Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 24

कष्ट सहें और कड़वी बात सुनें

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जो व्यवहार तुम स्वयं नहीं चाहते हो उसे औरों के साथ भी मत करो।
अहिंसा
शान्ति के लिए टाङ्ग खिचाई नहीं मदद करना चाहिए।
संगति
भूल करना दोष है, भूल को दुहराना महादोष है।
चरित्र
सावधानी रखो- एक ही पत्थर से दुबारा टकराना मूर्खता है।
विवेक
बुराई मिटाने के लिए शस्त्र नहीं सङ्कल्प की आवश्यकता है।
संयम
सफलता का श्रेय औरों को दें और गलतियों की जिम्मेदारी स्वयं लें।
विनम्रता
जहाँ पूर्वाग्रह(हठाग्रह) है वहाँ सत्य की खोज के सारे रास्ते बन्द हो जाते हैं।
सत्य
बड़प्पन बड़ा पद प्राप्त करने में नहीं बड़ा कार्य कर दिखाने में है।
चरित्र
सहनशील व्यक्ति प्रतिकूलताओं में घबराता नहीं है।
संयम
मन की अहिंसा जब शब्दोंमेंउतरती है तो वह सत्य कहलाती है, और आचरण में उतरती है तो परोपकार कहलाती है।
अहिंसा
धर्म पुण्य के लिए नहीं आत्म शुद्धि के लिए करना चाहिए पुण्य स्वयं ही मिल जाएगा।
धर्म
जब छोटा सा शस्त्र महान विध्वंस कर सकता है तो फिर छोटा सा नियम निर्वाण क्यों नहीं कर सकता है?
संयम
पद, सत्ता या पुरस्कार की आकाङ्क्षा न कर उसके योग्य बनने का प्रयत्न करें।
विनम्रता
जीवन में सुख के साथ विवेक न हो तो सुख विलासी बनाता है, और यदि दुःख के साथ विवेक न हो तो दुःख कायर बनाता है।
विवेक
आज तक जो नहीं हुआ वह अब हो सकता है, यदि उसके पीछे निष्ठा और तीव्र प्रयत्न हो।
पुरुषार्थ
गलती कर के न झुठलायें और न छुपायें बल्कि स्वीकृति के साथ सुधारने का प्रयत्न करें।
चरित्र
अनास्था और अविश्वास की लगाम हाथ में लेकर कोई भी चले नैतिकता का रथ आगे बढ़ नहीं सकता है।
चरित्र
संसार का सबसे बड़ा दिवालिया वह है जिसने धैर्य, साहस और विश्वास खो दिया है।
मन
मर्यादा मनुष्य को अभाव में धैर्य प्रदान करती है, विपत्ति में कर्तव्य का विवेक जगाती है।
चरित्र
अपनों में सिर्फ अच्छाइयाँ ही न ढूँढे उनकी खामियाँ भी स्वीकार करें, उन्हें सहने और बदलने की प्रेरणा भी दें।
परिवार
सफलता इसमें नहीं कि हमसे भूल कभी न हो, बल्कि इसमें है कि एक भूल हमसे दोबारा न हो।
समृद्धि
एकता वही होती है जहाँ स्वार्थ, प्रलोभन और अहम्भाव नहीं होता है।
संगति
विलम्ब और विखराव सफलता के दो विघ्न हैं।
समृद्धि
आस्था वहाँ होती है जहाँ हम हजार प्रतिकूलताओं के बीच भी डाँवाडोल न हों।
भक्ति
संवर और निर्जरा बन्धन मुक्ति के ये दो साधन हैं।
कर्म
कर्म क्षय के दो उपाय- चिन्तन और भक्ति।
कर्म
जो अधिक सुनता है और कम बोलता है वही व्यक्ति बुद्धिमान है।
वाणी
बुराइयों पर सजग पहरा देना और अच्छाईयों का सम्मान करना न्याय कहलाता है।
चरित्र
इच्छाओं का परिमाण और अनासक्ति यह अपरिग्रह का व्यवहारिक रूप है।
अनासक्ति
प्रामाणिकता और पापभीरुता धार्मिकता की ये दो कसौटी हैं।
धर्म
मन का काँटा शरीर के काँटे से भी ज्यादा चुभता है।
मन
'अनुशासन' कानून और व्यवस्था की सफलता का आधार है।
संयम
धर्म का आधार विरक्ति है और विरक्ति का फल विषय-कषाय का त्याग है।
अनासक्ति
आकिञ्चन्य और तपस्या से साधु में साधुता आती है।
संयम
विवेक और संयम उद्दण्डता पर नियन्त्रण करते हैं।
संयम
भोजन करना पर भजन मत भूलना।
भक्ति
औरों की ऊँचाई देखकर स्वयं को छोटा मत समझो।
मन