Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 71

सत्संगति से सुगति गमन

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महत्ता सदैव अपने से छोटों के प्रति भी सदय और नम्र व्यवहार ही करती है; परन्तु क्षुद्रता को तो घमण्ड की मूर्ति ही समझो।
विनम्रता
जिस आदमी ने अपने पास ढेर सारी सम्पत्ति जमा कर रखी है, पर उपयोग में नहीं लाता, उसमें और मुर्दे में कोई अंतर नहीं है क्योंकि वह लक्ष्मी से कोई परोपकार नहीं करना।
धन
संयोग में जितना सुख होता है वियोग में उससे सौ गुना ज्यादा दुःख होता है, अतः संयोग को शाश्वत मानकर अति राग मत करो क्योंकि राग ही आग है।
अनासक्ति
एक सम्राट् की संगति से एक संत की संगति अच्छी है पता नहीं सम्राट् कब रुला दे और संत कब हँसना सिखा कर मुक्ति दिला दे।
संगति
झूठे की संगति करोगे तो ठगे जाओगे, मूर्ख हित का इच्छुक होने पर भी अहितकर ही होगा, कृपण अपने स्वार्थ के लिए दूसरे को अवश्य हानि पहुँचाएगा, नीच आपत्ति के समय दूसरे का नाश करेगा अतः कुसंगति छोड़कर सुसंगति करना चाहिए।
संगति
गंगा पाप को, चन्द्रमा संताप को और कल्पवृक्ष दीनता को नष्ट करता है परन्तु साधु समागम पाप, संताप और दीनता तीनों को नष्ट करता है।
संगति
यदि सत्समागम न मिले तब एकान्त में रहना ही श्रेष्ठ है, परन्तु असभ्य पुरुषों का समागम ठीक नहीं है।
संगति
वयोवृद्ध, संयम वृद्ध, ज्ञान वृद्ध का समागम गुण विकास का कारण है।
संगति
रावण राम से उम्र में, बुद्धि में, बल में, कुटुम्ब में, राज्य में, सेना में, बड़ा था फिर भी हार गया क्योंकि राम का भाई राम के साथ था और रावण का भाई रावण के खिलाफ था।
संगति
पहले रसदार चीजें खायें, बीच में गरिष्ठ चीजें और अन्त में तरल पदार्थ ग्रहण करें, इससे बल और आरोग्य लाभ होता है।
आहार
क्यों इतना वक्त गुजारते हो देखते हुए खुद को 'आइने' में कुछ वक्त बैठो प्रभु के सामने खूबसूरत हो जाओगे सही 'माइने' में।
भक्ति
दीन, हीन, दुर्बल, अंधे, बहरे, पंगु, विकलांग और वृद्धों का उपहास नहीं करना चाहिए।
अहिंसा
जितने अपरिचित रहोगे, उतने सुखी रहोगे। जब शादी नहीं हुई थी, तब मात्र आपको अपने घर का कष्ट समझ में आता था, शादी के बाद अब दस जगह के दुःखों में सम्मिलित होना पड़ता है। विषयों की मिठास में जिनमुद्रा धारण नहीं कर पाये, एक क्षण के सुख के पीछे भव-भव की शान्ति चली गयी।
अनासक्ति
समय, सत्ता, सम्पत्ति और शरीर सदा साथ नहीं देते, परन्तु स्वभाव, समझदारी, सत्संग और सच्चे सम्बन्ध सदा साथ देते हैं।
संगति
भोजन पुत्रों के साथ, बैठक मित्रों के साथ, आत्मा शास्त्रों के साथ और घर बन्धुजनों के साथ हो तो उत्तम है।
परिवार
ध्यान एक से ही होता है, अध्ययन दो से होता है, गायन तीन से होता है, यात्रा चार से होती है, खेती पाँच से होती है और युद्ध बहुत से लोगों में होता है।
विविध
चार जगह अवश्य जायें–धर्मसभा, राजसभा, स्वजनों के बीच और तत्त्वचर्चा में।
संगति
चार चीजें मनुष्य को बड़े भाग्य से मिलती हैं–प्रभु नाम की लगन, संतों की संगति, चरित्र की निर्मलता और उदारता।
संगति
सत्य, संतोष, सौजन्य, समता, साधु संगति सद्गति कराते हैं।
संगति
काँच भी कंचन का संग पा जाने से मरकत मणि की शोभा प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार सज्जनों का साथ करने से मूर्ख भी विद्वान् बन जाता है।
संगति
वार्तालाप से, शरीर के स्पर्श से, संसर्ग से, साथ भोजन करने से, आसन से, शयन से और यान से मनुष्यों के पाप संक्रमित होते हैं अतः कुसंगति से बचें।
संगति
जब मैं अल्पज्ञ था तो हाथी के समान मदांध था। तब मेरा मन अपने को सर्वज्ञ समझकर दंभ से भर गया, लेकिन जब मुझे पंडितों के संपर्क से कुछ ज्ञान हुआ तो पता चला कि मैं मूर्ख हूँ और मेरा दंभ, ज्वर की तरह उतर गया।
संगति
सज्जनों के सम्पर्क से आधी अविद्या नष्ट हो जाती है, उस का चतुर्थांश शास्त्र के विचार से नष्ट हो जाता है और शेष चतुर्थांश अपने यत्न से नष्ट होता है।
संगति
गंगा के जल का प्रवाह भी समुद्र को प्राप्त कर खारा हो जाता है, इसलिए विद्वान् को अशुभ मन वाले व्यक्तियों का साथ नहीं करना चाहिए।
संगति
दुष्ट की संगति कीर्ति नष्ट कर देती है, क्लेश उत्पन्न करती है, अशुभ गति प्रदान करती है, मनुष्यों में उद्वेग और खिन्नता उत्पन्न करती है, उपहास का पात्र बनाती है, बुद्धि को भ्रम में डाल देती है, प्रतिष्ठा का नाश कर देती है, प्राण शक्ति क्षीण कर देती है, इस प्रकार कुसंगति सकल मंगलों को नष्ट कर देती है।
संगति
अगर तुम जानना चाहते हो कि नरक क्या है तो जान लो कि अज्ञानी की संगति ही नरक है।
संगति
जो व्यक्ति उच्च विचारों की सुखद संगति में रहते हैं, वे कभी भी एकाकी नहीं हो सकते हैं।
संगति
स्वाध्याय से बढ़कर सज्जनों के लिए कोई अच्छी आदत नहीं हो सकती है।
ज्ञान
मन की पवित्रता और कर्मों की पवित्रता, आदमी की संगति की पवित्रता पर निर्भर है।
संगति
पवित्र हृदय वालों की संगति उत्तम होगी और जिनकी संगति अच्छी है, वे हर प्रकार से फलते फूलते हैं।
संगति
संसार में चन्दन शीतल होता है, चन्दन से ज्यादा शीतल चन्द्रमा है, चन्दन और चन्द्रमा से शीतल साधु-सज्जनों की संगति है, चन्दन व चन्द्रमा तो बाहरी त्वचा को शीतल कर सकते हैं परन्तु सन्तों की संगति मन और आत्मा को शान्ति प्रदान करती है।
संगति
एक प्रभु हैं, जो बेहिसाब देते हैं, एक हम हैं, जो नाम भी गिन-गिन कर लेते हैं।
भक्ति
आलसी के साथ रहने वाला मानव भी बर्बाद हो जाता है।
संगति
जेल होने के तीन कारण–भूख, मजबूरी व संगति।
संगति
परम्पराओं की अदृश्य जंजीरें व्यक्ति को ही नहीं, उसकी चेतना को भी मिटाती हैं।
विविध
जैसे ही लगे कि आप जहाँ हैं वहाँ का वातावरण उत्तेजित या दूषित हो रहा है आप वहाँ से हट जाइये।
संगति
सत्संग करने से भीतर का शैतान भाग जाता है।
संगति
सत्संग आत्म जागरण के लिए है, साम्प्रदायिक संगठन और प्रदर्शन के लिए नहीं।
संगति
सत्संग का फल उसे ही मिलता है, जो व्यसनों और कुव्यक्तियों का त्याग करता है।
संगति
सत्संग के लिए शास्त्र को छोड़ना पड़े तो कोई बात नहीं क्योंकि सत्संग से अज्ञान पलभर में समाप्त हो जाता है।
संगति
खराब संगति में रहने से तो अच्छा है कि आप अकेले ही रहें।
संगति
दुर्जन के संग से बढ़कर और कोई दुःख नहीं है।
संगति
मुझे बताइये आपके संगी-साथी कौन हैं? मैं बता दूँगा, आप कौन हैं?
संगति
जो व्यक्ति उच्च विचारों की सुखद संगति में रहते हैं, वे कभी अकेले नहीं रहते हैं।
संगति
कोई कितना ही बड़ा क्यों न हो अन्धों की तरह उसके पीछे मत चलो।
विवेक
बच्चा जितना सिखाने से नहीं सीख पाता उतना आस-पास के परिवेश से स्वयं सीख लेता है, अतः परिवेश अच्छा होना चाहिए।
संगति
सन्त का क्रोध भी कल्याणकारी होता है, जबकि दुष्ट का प्यार भी दुःख देने वाला होता है, सन्त अगर गुस्सा करके डाँट भी दें तो समझ लेना चाहिए कि इसमें भी भला है, दुष्ट आदमी प्यार की बात भी करे तो उसके प्यार में कुछ न कुछ मुसीबत छुपी होगी।
संगति
जिस प्रकार स्वभाव से शीतल जल अग्नि की संगति से उष्ण हो जाता है उसी प्रकार कायर पुरुष भी वीर पुरुष के आश्रय (संगति) से वीर हो जाता है और वीर पुरुष भी कायर की संगति (आश्रय) से कायर हो जाता है।
संगति
बगैर सत्संग के आत्मा में बसा अमृत सूख जाता है।
संगति
दुर्जन की संगति करने से सज्जन का भी महत्त्व गिर जाता है, जैसे कि मूल्यवान माला मुर्दे पर डाल देने से निकम्मी हो जाती है।
संगति
जो नीच पुरुषों के संग रहते हैं ज्ञानी जनों का सत्संग नहीं करते, वे कृष्णपक्ष के चंद्रमा के समान निरंतर हीन होते जाते हैं।
संगति
सत्संग में बिना कुछ किए उन्नति होती है और कुसंग में बिना कुछ किए पतन होता है। भगवान् में प्रेम होना भी सत्संग है और नाशवान का प्रेम (मोह) छूटना भी सत्संग है। हर हाल में खुश रहने की विद्या सत्संग से ही मिलती है।
संगति
सच्ची बात को मान लेना, यह सत्संग है।
संगति
जैसे भीतर अग्नि कमजोर हो तो भोजन पचता नहीं, ऐसे ही भीतर लगन न हो तो सत्संग की बातें पचती नहीं।
संगति
व्यापार में तो लाभ और नुकसान दोनों होते हैं, पर सत्संग में लाभ-ही-लाभ होता है, नुकसान होता ही नहीं।
संगति
अज्ञानी से दूर व ज्ञानी के निकट रहने से मंगल होता है।
संगति
सत्पुरुषों के दर्शन व समागम का लाभ लेना ही ज्ञानी पुरुष का लक्षण है।
संगति
जिन्दगी अपने दम पर ही जी जाती है औरों के कंधों पे जनाजे ही निकाले जाते हैं।
पुरुषार्थ
सफल लोगों की संगति आपकी सफलता का अहम् हिस्सा है।
संगति
जिन पुरुषों के यश और मान का लोभ अधिक हो, उनके साथ मुमुक्षु पुरुष को कभी नहीं रहना चाहिए क्योंकि उसके साथ में या तो उल्लू बनकर रहना होगा या अपमान सहना होगा और उसे भी यश का पिशाच लग जावेगा तथा प्रशंसा का आसक्त निर्दय चित्त होता है।
संगति