Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 40

निंदा जिन्दा की होती है, मृतक की प्रशंसा करते हैं

82 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

दुर्बलों को सदा संकट की स्थिति में नहीं रहना चाहिए, बल्कि जब अवसर मिले, तब उन्हें बलवान् के साथ संधि कर लेना चाहिए।
विवेक
जो व्यक्ति ज्ञानी मनुष्यों के समुदाय में अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ रह सकता है, वही विद्वानों में विद्वान् माना जाता है।
ज्ञान
जो व्यक्ति मानव समुदाय के सामने आने में डरते हैं और अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने में असमर्थ हैं, वे जीवित होकर भी मृतकों से भी गये बीते हैं।
चरित्र
तुम उन लोगों को भले ही शत्रु बनाओ, जिनका हथियार धनुष बाण है परन्तु उन लोगों को कभी मत छेड़ो जिनका हथियार जिह्वा है।
वाणी
यदि तुमको बिना किसी सहायक के अकेले दो शत्रुओं से लड़ने का अवसर आए तो उनमें से किसी एक को अपनी ओर मिला लेने की चेष्टा करो।
विवेक
अपनी कठिनाइयों का हाल उन लोगों में प्रकट न करो, जो अभी तक उनसे अनजान हैं और अपनी दुर्बलताएँ बैरियों को ज्ञात न होने दो।
विवेक
जो लोग अपना अपमान करने वालों का गर्व चूर्ण नहीं करते, वे वास्तव में बहुत समय तक नहीं टिकेंगे।
चरित्र
यदि कोई मनुष्य महात्माओं का अनादर करेगा तो उनकी शक्ति से उसके सिर पर अनन्त आपत्तियाँ आ टूटेंगी।
विनम्रता
उच्च कुल में उत्पन्न होने पर भी यदि कोई सच्चरित्र नहीं है तो वह उच्च नहीं हो सकता और हीनवंश में जन्म लेने मात्र से ही कोई पवित्र आचार वाला नीच नहीं हो सकता है।
चरित्र
बड़प्पन सदैव ही दूसरों के दोषों को ढँकने के यत्न में रहता है, पर ओछापन दूसरों के दोषों को खोजने के सिवाय और कुछ करना ही नहीं जानता है।
चरित्र
संसार, शरीर, भोगों से उदासीनता ही संन्यास कहलाता है।
अनासक्ति
बुद्धिमान का यह कर्त्तव्य है कि अपने से बड़ी बुद्धि वाले को प्रणाम करें।
विनम्रता
जहाँ गुरु निन्दा चल रही हो वहाँ कान ढक लेना चाहिए या अन्यत्र चले जाना चाहिए क्योंकि जो दूसरों के द्वारा की गई गुरु अथवा स्वामी की निन्दा को सुनता है तथा सुनकर कुपित नहीं होता वह पुरुष कृतघ्न कहलाता है।
भक्ति
यहाँ पर प्रायः नीच कुल में उत्पन्न हुए लोग कुलीन की, सौभाग्य हीन स्त्री पति की, कंजूस दानी की, अपवित्र पवित्रों की, निर्धन धनवानों की, कुरूप सुन्दर शरीर वालों की, पापी धर्मात्मा की, मूर्ख शास्त्रों के ज्ञाता-विद्वानों की और मिथ्यादृष्टि संतों की निन्दा करते हैं। गुरु का उपहास करने से व्यक्ति मरने पर गधा, निन्दा करने से कुत्ता उनकी सम्पत्ति का भोग करने से कृमि और ईर्ष्या करने से कीड़ा होता है।
वाणी
किसी मनुष्य की बुराई पर विश्वास मत करो, जब तक आप स्वयं उसे देख न लो और बुराई सचमुच देखने में आए भी तो उसे भूल जाओ, किसी पर प्रकट न करने लगो।
वाणी
वीरता भलाई करने में नहीं है, प्रत्युत किसी की भी बुराई न करने में है।
चरित्र
अपने से अधिक शक्तिशाली के साथ वैर करना परिणाम में दुःखद होता है।
क्षमा
सज्जन पुरुष दूसरे के दोष सुनने के समय बहरे बन जाते हैं।
वाणी
शीलवान, चरित्रवान सन्तों का उपहास उड़ाने से चरित्र हीन सन्तान उत्पन्न होती है।
चरित्र
माँ को सबसे ज्यादा दुःख तब होता है जब बेटा पत्नि के सामने माँ को डाँटता है।
परिवार
जुआ के साथ विषाद (खेद), कलह, झगड़ा (बंधन), क्रोध, मान, मायाचारी (बुद्धिभ्रम), चुगली, मत्सर और शोक ये नौ अवगुण रहते हैं।
चरित्र
जुआ से धर्म, लक्ष्मी, सुबुद्धि, सुख, सत्य, प्रतिष्ठा, शौच, श्रद्धा, विश्वास और सद्गति ये दसों नष्ट हो जाते हैं। जुआ अनेक अनर्थों को करने वाला है।
चरित्र
लोगों की विचित्रता देखो–परमात्मा की पूजा के लिए बहाने बनाते हैं कि समय नहीं है और कुर्सी के राग में कम्बल पैसों को बाँटने घर-घर घूमते हैं, लौकिक पद की लोलुपता में पैसा बाँट कर समय बर्बाद कर रहे हैं और परम पद के लिए समय नहीं है।
भक्ति
गुरु के सामने झूठ बोलने से आत्मा का पतन होता है और डॉक्टर के सामने झूठ बोलने से शरीर का पतन होता है।
सत्य
छह तीखी तलवारें–अत्यधिक अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालने की चिन्ता और मित्र द्रोह ये मनुष्य की आयु को घटाती हैं।
चरित्र
माता-पिता हाथ से मल-मूत्र धोते हैं, निंदक जीभ से, अतः माता-पिता से निंदक श्रेष्ठ हैं।
वाणी
आत्मप्रशंसा और परनिन्दा करने वाला नीचगति में जन्म लेता है।
वाणी
जो दूसरों के अवगुणों की चर्चा करता है, वह अपने अवगुण प्रकट करता है।
वाणी
झूठ हमेशा सुख देने का ही आश्वासन देता है पर देता कभी नहीं है।
सत्य
झूठ बोलना कायरता की निशानी है।
सत्य
सन्तों का धर्म है अहिंसा और योग्य पुरुषों का धर्म है पर निंदा से परहेज करना।
वाणी
निंदा एक ऐसा अवगुण है जो दुहरी मार मारता है यह निंदक तथा निंदित दोनों को घायल करता है।
वाणी
निन्दा अनेक पापों की जननी है।
वाणी
स्वयं की निन्दा करना व सुनना श्रेष्ठता के लक्षण हैं।
विनम्रता
कामुक, चुगलखोर तथा दूसरों की बातों को छुपकर सुनने वाला व्यक्ति अपनी पोल अपने आप खोल देता है।
चरित्र
अपने को श्रेष्ठ दूसरों को अश्रेष्ठ समझने वालों के लिए निन्दा का रस सब रसों में उत्तम होता है।
वाणी
दूसरों पर कीचड़ न फेंको, हो सकता है कि आप निशाना चूक जाओ, फिर उसका बुरा हो या न हो किन्तु आपके हाथ तो खराब हो ही जाएँगे।
वाणी
निंदक आलोचक से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि हर नायक की पहचान खलनायक से ही होती है।
चरित्र
दूसरों की निन्दा करके हम अपने बुरे होने का प्रमाण देते हैं।
वाणी
किसी के मुख से कोई बात अपने विरुद्ध सुनकर उसे अपना विरोधी मत मानों बल्कि विरोध का कारण ढूँढ़ों और उसे मिटाने की सच्चे हृदय से चेष्टा करो।
क्षमा
कभी-कभी मौन रह जाना सबसे तीखी आलोचना होती है।
वाणी
जिसके पीछे खलनायक लग जाता है उस नायक का नाम अपने आप ऊँचा हो जाता है।
चरित्र
विरोध प्रचार की कुँजी है, इसलिए विरोधी प्रचारक सिद्ध होते हैं।
विविध
हाथी को देखकर कुत्ते भौंकते हैं, पर कुत्ते को देखकर हाथी कभी नहीं भौंकता है।
चरित्र
निन्दा से निष्प्रभावी रहने के लिए प्रशंसा से अप्रभावित रहिए।
विनम्रता
दूसरों की निन्दा करके अपने उभय लोक के दुश्मन मत बढ़ाइये।
वाणी
किसी पर कीचड़ उछालने से पहले इतना अवश्य सोच लें कि हम भी दूध के धुले नहीं हैं।
विनम्रता
सिंह के साथ वन में रहना, हाथ में बिच्छू को लेना, कान में कनखजूरे को डालना, साँप के मुख में अँगुली डालना, विष पीना अच्छा है किन्तु धर्म व धर्मात्मा की निन्दा करना व दुष्ट के संग रहना अच्छा नहीं है, कारण कि इनकी संगति से एक ही भव बिगड़ता है किन्तु सन्त निन्दा से तो अनन्तों जन्म बिगड़ जाते हैं।
वाणी
किसी की निंदा मत करो क्योंकि जिसे आपने मार्ग का पत्थर समझा है वह पत्थर प्रतिमा भी बन सकता है, आपने जिस मार्ग के पत्थर को बेकार समझा है वही मंजिल की सीढ़ी बन सकता है।
वाणी
मुनियों के दोषों का चिन्तन करने वाला मनुष्य भाग्यहीन, विकलांग, मूर्ख, विवेक रहित, नपुंसक और नीच कार्य करने वाला नीच होता है।
वाणी
उन्हें स्वामिभक्त न समझें, जो आपकी हर कथनी व करनी की प्रशंसा करते हैं अपितु उन्हें स्वामिभक्त समझें जो आपके दोषों की मृदुल आलोचना करते हैं।
संगति
ना समझ लोगों द्वारा की गयी तारीफ की अपेक्षा समझदार की आलोचना अच्छी होती है।
संगति
जो मनुष्य अधिकारी व्यक्ति के सामने स्वेच्छापूर्वक अपने दोष शुद्ध हृदय से कह देता है और फिर कभी न करने की प्रतिज्ञा लेता है, उसी का प्रायश्चित्त शुद्धतम है।
धर्म
अपने दोषों को स्वीकार करना एक उत्कृष्ट साहस है।
विनम्रता
सुनने वाले लाखों है, सुनाने वाले हजारों हैं, समझने वाले सैकड़ों हैं परन्तु सत्कार्य करने वाले कोई विरले ही हैं, सच्चे पुरुष वे ही हैं और सच्चा लाभ भी उन्हीं को प्राप्त होता है जो सत्कर्म करते हैं।
पुरुषार्थ
मनुष्य की अच्छी बात तो दब जाती है और बुराई तथा बदनामी की बात लू की तरह (भाँति) शीघ्र चारों ओर फैल जाती है।
वाणी
अपने कर्तव्य में प्रयत्नशील रहना और चुप रहना बदनामी का सबसे अच्छा उत्तर है।
चरित्र
यदि आपकी बुराई की जाये और वह सच हो तो स्वयं को सुधार लो और यदि वह असत्य हो, तो उस पर मुस्करा दो।
क्षमा
जो अपना कल्याण चाहता है, उसे किसी के भी प्रति बुरी भावना नहीं करनी चाहिए।
अहिंसा
दूसरों के प्रति हमारी बुरी भावना होने से उनका बुरा होगा या नहीं होगा यह तो निश्चित नहीं है, पर हमारा अन्तःकरण तो मैला हो ही जायेगा।
मन