्चे शिक्षक हो।
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बड़े न होते गुणन बिन, विरद बढ़ाई पाय। कहत धतूरे को कनक, गहना गढ़यो न जाय।।
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धाम पराया वस्त्र पर, पर सय्या परनार। पर घर वसवौ अधम ये, त्यागे विवुध विचार।।
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जाके किये लाज आवे, जग में अजस पावे, घनेन सो वैर होय, पापहु की बढ़ती। काय को कलेस होय, आपुस मे नेस (बिगाड) होय, नीचनि पे पेस होय, धर्म प्रीति हटती। कुल को अचार जाय, क्रिया को प्रचार जाय, हेय-उपादेय की समझ दूर पड़ती। देश, कुल, नृप, पुर, नीति के विरोधी, ऐसे कारज न करो, मीत तजो रीती अड़ती (विपरीत)।।
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रोगी, भोगी, आलसी, शङ्का, हठी अज्ञान। ये दुर्गुण दारिद्रय के सदा रहत भगवान्।।
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जुआ मांस और मदिरा वेश्या हिंसा चोरी जारी। सप्त व्यसन का सेवन करके करी नरक तैयारी।।
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'जुँआ' से धर्म, लक्ष्मी, सद्बुद्धि, सुख, सत्य, सन्तोष, प्रतिष्ठा, निष्ठा, विश्वास और सद्गति ये दस वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं।
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जुँआ- छोटा सा जुँआ सिर पर चढ़ जाये तो बैचेन होते हैं, यदि जुआ व्यसन शिर पर चढ जाये तो तन, मन, परिवार बैचेन होता है, जुआ हारने वाले को मृगमरीचिका की डोर में बाँध कर सर्वनाश के कगार पर लाता है, जीतने वाला लालच के मकड़जाल में फँसकर मारा जाता है, जुआ का खेल आग का खेल है, बर्बादी का अड्डा है, घर फूँककर देखा जाने वाला तमाशा है, देता कुछ है और लेता सब कुछ है, प्रलोभन का विष देता है और कुप्रवृत्तियों और विनाश को देता है।
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विना दी हुई वस्तु का जो ग्रहण करता है वही चोरी है, चोरी नरक वास का कारण है अतः 'चोरी' नहीं करनी चाहिए।
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चोरी को ज्ञानी पुरुष सबसे बड़ा पापास्रव का द्वार कहते हैं, चोर को चिड़ीमार, शिकारी तथा व्यभिचारी लोगों से भी अत्यधिक पापी माना जाता है।
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ब्राह्मण भोजन से सन्तुष्ट होते हैं, मयूर मेघ गरजने से, सज्जन पर की सम्पत्ति देखकर और दुर्जन पर की बिपत्ति देखकर सुखी होते हैं।
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विपत्ति में धैर्य, ऐश्वर्य होने पर क्षमाभाव, सभा में वचनों की चतुराई, युद्ध में पौरुष, यश में अभिरुचि, स्वाध्याय का व्यसन इतनी विशेषताएँ महात्माओं में स्वभाव से होती है।
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पगड़ी का पड़ाव बड़ों के शिर पर- घर में छोटे लड़के को भले ही लाड़ प्यार अधिक हो किन्तु पगड़ी तो बड़े लड़के को ही बाँधी जाती है, उसी तरह से सम्यक्त्व की भले ही प्रशंसा की गयी हो, लेकिन मोक्ष तो चरित्र से ही प्राप्त होता है।
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घर पर आए हुए शत्रु का भी सम्मान करना चाहिये, जिस प्रकार काटने के लिए आए हुए शत्रु को भी वृक्ष छाया देता है।
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वही मनुष्य जगत का उपकार कर सकता है, जो अन्दर से निर्मल है।
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विदेश में पशु सम्मेलन हुआ, सब जगह के पशु-पक्षी आये उनकी विशेषता बतलाई, बाद में भारतीय पशु-पक्षी को बताया, पिटारे में दो केंकड़े थे जो बाहर निकलना चाहते थे, लेकिन एक दूसरे की टाँग खींच कर गिरा देते थे, इसी तरह भारत के लोग किसी की भी उन्नति को देखकर उसे गिराना चाहते हैं।
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जब पृथ्वी पर कृतघ्नियों का भार बढ़ता है तब पृथ्वी भी काँपने लगती है अर्थात् भूकम्प आने लगता है।
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उत्तम पुरुष परोपकारी होता है बदले में कुछ नहीं चाहता है, मध्यम पुरुष अपना उपकार किये जाने पर प्रत्युपकार करता है परन्तु नीच पुरुष प्रत्युपकार नहीं करता है बल्कि उपकार किये जाने पर भी अपकार करता है।
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बुढ़िया को कूबड़ हो गया, लोग चिढ़ाते थे, वह दुःखी थी, एक व्यक्ति ने कहा माँ दुःखी मत होओ इसका समाधान मैं जानता हूँ, बुढ़िया ने पूँछा क्या ठीक करना जानता है? व्यक्ति ने कहा हाँ, तो ठीक कर दूँ? बुढ़िया बोली जब ठीक करना जानता है, तो लगाना भी जानता है? व्यक्ति बोला हाँ जानता हूँ, तब बुढ़िया ने कहा, मेरी कूबड़ रहने दे, जो मेरी मजाक करते हैं, उनकी पीठ पर एक-एक कूबड़ लगा दे, बस मेरा दुःख खत्म हो जायेगा, व्यक्ति दूसरों के दुःख को देखकर सुखी होना चाहता है जो असम्भव है।
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इंजीनियर की नहीं-इंसानियत की डिग्री चाहिए- डॉक्टर, इञ्जीनियर इत्यादि की डिग्री मिल सकती है पर इंसानियत की डिग्री नहीं मिल सकती क्योंकि इंसानियत की डिग्री कर्तव्य से आती है।
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दुनिया परिवार को नहीं व्यवहार को चाहती है।
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आदमी देवता न बने कोई गम नहीं, आदमी दानव न बने यह भी कम नहीं। न जिये दूसरों के लिए कोई गम नहीं, दूसरों को जीने दे यह भी कम नहीं ॥1॥ सत्सङ्ग सर्वोत्तम न मिला हो कोई गम नहीं, खराब सङ्गत से दूर रहें यह भी कम नहीं। न बन सके सहारा दूसरों का कोई गम नहीं, दूसरों का जबरन सहारा न छीनें यह भी कम नहीं ॥2॥ गिरे को न उठायें, कोई गम नहीं, दूसरों को न गिरायें यह भी कम नहीं ॥3॥
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महानता के तीन कारण- अभिप्राय में उदारता, कार्य सम्पादन में मानवता, सफलता में संयम।
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जीवन का विकास आसन से नहीं आचरण से होता है, आसन-शासन दोनों अस्थायी होते हैं।
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