Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 77

तन मिला तुम तप करो

107 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

मुनि कष्ट सहने में वीर किसी बात को सुनने में धीर व निर्णय लेने में गम्भीर होते हैं।
चरित्र
मुनि क्रिया करते हैं, प्रतिक्रिया नहीं करते हैं।
चरित्र
मौन रहने से साधु के व्रतों की रक्षा होती है।
वाणी
यदि किसी ने धक्का मार दिया या उपसर्ग कर दिया तो हजारों लोग आ जायेंगे किन्तु परिणाम कलुषित हुए, जो विचारों का उपसर्ग अन्दर चल रहा है उससे सगा भाई भी नहीं बचा सकता है, आपको निज भावों की रक्षा स्वयं करनी है।
मन
रागी मनुष्यों को वन में भी दोष उत्पन्न होते हैं और पंचेन्द्रिय निग्रह वाले को घर ही तपोवन होता है वैरागी के निष्पाप क्रिया करने से घर भी तपोवन जैसा होता है।
अनासक्ति
रिश्ता दिल में हो शब्दों में नहीं, नाराजी शब्दों में हो दिल में नहीं।
वाणी
समाधि के समय सबसे अशुद्ध विकल्प करने वाली आहार संज्ञा है।
आहार
अंतिम समय में काम-भोग नहीं सताते हैं, राग और रसना इन्द्रिय सताती है, अतः यदि समाधि करना है तो किसी से राग न करें और रसना पर नियंत्रण रखना चाहिए।
समाधि
स्व कल्याण की भावना से रिक्त, पर-कल्याण की भावना रखने वाला संत कैसे हो सकता है?
चरित्र
संतों की तपस्या का एकमात्र लक्ष्य कर्मक्षय होता है।
कर्म
अनुकूलता प्रतिकूलता में राजी-नाराज होना साधक के लिए खास बाधक है, राग-द्वेष ही हमारे असली शत्रु हैं, राग ठंडक है, द्वेष गर्मी है, दोनों से ही खेती जल जाती है।
अनासक्ति
अनुकूलता-प्रतिकूलता विचलित करने नहीं अपितु अचल बनाने आती है।
संयम
निर्ग्रन्थ योगी को एकान्त स्थान अच्छा लगता है क्योंकि एकान्त में साधना अच्छी होती है।
संयम
साधु शरीर की साधना को गौण कर भावों की साधना को प्रधान करता है।
ध्यान
साधक को हर समय सावधान रहना चाहिए, सावधान रहने का तात्पर्य किसी से कभी कुछ मत चाहना एवं बुरे कर्मों से बचना है।
संयम
कोई भी चालक गाड़ी को गड्ढे में गिराना नहीं चाहता है, खराब होने पर सुधार कर आगे बढ़ाता है उसी प्रकार साधक व्रत में दोष लगाना नहीं चाहता है लग जाये तो प्रतिक्रमण, प्रायश्चित लेकर मोक्षमार्ग में आगे बढ़ता है।
चरित्र
गृहस्थ के द्वारा मरण पर्यन्त जो पाप संचित किया जाता है उन सब पाप को एक रात्रि का दीक्षित साधु नियम से भस्म कर देता है।
कर्म
साधु चलते फिरते तीर्थ और धरती के मूर्तिधारी देवता होते हैं।
चरित्र
सिंह भले ही भूख से दुर्बल हो, प्यास से पीड़ित हो, शरीर से शिथिल हो, कष्टमय अवस्था में हो, प्राण नष्ट हो रहे हों फिर भी जीर्ण तृण को नहीं खाता है, उसी प्रकार सच्चा साधु कितना ही कष्टमय जीवन व्यतीत करे किन्तु अपने व्रतों में दोष नहीं लगाता है।
चरित्र
जितना परिचय बढ़ेगा उतना विकल्प बढ़ेगा।
संयम
अपने जीवन को अपने में व्यस्त रखना सीख गये तो साधु बन गये।
संयम
साधु जीवन में जितना पुरुषार्थ अपरिचित रहकर साधना में नहीं करना पड़ता, उतना परिचित को छोड़ने में करना पड़ता है।
संयम
श्वासें उन्हीं की लम्बी चलती हैं, जिनके भाव विकृत होते हैं, जिनके भाव शान्त होते हैं उनकी श्वासें स्वयमेव ही शान्त हो जाती हैं और यही ध्यान है।
ध्यान
तन की अशुचिता मुक्ति में बाधक नहीं मन की अशुचिता मोक्ष के लिए बाधक है।
मन
यदि शान्ति चाहते हो तो दूसरों को सुख शान्ति दो, न किसी का दोष देखो और न किसी की निन्दा करो और हरक्षण प्रभु के ध्यान में मग्न रहो।
धर्म
सुविधाओं में हर क्षण सुख मिल सकता पर शान्ति नहीं शान्ति तो धर्म से मिलती है।
धर्म
जो चार ज्ञान से युक्त हैं देवार्चित हैं, निश्चित ही मुक्ति के स्वामी हैं, ऐसे तीर्थंकर भी जब तप करते हैं तब अन्य लोगों को भी तप करना ही चाहिए।
पुरुषार्थ
जिन्होंने काम भोगों से वैराग्य धारण कर तप और चारित्र की सिद्धि के लिए शरीर को कृश किया है उन्होंने इस शरीर को सफल किया है।
पुरुषार्थ
देव-शास्त्र-गुरु के दर्शन से नेत्र सफल होते हैं अन्यत्र देखने से नेत्र पाप देने वाले होते हैं।
भक्ति
शास्त्र रूपी अमृत का पान करने से कान सफल होते हैं कुशास्त्र सुनने से पाप देने वाले होते हैं।
ज्ञान
ज्ञानामृत तथा दश धर्म का उपदेश देने की लालसा रखने वाली जिह्वा सार्थक है।
वाणी
जिनदेव गुरु पूजक हाथ सफल हैं हिंसा में प्रवृत्त हाथ निष्फल हैं।
भक्ति
देव-शास्त्र-गुरु के समक्ष नम्रीभूत मस्तक सफल है अन्यत्र नम्रीभूत मस्तक निष्फल है।
भक्ति
देव-शास्त्र-गुरु तथा यात्रादि महातीर्थ के प्रति गमन करने वाले चरण सफल हैं।
भक्ति
विवेक, श्रुत से सहित हृदय जिन धर्म में तत्पर प्रशंसनीय है अन्य नहीं।
विवेक
मैं उस शरीर को शरीर मानता हूँ जो चारित्र तथा तप करने में समर्थ है परीषह सहन करने वाला है धीर है अन्य शरीर पाप करने वाला है।
चरित्र
हे मित्र! मुक्ति रूपी लक्ष्मी के चित्त को प्रसन्न करने वाली जिनदीक्षा को धारण कर यौवन में समीचीन कठोर तप को करो।
पुरुषार्थ
पूजा-दान, तप, धर्म, ज्ञान, चारित्र आदि का पालन युवावस्था में भलीभाँति हो सकता है वृद्धावस्था में नहीं।
पुरुषार्थ
गृह व्यापार से उत्पन्न हुआ पाप जिनेन्द्र भगवान् के पास छूट जाता है, परन्तु जिनेन्द्र भगवान् के पास किये पाप को मूर्ख प्राणी कहाँ छोड़ेगा।
कर्म
तप धर्म आदिक में सम्यग्ज्ञान के अध्यापन दान-पूजा और सद्गुरुओं की सेवा में कभी संतोष नहीं करना चाहिए।
पुरुषार्थ
शरीर दुर्बल होने पर भी जो बुद्धिमान मनुष्य अपने आत्मबल को प्रकट कर तप करते हैं, वे उत्तम पुरुष प्रशंसनीय हैं।
पुरुषार्थ
जो हिंसादि घर व्यापार को छोड़कर एक भी उपवास करता हैं वह शुद्ध बुद्धि वाला पुरुष चिरकाल के संचित पापों को नष्ट करता है।
पुरुषार्थ
रात्रि के समय पर्व में अथवा अन्य अवधि तक या जीवनपर्यंत के लिए इन्द्रियों को वश में करने के लिए व स्वर्ग-मोक्ष सुख हेतु भोजन विषयक नियम अवश्य करें।
आहार
मुक्ति स्त्री वरने योग्य है क्योंकि वह मरण को प्राप्त नहीं होती है।
समाधि
चारित्र तथा दान करने वाले सम्यग्दृष्टि जीव मुक्ति की इच्छा करते हैं अन्य सुख की नहीं जिस प्रकार गृहस्थ बीज बोता है तो उससे बहुत फल की इच्छा करता है तृणादिक की नहीं। ''इन्द्र, चक्रवर्ती पद विनश्वर है।''
अनासक्ति
अन्तरंग और बहिरंग में अन्तरंग तप ही अधिक बलवान है।
पुरुषार्थ
जब तक फल न मिले, तब तक साधना जारी रखना चाहिए।
पुरुषार्थ