Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 39

नीति वाक्यामृत

287 सूत्र · पृष्ठ 4 / 5

विद्वान् लोग भी आवेग से अन्धे होने पर कुपथ में पैर धर ही देते हैं।
क्षमा
किसी बात से रोकने पर मनुष्य की आकांक्षा उसके लिए और भी अधिक बढ़ती है क्योंकि निषेध में आकर्षण होता है।
मन
जिसका स्थान लिया जाता है उसका उत्तरदायित्व भी लिया जाता है।
Misc.
द्वेष से किसमें दोष नहीं आ जाता? प्रेम से किसकी उन्नति नहीं होती?
क्षमा
सर्वत्र उदारता से काम नहीं करना चाहिए।
विवेक
मानव का विद्यालय 'उदाहरण' है और वे अन्यत्र कुछ नहीं सीखते हैं।
ज्ञान
किसी लेखक का उच्चतम सम्मान उसे उद्धृत करना है।
ज्ञान
उद्धरणों के द्वारा बुद्धिमानों की बुद्धिमत्ता तथा युग-युग के अनुभवों को संजोया जा सकता है।
ज्ञान
बहुत लोगों की अपेक्षा थोड़े से ईमानदार लोग अधिक अच्छे हैं।
चरित्र
उपहार का मूल्य नहीं, उसके पीछे की दृष्टि ही तौली जाती है।
दान
तुम किसी से उपहार मत लो क्योंकि उपहार विद्वान् को अंधा कर देता है और सदाचारी के शब्दों को भी दूषित कर देता है।
चरित्र
जो काम उपाय से हो सकता है, वह पराक्रम से नहीं हो पाता है।
विवेक
अत्यधिक परिचय से अवज्ञा उत्पन्न होती है और किसी के पास लगातार जाने से निरादर होता है।
संगति
ऐश्वर्य मूर्खों को नष्ट कर देता है और बुद्धिमानों को संकटग्रस्त कर देता है।
धन
एक मात्र अमोघ नियम–जो मनुष्य सदैव सज्जन होने की बात करता रहता है, वह कभी भी सज्जन नहीं होता है।
चरित्र
जो छल से धन प्राप्त करता है, वह धर्म से भ्रष्ट हो जाता है।
सत्य
लेने-देने और करने योग्य कार्य यदि तुरन्त नहीं कर लिए जाते तो समय उसका रस पी जाता है।
समय
लज्जाशील पुरुष को कलंक लगने पर उसके गुण भी सुख नहीं दे पाते हैं।
चरित्र
जैसे छोटा अंकुश भी हाथियों पर गिरकर उन्हें कष्ट देता है, वैसे ही बड़ों के ऊपर थोड़ा क्लेश पड़ना भी बहुत कष्टकर होता है।
Misc.
संसार में रम्यता तो सुलभ है किन्तु गुणों की प्राप्ति दुर्लभ है।
चरित्र
गुणियों के गुण ही पूजा के स्थान होते हैं, लिंग अथवा उम्र नहीं।
चरित्र
जिस गुण से मनुष्य की जीविका चलती हो और प्रशंसा होती हो, गुणी को चाहिए कि उस गुण की रक्षा करे और उसे बढ़ाये।
चरित्र
जो शत्रुओं को भी प्रसन्न कर दें, वही गुणों की असाधारणता होती है।
चरित्र
सद्गुण रूप अमृत का आस्वाद लेने में प्रायः सत्पुरुष ही कुशल होते हैं, गुणों से सम्पन्न पुरुष में थोड़े भी गुण अधिक हो जाते हैं।
चरित्र
स्त्रियों के अंगों के समान जब अपने गुण छिपाये जाते हैं, तो वे स्पृहणीय तथा दुर्लभ हो जाते हैं। बड़े गुणों और सत्कर्मों के करने वाले लोग संसार में सर्वदा सुलभ हुआ करते हैं किन्तु उनके ज्ञाता दुर्लभ हैं।
विनम्रता
किसी गुणवान मनुष्य में कोई दोष भी देखकर गुणानुरागी व्यक्ति खिन्न नहीं होते क्योंकि चन्द्रमा में पड़े कलंक को भी लोग प्रेम से ही देखते हैं।
चरित्र
कोई भी वस्तु ऐसी नहीं जिसमें दोष ही दोष या गुण ही गुण होते हों।
विवेक
बन्धुओं के गुण और दोष में गुणों पर दृष्टि डालनी चाहिए, दोषों पर नहीं।
परिवार
गुणहीन धनिकों से गुणी दरिद्र श्रेष्ठ होता है।
चरित्र
मनुष्यों को गुणों की प्राप्ति में प्रयत्नशील होना चाहिए क्योंकि गुणी व्यक्तियों के लिए कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है, गुणों की अधिकता से ही चन्द्रमा शिव जी के मस्तक पर विराजमान है, जहाँ दूसरे लोग पहुँच भी नहीं सकते हैं।
चरित्र
धर्म, अर्थ, काम सम्बन्धी कार्यों को करने से पहले न बतायें, करके ही दिखायें, ऐसा करने से अपनी मंत्रणा दूसरों पर प्रकट नहीं होती।
विवेक
यदि गुरु अयोग्य शिष्य चुनें तो उसकी बुद्धि हीनता ही प्रकट होती है।
ज्ञान
प्रत्यक्ष घटना विचार से कई अधिक प्रभावशालिनी होती है।
ज्ञान
जो कुछ आँखों से नहीं दिखता उसे चरित्र द्वारा देखना पड़ता है।
चरित्र
मनुष्य के बाहर का रूप देखकर उसके चरित्र के बारे में निर्णय कर लेना अनुचित है।
चरित्र
जिन्हें खुशामद प्रिय होती है, उन्हें सच्ची बात मीठी भाषा में कही जाये तो भी कड़वी लगती है।
वाणी
निर्धनों को धन न दिए जाने से दरिद्रता बहुत बढ़ गई है और दरिद्रता के बहुत बढ़ जाने से चोरी बहुत बढ़ गई है।
दान
चित्र मूक कविता है और कविता मुखर चित्र है।
विविध
मृदु कामों से भी स्वार्थ सिद्धियाँ की जा सकती हैं।
समृद्धि
अपमान से उत्पन्न लड़ाई को मान से शांत कर दें, अपमान से उद्भूत युद्ध के लिए सामनीति अथवा प्रणाम उपाय है।
क्षमा
जीवन सदैव समझौते के लिए विवश करता है।
विविध
जो जीवन लक्ष्य हीन होता है, वह साथ ही सुख हीन भी होता है।
समृद्धि
लक्ष्य भ्रष्ट जीवन केवल दयनीय ही नहीं होता, वह समाज के लिए हानिकारक भी होता है। जो मन को नहीं मार सकता है, जिसे झुकना और छोटा बनना नहीं आता है, जिसे दूसरों की सुविधा और दूसरों को निभाने की दृष्टि से झुकना और राह छोड़ना नहीं आता है वह जिन्दगी में कभी कुछ नहीं कमा पाता है उसे जिन्दगी में संतोष भी नहीं मिलता है।
विनम्रता
जहाँ-कहीं भी जो कुछ खाकर, जैसा-तैसा वस्त्र पहन कर जहाँ-कहीं भी रहकर जो आत्म संतुष्ट रहता है, निर्जन स्थान में रहता है और दूसरों के संसर्ग को त्यागता है अर्थात् हर परिस्थिति में सन्तुष्ट रहने वाला सुखी होता है।
संतोष
मित्रों के झगड़े शत्रुओं के सुअवसर होते हैं।
संगति
जब दो लोग झगड़ते हैं तब दोनों गलती पर होते हैं।
क्षमा
टूटने की अपेक्षा झुकना अच्छा है।
विनम्रता
जो कार्य किसी समय किए जाने की बात है, वह कभी भी नहीं किया जाएगा।
पुरुषार्थ
स्वार्थी व्यक्ति सबसे अधिक ठगा हुआ है।
चरित्र
धूर्त होने से मूर्ख होना अधिक अच्छा है।
चरित्र
दुर्जन, शिल्पी, दास, दुष्ट, ढोल तथा स्त्रियाँ ताड़ित होने पर मृदु होते हैं, ये सत्कार योग्य नहीं है, ये ज्यादा सम्मान करने पर सिर पर चढ़ते हैं।
संगति
जो व्यक्ति जितना अशिक्षित है, वह उतना गरीब है।
ज्ञान
अहंकार ही पराजय का द्वार है।
विनम्रता
किसी की आलोचना न करो जिससे तुम्हारी भी कोई आलोचना न करे।
वाणी
एक शेर को भी मक्खियों से अपनी रक्षा करनी पड़ती है।
विविध
उन्नति वही कर सकता है, जो स्वयं अपने को उपदेश देता है।
संयम
उदाहरण प्रस्तुत करना उपदेश देने से अच्छा है।
चरित्र
सफल और असफल होने वालों के बीच कोई अंतर नहीं होता, केवल यह अंतर होता है कि एक केवल शारीरिक परिश्रम करता है और दूसरा कार्य को बुद्धि और ध्यान को एकाग्र करके करता है।
पुरुषार्थ
प्रशंसा विवेकी को नम्र बनाती है और मूर्ख को अहंकारी बनाकर उसके दुर्बल मन को मदहोश कर देती है।
विनम्रता
एक बुराई दूसरी बुराई को जन्म देती है।
चरित्र