Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 71

सत्संगति से सुगति गमन

100 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

अनेक त्यागियों और धर्मात्माओं के बीच रहकर अपने को अकेला देखता हुआ प्रसन्न रह करके जीवन बिता, आज के युग में बाह्य में अकेला मत रह अन्तरङ्ग में अकेला रह, बहुत पुरुषों के समागम में कषाय वृद्धि और समाधिहीनता का भय है तो समागम छूटने में संयम हीनता का भय है, इस काल में समागम बहुत सहायक है।
संगति
मुमुक्षु पुरुष जब-जब अपने से विशेष पुरुष से मिले, उसके समागम और आज्ञा में रहे।
संगति
स्वाध्याय, ध्यान, भक्ति, पठन-पाठन आदि कार्यों में समय बिताते ही रहो, बेकार बैठे रहने में दुष्कल्पना का उद्भव होने लगता है।
पुरुषार्थ
दुर्जन की संगति से सज्जन को भी दोष लगता है और आपत्ति भोगनी पड़ती है।
संगति
बलवान मनुष्य को अनुकूल बनाये रखना चाहिए क्योंकि बड़े पुरुषों के विषय में बेंत के समान नम्र वृत्ति ही दुःख दूर करने वाली होती है।
विनम्रता
हम सत्संग ढूँढते हैं क्योंकि आत्मा की वही खुराक है।
संगति
संयम के साथ एक क्षण जीना श्रेष्ठ है, अमृत तुल्य है, परन्तु असंयम के साथ कोटि वर्ष भी जीना अच्छा नहीं है। संयमी निजभावों की प्रतिक्षण तौल करें।
संयम
सम्बन्ध स्वभाव के लिए घातक हैं, एक भक्त बढ़ जाये तो भी विकल्प बढ़ जाता है।
अनासक्ति
शरीर के विनाश होते ही सब सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं, फिर क्यों पर सम्बन्ध के पीछे आत्म शान्ति को खो रहे हो?
अनासक्ति
सम्बन्धों से साधना का ह्रास होता है।
अनासक्ति
संसार से पीछा छुड़ाना है तो पीछी पकड़ो या पीछी वालों को पकड़ो इससे ही आप पतित से पावन बन सकते हो।
संगति
धन घर तक साथ चलेगा, परिवार श्मशान तक साथ चलेगा पर धर्म और सेवाभाव तो दूसरे जन्म तक भी आपके साथ चलेगा।
धर्म
धर्म के द्वार क्षमा, नम्रता, सरलता, संतोष।
धर्म
दया, दान, इन्द्रिय-दमन, देवदर्शन, पूजन और गुरु की दासता जिसके पास है वह दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है।
धर्म
सुखमय जीवन जीने के १७ सूत्र–१. आनंद के लिए संगीत, २. खाने के लिए गम, ३. पीने के लिए क्रोध, ४. निगलने के लिए अपमान, ५. व्यवहार के लिए नीति, ६. लेने के लिए ज्ञान, ७. देने के लिए दान, ८. दूसरों को जीतने के लिए प्रेम हो, ९. धारण करने के लिए धैर्य, १०. तृप्ति के लिए संतोष, ११. त्याग के लिए लोभ, १२. करने के लिए सेवा, १३. फैलाने के लिए स्व-पर का यश, १४. फेंकने के लिए ईर्ष्या, १५. छोड़ने के लिए मोह, १६. रखने के लिए इज्जत, १७. बोलने के लिए सत्य।
विविध
कल्पवृक्ष संकल्पित वस्तु को देता है, प्रसिद्ध कामधेनु इच्छित वस्तु को ही पूर्ण करती है और चिन्तामणि चिन्तित वस्तु को ही देता है परन्तु सत्संगति समस्त वस्तुओं को देती है। ऐसी संगति करना जिससे वैभव बढ़े या ना बढ़े पर भव अवश्य घटे और वीतराग शासन पर श्रद्धा बढ़े।
संगति
संत समागम पाने वाला भले ही सन्त बने या न बने पर संतोषी अवश्य बनता है।
संगति
गुणीजनों के संसर्ग से सद्गुणों में वृद्धि होती है शील संयम का पालन होता है, मन की चंचल वृत्ति का निरोध होता है, कुभाषण, कुकर्म, कुचिन्तन नहीं होता है।
संगति
सम्यग्दर्शन से रहित, मार्ग से च्युत, व्यसनी एवं दुष्टजनों का संग छोड़ देना चाहिए, दुर्जनों, मूर्खों की संगति पद-पद पर दुःखदायी होती है।
संगति
जिस प्रकार कामवासना व्यक्ति की बुद्धि का नाश कर देती है, उसी प्रकार कुसंगति व्यक्ति का जीवन नष्ट कर देती है।
संगति
दुर्जनों की संगति की अपेक्षा अकेले जीवन व्यतीत करना अच्छा है।
संगति
अच्छी संगति अच्छा सोचने की पक्की गारंटी है।
संगति
जो तप करें या न करें किन्तु वृद्धजनों की उपासना करते हैं वे मनुष्य संकटरूपी जंगल को पार कर पवित्र गति को प्राप्त होते हैं।
संगति
शील की रक्षा के लिए वृद्धजनों (गुणी जनों) की संगति करना चाहिए, वृद्ध सेवा पाप नष्ट करती है, हृदय को पवित्र करती है, क्रोध का नाश करती है, विनय को बढ़ाती है, सभी इष्ट की सिद्धि कराती है।
संगति
आपका सलाहकार कौन है ये बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि दुर्योधन शकुनि से सलाह लेता था और अर्जुन श्रीकृष्ण से।
संगति
परिचितों के साथ रहने से राग बढ़ता है और अपरिचित रहने से विशुद्धि बढ़ती है, इसलिए मुनि लोग परिचय नहीं बढ़ाते, वे अपरिचित रहते हैं।
संगति
साधु संसर्ग दोष से विकार को प्राप्त नहीं होते हैं जैसे चंदन सर्पों द्वारा वेष्टित होने पर भी विष रूप नहीं होता है।
संगति
साधु का दर्शन पुण्य के लिए होता है क्योंकि साधु तीर्थरूप होता है, तीर्थ तो समय पाकर फल देता है परन्तु साधु समागम शीघ्र ही फल देता है।
संगति
पानी अपने में रहता है तो स्वच्छ और शीतल होता है किन्तु पर के संपर्क से स्वच्छता शीतलता दोनों नष्ट होती हैं।
संगति
अग्नि और दर्पणवत् दूरी बनाकर गुरु का लाभ लो।
संगति
साधु की सेवा संसार से पार लगाती है।
संगति
जैसे सीप में प्रवेश करने वाली पानी की बूँद मोती बनकर चमकती है, वैसे गुरु आज्ञानुवर्ती शिष्य सौभाग्य से समाहित होकर संसार में शोभित होता है।
संगति
गुरु का शिष्य बन जाना कठिन नहीं, अपितु गुरु के हृदय में स्थान प्राप्त करना कठिन है, जो मात्र गुरु भक्ति एवं समर्पण से ही संभव है।
संगति
भिन्न-भिन्न देश में जाति, कुल में उत्पन्न जो मनुष्य जिनशासन के भक्त हैं वे विद्वानों के द्वारा परस्पर भाई माने गये हैं।
संगति
कुछ व्यक्तियों से भेंट अच्छी होती है किन्तु सहवास अच्छा नहीं होता, कुछ का सहवास अच्छा रहता है, भेंट नहीं, कुछ से भेंट भी अच्छी होती है और सहवास भी, कुछ का न सहवास अच्छा होता और न ही भेंट अच्छी होती है।
संगति
अज्ञानी व्यक्ति की संगति नरक के समान है।
संगति
धनिकों के लिए दूसरी निधियाँ हैं परन्तु सज्जनों के लिए गुणी मनुष्यों की समीपता ही श्रेष्ठ निधि है। श्रेष्ठ की संगति किसका बल नहीं बढ़ाती है?
संगति
सत्संग से उत्पन्न मरण भी मनुष्यों का उद्धार कर देता है।
संगति
महान् पुरुषों की संगति निश्चय ही महान् फल देती है।
संगति
सत्संगति बुद्धि की जड़ता को हटाती है, वाणी में सत्य का संचार करती है, सम्मान की वृद्धि करती है, पापों को दूर करती है, चित्त को प्रसन्न करती है और दसों दिशाओं में कीर्ति फैलाती है, बताओ सत्संगति मनुष्य के लिए क्या नहीं करती है? सज्जनों का संग स्वर्ग में वास के समान है।
संगति