Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 24

कष्ट सहें और कड़वी बात सुनें

97 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

नींद, नशा और तेज रफ्तार दुघर्टना के कारण हैं।
आहार
बुद्धिमान की प्रशंसा उसकी अनुपस्थिति में करना चाहिए पर स्त्री की उसके सामने करना चाहिए।
Misc.
जो चीज पाप के उदय में प्रतिकूल होती है वही चीज पुण्य के उदय में अनुकूल हो जाती है, जो हवा मोमबत्ती की कमजोर लौं को बुझा देती है, वही हवा जङ्गल की आग को विकराल बना देती है।
कर्म
लड़कर प्राप्त करने से अधिक समर्पण से प्राप्त कर सकते हैं। दुविधा से बचोगे तो सुविधा में रहोगे।
पुरुषार्थ
व्यक्ति बोलकर जितना कष्ट पाता है उतना मौन रहकर नहीं। 'मूर्खों से बात न करें, समय बचेगा।
वाणी
कम बोलने का गुण आ जाय तो व्यक्ति बहुत बड़ा साधक बन जाय।
वाणी
सफलता के लिये लक्ष्य न बदलें, रास्ता बदल दें।
समृद्धि
उड़ान ऊँची हो लेकिन जड़ें मजबूत होना चाहिए।
चरित्र
मञ्जिले उन चरणों को मिलती हैं जो थमते नहीं, बात उन्ही की बनती है जो मुश्किलों में रुकते नहीं।
पुरुषार्थ
गलत करने से बचना है तो गलत बोलने से भी बचें।
सत्य
हम हीन नहीं होते, हीनता के शिकार होते हैं।
मन
विद्या की प्राप्ति पुस्तक के अध्ययन से होती है किन्तु विवेक सत्सङ्गति से आता है।
ज्ञान
सफलता यदि सरलता से मिल जायेगी तो उसका आनन्द ही समाप्त हो जायेगा।
समृद्धि
पीछे वालों पर हँसो मत, आगे वालों से जलो मत।
चरित्र
कोई भी लक्ष्य बड़ा नहीं, जीता वही जो डरा नहीं।
पुरुषार्थ
यदि हाथ की लकीरों से भाग्य बनता है, तो जिनके हाथ नहीं हैं क्या उनका भाग्य नहीं होता है?
पुरुषार्थ
फल पाने को चेहरा नहीं चाल बदलो।
चरित्र
सफलता पूँछने से नहीं जूझने से मिलती है।
पुरुषार्थ
सच्चे पुरूषार्थ में अच्छे फल शीघ्र ही लगते हैं।
पुरुषार्थ
यदि तुम आय से कम में निर्वाह कर सकते हो, तो सोना बनाने का पत्थर तुम्हारे पास है।
संतोष
कार्य करते हुये भयभीत होना मूर्खता है और कार्य करते हुये सावधान रहना बुद्धिमत्ता है।
पुरुषार्थ
भारतीय लोग धन से अधिक धर्म को, भोग से अधिक योग को एवं संस्कारों का आधार सदाचार को महत्त्व देते हैं।
चरित्र
भीड़ में गाड़ी के ब्रेक पर पैर और हार्न पर हाथ रखकर धीरे-धीरे गाड़ी निकाल ली जाती है, उसी प्रकार संसार से निकलने के लिये पञ्चेन्द्रियों के विषयों पर ब्रेक और धर्म का हार्न बजाते हुए मञ्जिल प्राप्त करना चाहिए।
संयम
अपनी बेटियाँ धनवान को नहीं धर्मवान को देना चाहिए।
परिवार
शादी के बाद एक सप्ताह तक ब्रह्मचर्य से रहकर दृढ़ भक्ति करना चाहिये, इससे धार्मिक सन्तान की प्राप्ति होती है।
ब्रह्मचर्य
पिच्छी-कमण्डलु के विना मोक्ष नहीं, तथा रत्नत्रय के विना मात्र पिच्छी-कमण्डलु लेने से भी मोक्ष नहीं होता है।
धर्म
ज्ञानी पन्थ नहीं किन्तु पथ देते हैं, ताकि आप उर्ध्वगति कर सको।
ज्ञान
प्रवचन समय पास करने का नहीं, समयसार बनने का उपक्रम है।
ज्ञान
अपनी आँख करोड़ों में नहीं दोगे फिर गरीब कैसे हो?
संतोष
बैंक-बैलेंस नहीं ब्रेन बैलेंस (मानसिक सन्तुलन) महत्त्वपूर्ण है।
मन
किसी से दृष्टि चिपकनी नहीं चाहिए नजर नीचे रखकर ही बोलना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
भोजन को प्रसाद मानकर ग्रहण करो जो अन्दर बैठे परमात्मा को चढ़ाया जा रहा है, नैवेद्य प्रसन्नता पूर्वक चढ़ाया जाता है।
आहार
इष्ट पदार्थ कभी अलग न हो इस भाव को तृष्णा कहते हैं।
अनासक्ति
नदी का जल, वृक्ष का फल, सूर्य की तपन, दीपक का प्रकाश, सन्त का अनुभव व आशीर्वाद सबको प्राप्त होता है।
दान
संसार में सुखी रहना है तो समन्वय करना सीखो, अन्यथा सब जगह से हटना पड़ेगा, परिस्थिति के अनुसार मनःस्थिति बनाकर समय के साथ चलो।
विवेक
जहाँ खड़े हैं वही से कदम बढ़ाएँ, स्मरण रखें अपनी तुलना दूसरों से कदापि न करें, दूसरों की बराबरी करने की अपेक्षा उससे भी श्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करें।
पुरुषार्थ
जब आप स्वयं पर विश्वास नहीं कर पाते तो दूसरे लोग आप पर किस आधार से विश्वास करेंगे।
मन
सदैव सामने वाले की आखों में झाँककर उसे समझने की कोशिश करें।
संगति
आत्म विश्वास सृजन एवं अन्य लोंगों को अपनी और आकर्षित करने के लिए यह भी आवश्यक है कि आप अपनी औकात के अनुसार समृद्ध दिखने का यत्न करें।
समृद्धि
तनाव से दूर रहिए एवं तनावहीन दिखने का अभ्यास कीजिये।
मन
दूसरे व्यक्तियों को आनन्द प्रदान करने के लिए और उनको अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उनकी बातों को मन्त्रमुग्ध होकर सुनना सर्वोत्तम साधन है, सहमत न होते हुएभी कभी-कभी सहमति दिखाते रहिए।
संगति
व्यापार हो या नौकरी ईमानदारी से करें, विश्वास अर्जन का आधार सत्य वचन है।
सत्य
स्व व्यवसाय को भली-भाँति जानें- अल्पज्ञान भयङ्कर शत्रु है, पूर्ण जानकारी के अभाव में किसी भी कार्य में सफलता की प्राप्ति में प्रायः सन्देह रहता है।
ज्ञान
योग्य प्रशंसा व उत्कृष्ट कार्य करें- जब आपके कार्य व्यवहार सुरुचि पूर्ण परिष्कृत एवं विश्वसनीय होते हैं, तब प्रत्येक व्यक्ति आप से बार-बार मिलकर गौरव की अनुभूति करता है।
चरित्र
आप अपने आदर्शों पर खरे उतरें- आपके लेन-देन साफ सुथरे हों, दूसरों का विश्वास अर्जित करने के लिए लेन-देन में पूरी ईमानदारी रखें।
चरित्र
मनसे भय का भूत निकालें- मात्र भय शब्द ही व्यक्ति के शक्तिशाली मन में अजीव सी हलचल उत्पन्न कर देता है, खोजिये सर्वाधिक सताने वाले भय को, 'कीजिए वही जो सर्वाधिक डराए, जिससे डर मिट जाय'।
मन
सीखिए भूत की भूलों से- अनेक और बड़ी गलतियाँ किये विना कोई भी व्यक्ति महान नहीं बनता है, पिछली गलतियों से सीखकर भविष्य में अपने कार्य में सही सुधार करना ही बुद्धिमान व्यक्ति का विवेक पूर्ण कदम है।
ज्ञान
वादा भूल न जाएँ- सदैव स्मरण रखें कि आप जो भी वादा करें, उसे पूरा करने का हर सम्भव प्रयास करें।
सत्य
परोपकार को मित्र बनायें, बहुत सम्पत्ति होने पर भी नियमों का पालन करें, दरिद्र हो कर भी दान करें।
दान
शक्ति होने पर भी कष्ट व कड़वी बातें सहन करें, युवावस्था में व्रत संयम को निभायें।
संयम
ये चार बातें छोटी होने पर भी बड़ा लाभ प्रदान करती है- न उधार लो, न दो, क्योंकि उधार देने से अक्सर पैसा और मित्र दोनों ही खो जाते हैं।
धन
मूर्ति के समान मनुष्य का जीवन सभी ओर से भव्य और सुन्दर होना चाहिए।
चरित्र
सत्सङ्गति और विवेक ये दोनों निर्मल नेत्र हैं जिसके पास ये नहीं वह अन्धा है व कुमार्ग गामी क्यों नहीं होगा? 'अच्छा काम स्वयं से शुरू करें, बाद में दूसरों से कहें।
विवेक
बैठे रहने से किस्मत भी बैठ जाती है, बीमारियाँ भी आ जाती हैं और जीवन भी बैठ जाता है।
पुरुषार्थ
करणीय कार्य को कल पर मत डालो उसे आज ही करो।
पुरुषार्थ
किरण ढूँढने वालों को उजालों की कमी नहीं रहती है।
पुरुषार्थ
काम सही ढङ्ग से किया जाय तो परिणाम सही निकलता है।
पुरुषार्थ
सुविधा का उपभोग करें पर सुविधा भोगी न बनें।
अनासक्ति
गलती चाहे छोटी भी क्यों न हो, उसे भुलाओ मत।
चरित्र
प्रसिद्ध होने की अपेक्षा ईमानदार होना अधिक अच्छा है।
चरित्र