Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 250

संयम संस्कृत सदन।

17 सूत्र

भोगी रोग को प्राप्त होता है, रोगी शोक को प्राप्त होता है, शोकवान क्लेश को प्राप्त होता है इसलिए समझदार को योगी अवस्था धारण करना चाहिये।
अनासक्ति
जन-जन में वैराग्य नहीं होता, घर-घर में सज्जन नहीं होते, भव-भव में सम्यग्दर्शन नहीं होता और हमेशा बुद्धि शुद्ध नहीं होती है।
अनासक्ति
वाहन में ब्रेक, घोड़े में लगाम, नदी में तटों का बन्धन जनोपयोगी बनकर सुरक्षित गन्तव्य पर पहुँचाकर सागर सा विराट रूप दिलाता है।
संयम
इन्द्रियों मे रसना, कर्मों मे मोहनीय, व्रतों मे ब्रह्मचर्य और गुप्तियों में मनोगुप्ति, ये चारों कठिनाई से जीते जाते हैं।
संयम
शास्त्र का पार नहीं है, आयु थोड़ी है एवं हम सब दुर्बुद्धि हैं, इसलिए वह सीख लेना चाहियें जिससे जन्म-मरण का क्षय हो जाए।
ज्ञान
चिर काल तक स्थिर रह कर भी विषय अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं, यदि उन्हें स्वयं छोड़ दिया जाए तो मोक्ष प्राप्त होता है, यदि वे छूटते हैं तो संसार प्राप्त होता हैं।
अनासक्ति
जिसका मन वश में है सारा जगत उसके वश में होता है और जो मन के वश में होता है वह सारे जगत के वश में होता है।
मन
कैसे चलें, कैसे बैठें, कैसे खड़े हों, कैसे सोयें, कैसे खाएं जिससे कि पाप का बन्ध न हो? देख कर चलें, यत्नाचार पूर्वक बैठें, यत्नाचार पूर्वक खड़े हों, यत्नाचार पूर्वक सोयें, यत्नाचार पूर्वक खाएं अर्थात् प्रत्येक कार्य में जीव रक्षा का ध्यान रखें। इससे पाप का बन्ध नहीं होगा।
अहिंसा
सोच विचार कर व्रत लेना चाहिये, लेकर प्रयत्न पूर्वक पालन करना चाहिये, अहंकार या प्रमाद से दोष लग जाने पर प्रायश्चित्त लेकर शुद्ध कर लेना चाहिये।
धर्म
तप करना, व्रत धारण करना, संयम धारण करना, जीव दया करना और अन्त में समाधि मरण करने से चारों गति सम्बन्धी दुःखों का निवारण हो जाता है।
समाधि
रविवार को नमक, सोमवार को हरी, मङ्गलवार को मीठा, बुधवार को घी, गुरूवार को दूध, शुक्रवार को दही, शनिवार को तैल का त्याग करना चाहिए।
आहार
न्याय पूर्वक आजीविका हो, नव देवता की पूजा करने वाला हो, प्रशस्त वचन बोलने वाला हो, धर्म, अर्थ, काम पुरुषार्थ का एक-दूसरे की क्षति करने वाला न हो, गृहस्थ धर्म के योग्य स्त्री हो, सत्सङ्गति वाला स्थान हो, अयोग्य कार्य के करने में लज्जा वाला हो, योग्य आहार-विहार करने वाला हो, गुणवानों की सङ्गति करने वाला हो, बुद्धिमान हो, इन्द्रिय जेता हो, धर्म कथा सुनने वाला हो, कृतज्ञ हो, दयालु हो, पाप भीरु हो वह श्रावक कहलाता है।
चरित्र
जिस प्रकार घर में आग लगने पर कुँआ खोदने का प्रयत्न करना व्यर्थ है, उसी प्रकार जब तक शरीर स्वस्थ है, जब तक वृद्धावस्था दूर है, जब तक इन्द्रियों में क्षमता है और जब तक आयु क्षय नहीं हुई है, तब तक बुद्धि मान को आत्म कल्याण के लिए महान प्रयत्न कर लेना चाहिए।
पुरुषार्थ
विपत्ति में धैर्य, अभ्युदय में क्षमाभाव, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पौरुष, यश में अभिरुचि, स्वाध्याय का व्यसन इतने गुण महात्माओं में स्वभाव से होते हैं।
चरित्र
जहाँ पर ज्ञान आगे है, लज्जा साथी है, तप का सम्बल है, चारित्र की पालकी है, ठहरने का स्थान स्वर्ग है, गुण रक्षक हैं, सरलता रुपी मार्ग है, समता रुपी घनी शीतल छाया है और दया की भावना है उस वाहन पर यात्रा करने वाले मुनि विना विघ्न के मोक्ष प्राप्त करते हैं।
धर्म
आत्मा बड़ी कठिनाई से जानी जाती है, जान लेने के बाद भावना भाना कठिन होता है, आत्मा की भावना भाने वाले पुरुषों को भी विषयों से विरक्त होना कठिन होता है।
अनासक्ति
दया, इन्द्रिय दमन, त्याग, ध्यान की परम्परा के मार्ग में सरलता के साथ प्रयत्न पूर्वक गमन करो, यह मार्ग अवश्य ही विकल्पों से रहित वचनातीत सुखों वाले स्थान में ले जाता है।
ध्यान