Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Character

चरित्र

1104 सूत्र · पृष्ठ 14 / 15

दुर्जन की विद्या विवाद के लिए होती है, सज्जन की विद्या अज्ञान दूर करने के लिए होती है, दुर्जन का धन अहङ्कार के लिए होता है, सज्जन का धन दान के लिए होता है, दुर्जन की शक्ति दूसरों को परेशान करने के लिए होती है, सज्जन की शक्ति जीवों की रक्षा के लिए होती है।
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बेर और किशमिश- बेर की मृदुता ऊपर रहती और किसमिस की मृदुता भीतर बाहर एक सी होती है इसी तरह सज्जन भीतर बाहर से मृदु होते हैं, और दुर्जन बाहर से मृदु और अन्दर से कठोर होते हैं।
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जो वक्रता पूर्ण चिन्तन नहीं करता, वक्रता पूर्ण चेष्टा नहीं करता और वक्रता पूर्ण वचन नहीं बोलता तथा अपने दोषों को नहीं छुपाता है उसके 'आर्जव धर्म' होता है।
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मित्र अधिक पढ़कर ज्यादा नम्बर न ले आये, इसलिये सिनेमा के लिए निमन्त्रण देना।
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'मन में होए सो वचन उचरिये, वचन होए सो तन सो करिये' यह कथन महा मुनियों की अपेक्षा है जिनके मन में हमेशा प्राणी मात्र के प्रति दया का भाव रहता है, वे अपने मन के भाव वचन से कहते हैं तो प्राणियों का भला होता है, और शरीर से करते हैं, तो प्राणी मात्र का कल्याण होता है, अन्य प्राणियों के लिए इस तरह से है, कि मन में होए सो मन मे रखिये, वचन होए तन सो न करिए, अगर वे अपने मन की बात कहेंगे तो अन्य का अहित होगा, क्योंकि उनके मन में प्रायः दुर्भाव रहता है और करेंगे तो अनेकों का सत्यानाश होगा, दूसरी बात एकेन्द्रियादि के मन के विना भी मायाचारी होती है एवं ध्यान में लीन मुनिराज के आर्जव धर्म होता है तथा तीनों योगों से रहित सिद्धों के भी आर्जव धर्म होता है, अतः आंतरिक वक्रता का नाम माया एवं सरलता का नाम आर्जव धर्म है, मन वचन काय पौद्गलिक हैं और आर्जव धर्म आत्मिक गुण है।
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घर पर आये पड़ोसी के पुत्र को मिठाई, खिलौना आदि देना, जिससे उसकी माँ समझे कि इनका मेरे परिवार पर बड़ा स्नेह है।
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मालिक की दुकान पर मेहनत इसलिए करना कि मेरी चोरी न पकड़ में आ जाय।
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भोगों में रस लेते हुए भी ऊपर से विरक्ति दिखाना, मुझे तो शान्ति चाहिए, शरीर आत्मा भिन्न-भिन्न है, भोग तो बहुत भोगे इत्यादि।
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स्वर ताल से भक्ति करता है, ताकि लोग धर्मात्मा समझें और पुत्र का रिश्ता बड़े घर से हो जाय।
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लालच के कारण प्रतिमा स्थापित कराना, मन्दिर बनवाना, आहार दान देना, ताकि अधिक धन का लाभ हो।
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दुर्बलता बताते हुए प्रायश्चित्त लेना किसी दोष का प्रायश्चित्त पूँछ लेना और चुप चाप ले लेना। प्रकट दोषों का प्रायश्चित्त लेना, प्रतिष्ठा के लोभ में निर्दोष होकर भी प्रायश्चित्त लेना।
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नमक का त्याग हलुआ पुड़ी के लोभ से करना, अन्न का त्याग फल मेवा के लोभ से करना।
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महाराज को आहार देना है, तो छः वर्ष के बेटे को आठ वर्ष का बताते हैं, ट्रेन में सफ़र करना हो तो आठ वर्ष के बच्चे को चार वर्ष का बताते हैं।
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तुम आदमी की नहीं गधे की बात मानते हों- एक दिन पड़ोसी गधा माँगने आया तो बोल दिया गधा जङ्गल चरने गया है, इतने में अन्दर से रेंकने की आबाज आई, पड़ोसी ने कहा कि गधा अन्दर है! तो बोलता है तुम आदमी का नहीं गधे का विश्वास करते हो।
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गुमची- कुछ लोग गुमची की तरह होते हैं देखने में सुन्दर लेकिन दूसरी ओर काले होते हैं।
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बाण सीधा है पर घाव करता है, तमूरा टेड़ा है पर मिष्टवादी है, अतः मनुष्य को आकृति से नहीं, उसके कामों से उसे महत्त्व देना चाहिए।
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एक ठगिया- एक परिवार को प्रेत की बाधा थी, एक ठगिया ने प्रेत को भगाने के बहाने एक टङ्की बुलवायी उसमें घर का सारा सोना, चाँदी, रूपया आदि भरकर ले गया, उस समय परिवार के लोगों को बाहर निकाल दिया था, परिवार दो दिन बाद घर में आया देखा तो सब कुछ लुट गया था।
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बैरिस्टर चितरञ्जनदास मुखर्जी ट्रेन से यात्रा कर रहे थे, पूरा कम्पार्टमेंट खाली था, वे पेपर पढ़ रहे थे, वहाँ एक युवती आई और बोली मैं यहाँ बैठ जाँऊ? बैरिस्टरजी ने मौन स्वीकृति दे दी, थोड़ी देर अपनी विपत्ति बताई और गाड़ी ने जैसे ही स्पीड पकड़ी तो बोली हमें हजार रुपये दे दो नहीं तो मैं चिल्ला दूंगी कि एकान्त में ये मेरे साथ बदतमीजी कर रहे थे। बैरिस्टरजी ने इशारा किया न मैं बोल सकता हूँ और न ही सुन सकता हूँ। एक कागज में लिखकर दो उसने वही बात लिख दी। बैरिस्टरजी ने अच्छे ढंग से पढ़ा और जेब में रख लिया और गाल पर एक चाँटा मारा और कहा अब चिल्लाओ कितना चिल्लाती हो। वह चुप रह गयी और अपनी ही चाल में फँस गयी, उन्होंने उसे गिरफ्तार करवा दिया।
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मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी- एक व्यक्ति बहुत कुटिल था, वह जब मरने लगा तब अपने बेटों से बोला कि मैं जब मर जाऊँ तो मेरे हाथ पैर काटकर पड़ोसी के यहाँ फेक देना मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी।
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बाँस की जड़ की तरह वक्रता(टेढ़ापन) जीव को नरकगति में, भेड़ के सींग की तरह वक्रता जीव को पशुगति में, बैल की पैशाब की तरह वक्रता मनुष्यगति में और खुरपी की तरह वक्रता जीव को देवगति में ले जाती है।
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हमने पानी नहीं बेंचा- एक किसान के खेत में कुंआ था, उसने खेत बेच दिया कुछ दिन बाद वह खरीदने वाले को परेशान करने लगा कि हमने खेत और कुंआ बेचा है पानी नहीं बेचा, उसने परेशान होकर कहा कि आपका पानी हमारे कुँए में रहा, अब तुम किराया दो और अपना पानी ले जाओ, और हमारे खेत में एक बून्द भी पानी गिरना नही चाहिए, तब उसने क्षमा माँगी।
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श्री कृष्णजी का नेमिनाथजी के साथ छल- श्री कृष्णजी को यह चिन्ता थी, कि कहीं नेमिनाथजी हमारा राज न लेलें, इसलिए छल पूर्वक शादी रचवायी और पशुओं का बन्धन कराया जिसे देखकर श्री नेमिनाथजी ने वैराग्य धारण कर लिया था।
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रानी ने जहर पिलाया- राजा यशोधर की रानी अमृतमति कुबड़े नौकर पर मोहित थी, जब राजा को मालूम हुआ तो उसे वैराग्य हो गया। रानी रोने का स्वांग करने लगी, रानी ने कहा आप दीक्षा के पहले एक बार मेरे हाथ का भोजन कर लो, भोजन में जहर मिला दिया, राजा मर गया।
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सेठ मरकर मेढक बना- सेठ ने संकल्प किया कि, जब तक दीपक जलेगा तब तक सामायिक करेंगे, सेठ को प्यास की बाधा हुयी, इसी बीच सेठानी ने दीपक में पुनः तैल डाल दिया, सेठ आर्तध्यान से मरण कर मेंढक बना।
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इञ्जीनियर की सलाह- रिटायर्ड इञ्जीनियर से अनुभव पूँछे, उसने कहा जिस पुल का निर्माण करो उस पर अपना वाहन न चलाओ जिस छत को बनाओ उसके नीचे कभी मत सोओ।
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ओवर ड्यूटी-यदि दो दिन ड्यूटी पर नहीं जाता तो सरकार से पैसा कम नहीं लेता, यदि दो घण्टा ओवर ड्यूटी करता है तो उसका पैसा लेता है।
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माया नचाती है, यदि माया से बचना है तो प्रभु कीर्तन करो, कीर्तन का उल्टा नर्तकी होता है।
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चार प्रकार के लोग- 1.किशमिश की तरह बाहर भीतर से कोमल जीव देवगति को प्राप्त होते हैं। 2.नारियल की तरह बाहर से कठोर अन्दर से कोमल जीव मनुष्यगति को प्राप्त होते हैं। 3.बेर की तरह बाहर से कोमल अन्दर से कठोर जीव तिर्यंचगति को प्राप्त होते हैं। 4.छुहारे की तरह बाहर भीतर से कठोर जीव नरकगति को प्राप्त होते हैं।
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सज्जनों के मन वचन काय में एकता होती है, और दुर्जनों के मन में कुछ वचन में कुछ और काय में कुछ होता है।
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वनविहार में रामचन्द्र जी लक्ष्मण से कहते हैं! सरोवर में बगुले को देखो कितना धार्मिक है, जीव मर न जाए इसलिए धीरे-धीरे पैर रख रहा है, मछली कहती है- हे राम! बगुले की प्रशंसा क्यों करते हो, इसने तो हमारे वंश का ही विनाश कर दिया है, आप नहीं जानते सहवासी की चेष्टा को सहवासी ही जनता है।
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उपाध्याय, बहुरूपिया, धूर्त और वेश्या इनसे मायाचारी नहीं करना चाहिए क्योंकि माया को इन्होंने ही बनाया है।
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ऐसी कौनसी दृष्टि है जिसमें दोष नहीं है? ऐसी कौन सी दिशा है जिसमें दुःख नहीं है? ऐसी कौनसी प्रजा है जहाँ भेद-भाव नहीं है? और ऐसी कौनसी क्रिया है जिसमें मायाचारी नहीं है? अर्थात् लोक व्यवहार में प्रायः मायाचारी होती है।
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मायाचारी समस्त अविद्याओं की जन्मभूमि है, अपयश का घर है और पाप रूपी गड्ढे में गिराने वाली है ऐसा ज्ञानीजनों ने कहा है।
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माया में ढोंग से और सरलता में ढंग से जिया जाता है।
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हम समझते हैं कि हमारे छल को किसी ने नहीं देखा, लेकिन सामने वाला व्यक्ति जान लेता है।
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सर्प जमीन पर भले ही टेडा-मेडा चले पर बिल में प्रवेश करने के लिए सीधा होना ही पड़ता है, उसी प्रकार संसारी प्राणी भले ही मायाचारी करे पर आत्म स्वरूप में आने के लिए सीधा ही होना पड़ता है।
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मायावी का चेहरा धर्मात्मा जैसा लगता है, पर हृदय पापी का होता है, मायावी मन्दिर में कुछ और, बाहर कुछ और करते हैं, देखने वालों को मायावियों का आचार अच्छा लगता है, पर उनके विचार कौनसे नरक लेकर जायेंगे भगवान् ही जाने।
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क्रोधी सुधर सकता है, मानी भी सुधर सकता है, मायावी का चेहरा धर्मात्मा का दिखता है, पर हृदय पापी के समान होता है, अतः उसके सुधारने मे कठिनाई होती है।
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सीधी तलवार म्यान में प्रवेश नहीं करती, इसी प्रकार वक्र हृदय में धर्म प्रवेश नहीं करता है।
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छल करना पाप है, पर छला जाना पाप नहीं है, जो छल करता है, वह हमेशा चिन्तित ही रहता है, कि कहीं मेरी मायाचारी पकड़ में न आ जाए।
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मायावी का व्रत, तप सब निष्फल है।
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मायाचारी ज्ञात होने पर स्नेह भङ्ग हो जाता है, माँ भी प्रेम नहीं करती है।
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जिसके मन में मायाचारी भरी हो, वह प्रभावशाली व्यक्तित्व किस काम का?
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आँखों से गिरा आंसु और नजरों से गिरा व्यक्ति कभी उठ नहीं पाता है अतःमायाचारी करके किसी की नजरों से गिरना नहीं चाहिए।
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'माया तैर्यग्योनस्य' 'निःशल्यो व्रती' सुअर, कुत्ता आदि कोई नहीं बनना चाहता, पर मायाचारी नहीं छोड़ेंगे तो बाद में पशुगति की बासठ लाख योनियों में जन्म लेना ही पड़ेगा।
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व्रती मायाचारी मिथ्यात्व एवं निदान शल्य से रहित होता है।
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नहीं लहे लक्ष्मी अधिक छल कर कर्म बन्ध विशेषता- मायाचारी से अधिक लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं होती वल्कि कर्म बन्ध अधिक होता है।
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सरल स्वभावी होय ताके घर बहु सम्पदा- जो सरल होता है उसके पास बहुत धन होता है।
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दगा किसी का सगा नहीं, न मानो तो कर देखो। जिसने किया किसी के साथ, बिगड़ा उसका घर देखो।।
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कपट छिपाये न छिपे, छिपे न मोटा भाग। दावी दूवी न रहे, रुई लपेटी आग।।
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लाख छिपाओ छिप न सकेगा, राज ये कितना गहरा। दिल की बात बता देता है, असली नकली चेहरा।।
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मुनाफा चौगुना लेकर दिया ऊपर से ताना है, इसीलिये दे दिया सस्ता कि तु ग्राहक पुराना है। इसी बीच में आकर, किसी ने कह दिया उनसे, सज्जन तुम झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है।।
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कौन कहता है हम किस्मत के लिए रोते हैं। अब तो रिश्ते भी जरूरत के लिये होते हैं।
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चिन्तन कुछ फिर सम्भाषण कुछ। क्रिया कुछ की कुछ होती है।।
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मन मलिन तन सुन्दर ऐसे। विष से भरा कनक घट जैसे।।
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हमने जिसे सिखाया अङ्गुली पकड़-पकड़ के। वे आज चल रहे हैं तेवर बदल-बदल के।।
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उसे सब दुष्ट कहते हैं प्रकट जो पाप करते हैं। अधम से भी अधम वे हैं जो पर्दों में बिगड़ते हैं।।
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नमन-नमन में फेर है, अधिक नमे बेईमान। दगाबाज दूना नमे, चीता-चोर-कमान।
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दूसरों को खाई, अपने लिए कुँआ- एक दयालु सेठ गरीबों को रोज भोजन देता था, लेकिन सेठानी इस पक्ष में नहीं थी, वह कहती थी, कि मैं भोजन बनाकर परेशान होती हूँ, ये बनाया हुआ भोजन बाँट देते हैं। एक दिन सेठजी व्यापार हेतु किसी गाँव गये और सेठानी से बोल गये कि गरीबों को भोजन दे देना। सेठानी ने अवसर पाकर विषाक्त भोजन बना दिया। उस दिन सिर्फ एक ही गरीब भोजन लेने आया, वह भोजन को अपने घर ले जा रहा था रास्ते में भूख से पीड़ित सेठजी मिल गये, उसने वह भोजन सेठ को दे दिया उसका सेवन करके सेठ की मृत्यु हो गयी मायाचारी का फल तुरन्त मिल गया।
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मायाचार से मृदुमति मुनि त्रिलोकमण्डन हाथी बने- नगर के बाहर एक मुनिराज ने चार माह के उपवास किये और विना आहार किये विहार कर गये, उस स्थान पर अन्य मुनिराज आकर विराज मान हो गये, लोगों को मालूम नहीं था कि उपवास वाले ये ही मुनि हैं या नहीं, और मासोपवासी जानकर पूजा की, मुनिराज ने बताया नहीं की हम मासोपवासी नहीं है, इस माया के कारण वे मृदुमति मुनिराज मरकर पहले छठवें स्वर्ग में गये बाद में त्रिलोकमण्डन हाथी बने।
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माया का फल स्वयं ने पाया- एक ठाकुर था वह एक व्यापारी से द्वेष करता था, एक दिन व्यापारी उस गाँव में अपनी वसूली करने के लिए गया, तो उस ठाकुर ने अपने एक नौकर को नियुक्त किया कि इस रास्ते से व्यापारी आये तो तुम उसको मार डालना, भाग्य की बात व्यापारी दूसरे रास्ते से अपने घर चला गया। बहुत देर तक जब नौकर नहीं आया तो ठाकुर ने अपने लड़के को भेजा। जैसे ही नौकर को लड़का आता दिखा उसने गोली मार दी, उसने समझा यही व्यापारी है। माया का फल स्वयं को भोगना पड़ा।
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गड़रिया ने लोगों को ठगा, अन्त में प्राण गये- एक बालक भेड़ों को चराने नदी के उस पार ले जाता था और रोज चिल्लाता 'शेर आया-शेर आया' लोग उसको बचाने के लिए दौड़कर आते वह हँसने लगता, एक दिन वास्तव में शेर आ गया उसने चिल्लाया पर कोई उसे बचाने नहीं आया और शेर उसे खा गया।
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विद्यार्थी ने छल किया- एक लड़के ने चोरी की, गुरूजी ने बच्चों को लकड़ी दी और कहा कि जिस बच्चे ने चोरी की है, उस की लकड़ी दो इञ्च बड़ी हो जाएगी। जिसने चोरी की थी उसने अपनी लकड़ी दो इञ्च तोड़ दी, और वह पकड़ा गया।
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घुड़सवार से अपेक्षा- एक बुढ़िया ने जङ्गल में एक घुड़सवार से अपनी पोटली गाँव तक ले जाने को कहा उसने मना कर दिया। बाद में घुड़सवार के मन में आया की इसकी पोटली ले लेता हूँ और भाग जाता हूँ, ठीक यही विचार बुढ़िया के भी मन में आया कि अगर इसको पोटली दे देती और ये लेकर भाग गया होता तो? बाद में घुड़सवार पोटली लेने आया तो, बुढ़िया ने कहा जो तेरे दिमाग में आया वही मेरे दिमाग में आया।
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दो चेहरे- एक ही चेहरा समय-समय पर पापी और धर्मात्मा का बनता है, महाराज जयसिंह ने एक बिल्ली पाल रखी थी, वह बिलकुल शान्त बन गयी, राजा के साथ नित्य रहती थी, राजा उसके माथे पर दीपक रखकर पुराण पढ़ते थे, राजा उसकी खूब प्रशंसा करते थे, बिल्ली की परीक्षा करने के लिए मन्त्री ने एक चूहा छोड़ा तो बिल्ली के कान खड़े हो गये, दूसरा छोड़ा तो बिल्ली के रोंगटे खड़े हो गये, तीसरा छोड़ा तो बिल्ली ने छपट्टा मारा, दीपक गिर गया, तैल फैल गया और पुराण गन्दा हो गया, इसी प्रकार दुनिया में एक व्यक्ति के दो चेहरे होते हैं।
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आर्जव धर्म पापों का खण्डन कर सुख उत्पन्न करने वाला है, योगों की सरलता से पुण्य बन्ध और पाप की निर्जरा होती है।
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आर्जव धर्म संसार सागर से पार होने के लिए जहाज के समान है।
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सरल व्यक्ति की बैरी भी प्रशंसा करते हैं, उसको यश, धर्म, प्रीति की प्राप्ति होती है और दोनों लोकों में सफलता मिलती है।
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माया से संसार, और सरलता से मोक्ष मिलता है, वृक्ष यदि टेड़ा है तो कोयला बनता है सीधा है तो सिंहासन, जिस पर सन्त बैठते हैं।
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विशुद्ध भावना से किया गया कठोर आचरण भी सरलता की श्रेणी में आता है, जैसे माता-पिता या शिक्षक की डाँट।
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मयूर और कछुए की मित्रता- एक दिन मयूर को शिकारी ने पकड़ लिया और बोला राजा बदले में हमें रूपये देगा, कछुए ने पानी में से लाकर हीरा दिया, शिकारी बोला एक और लाकर दो तब छोड़ेंगे, कछुए ने कहा मित्र को छोड़ो और हीरा दो इसी नाप का लाकर देते हैं, मित्र को छूटा हुआ देखा तब बोला-तुम जैसे लोभी, धोके बाज को हीरा नहीं दण्ड मिलना चाहिए, ऐसा बोल कर पानी में चला गया।
चरित्र
गन्ना सीधा है उसकी मिठास स्वभाविक है, जलेबी टेड़ी है उसकी मिठास कृत्रिम है।
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माया तो ठगनी भई, ठगत फिरत संसार। जा ठग ने ठगनी ठगी, ता ठग को नमस्कार।।
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ज्ञानी आप ठगाइये और न ठगिये कोय। आप ठगे सुख ऊपजे, और ठगे दुःख होय।।
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बनारसीदास जी ने चोर की पोटली उठा दी- बनारसी दास जी के घर में चोरी करने आये चोरों ने सारा माल बाँधकर तैयार कर लिया, सब चोरों ने एक दूसरे को पोटली उठा दी, अन्त में एक चोर को पण्डित जी ने स्वयं पोटली उठवा दी, चोर घर पर गये, उनकी माँ ने पूँछा कि आज कहाँ पर डांका डाला, पता चला कि बनारसी दास के घर में डांका डाला है, तो माँ ने कहा की सरल स्वाभावी पण्डित जी का माल अपन को नहीं पचेगा, अतः सारा माल वापस करवा दिया।
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