Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 39

नीति वाक्यामृत

287 सूत्र · पृष्ठ 5 / 5

जो मनुष्य भलाई के बदले में बुराई करता है, उसके मन में बुराई सदा निवास करती है।
चरित्र
स्वयं की बुराई को छिपाने से वह पनपती और बढ़ती है।
चरित्र
बुराई नौका में छिद्र में समान है, वह छोटी हो या बड़ी, एक दिन नौका को डुबो देती है।
चरित्र
बुद्धिमान दूसरों की हानि से शिक्षा ग्रहण करते हैं जबकि मूर्ख अपनी हानि से भी कुछ नहीं सीख पाते हैं।
ज्ञान
बुद्धिमान मनुष्य के दिल में एक आईने की तरह सभी चीजों का बिम्ब पड़ना चाहिए पर उनमें से किसी की वजह से मैल नहीं आना चाहिए।
मन
भलाई करने वाला पराया भी भाई के समान होता है और भाई भी यदि अहित चाहे तो वह शत्रु ही है।
संगति
बालक का भाग्य सदैव उसकी माँ के द्वारा निर्मित होता है।
परिवार
यदि तुम्हारे भाग्य में डूबकर मरना है, तो तुम चम्मच भर पानी में भी डूब मरोगे।
कर्म
जिस क्षण हमें अपनी भूल मालूम हो, उसी क्षण हमारा पुनर्जन्म हुआ मानो।
विवेक
शिक्षा, उपदेश, सत्संग किसी से भी हमारे ऊपर उतना प्रभाव नहीं पड़ता, जितना अपनी भूलों के कुपरिणाम को देखकर पड़ता है।
ज्ञान
अपने मन की गुप्त बातें किसी को न बतावें, मन के भेद दूसरे को देने वाले लोग सदा ही धोखा खाते हैं।
मन
अपने मन को जीतना कठिन है, लेकिन जब मन को जीत लिया तो सब कुछ जीत लिया, जो कि अभ्यास और वैराग्य से जीता जाता है।
मन
जैसे लाडले बच्चे का मन हमेशा अतृप्त रहता है, अतः मन को लाड़ कम करके उसे दबाकर रखना चाहिए।
मन
जिसको रहस्य गोपनीय रखना नहीं आता वह सफलता का मुँह नहीं देख सकता है।
समृद्धि
जो व्यक्ति अपना रहस्य अपने सेवक को बताता है वह सेवक को अपना स्वामी बना लेता है।
विवेक
एक साथ ही लक्ष्मी और विवेक का वरदान प्रायः मनुष्यों को कम ही मिलता है।
धन
एक व्यवहार बुद्धि सौ अव्यवहार बुद्धियों से अच्छी है।
ज्ञान
विपत्ति से बढ़कर अनुभव सिखाने वाला कोई विद्यालय आज तक नहीं खुला है।
ज्ञान
क्रोध से वैसे काम नहीं बनते जैसे शान्ति से बनते हैं।
क्षमा
जिसमें शान्ति का निवास नहीं है, उसके सारे सद्गुण व्यर्थ हैं।
संयम
अगर तुम एक समय में बहुत से काम करना चाहोगे तो तुम किसी भी काम में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर सकोगे।
पुरुषार्थ
मनुष्य जितने सम्मान के लायक हो, उतना ही उसका सम्मान करना चाहिए, उससे अधिक नहीं अन्यथा उसके गिरने का डर रहता है।
विनम्रता
जहाँ अपूज्यों की पूजा होती है तथा पूज्यों का अपमान होता है, वहाँ दुर्भिक्ष, मरण तथा भय ये तीनों होते हैं।
धर्म
किसी प्रकार की हानि से रहित बोलने को सत्य बोलना कहते हैं।
सत्य
ज्ञानी पुरुष विवेक से सीखते हैं, साधारण मनुष्य अनुभव से, अज्ञानी आवश्यकता से और पशु स्वभाव से शिक्षित होता है।
ज्ञान
दूसरों के दुर्भाग्य से सावधानी सीखना ही अधिक उचित है।
ज्ञान
काँटों पर चलने वाले नंगे पाँव नहीं चला करते हैं।
विवेक
लँगड़े की संगति में रहोगे तो तुम भी लगड़ा कर चलने लगोगे।
संगति
जरूरी नहीं कि जो रूप में ठीक हो वह सद्गुण सम्पन्न भी हो।
चरित्र
अच्छा स्वभाव सदा सौन्दर्य के अभाव को पूरा कर देगा किन्तु सौन्दर्य अच्छे स्वभाव के अभाव की पूर्ति नहीं कर सकता है।
चरित्र
बिना सद्गुण के सुंदरता अभिशाप है।
चरित्र
सर्वोत्तम मनुष्य त्रुटियों से ढलकर ही निकलते हैं।
चरित्र
जो गलती करता है वह मनुष्य है। जिसे गलती पर दुःख है वह संत है, जिसे गलती का घमंड है, वह शैतान है।
चरित्र
दूसरों की त्रुटियाँ सुनकर प्रसन्न होने वाला अपनी बुराईयाँ सुनकर क्षुब्ध होगा।
चरित्र
विवेकशील पुरुष दूसरों की गलतियों से अपनी गलती सुधारते हैं।
विवेक
जब तुम्हारा मन सत्य से विमुख होकर असत्य की ओर झुकने लगे तो समझ लो कि तुम्हारा सर्वनाश निकट ही है।
सत्य
संसार धर्मात्मा और न्याय परायण पुरुष की निर्धनता को हेय (हीन) दृष्टि से नहीं देखता है।
धर्म
यदि तुम मांस खाओगे तो नरक का द्वार तुम्हारे बाहर निकलने के लिए कभी नहीं खुलेगा।
आहार
जिसका मन सत्यशीलता में निमग्न है, वह पुरुष तपस्वी से भी महान् और दानी से भी श्रेष्ठ है।
सत्य
तुम जिन बातों के रसिक हो, उनका पता यदि तुम शत्रुओं को न चलने दोगे; तो तुम्हारे शत्रुओं की योजनायें निष्फल सिद्ध होंगी।
विवेक
यदि समुचित रणभूमि को चुन लें और सावधानी के साथ युद्ध करें, तो दुर्बल भी अपनी रक्षा करके शक्तिशाली शत्रु को जीत सकते हैं।
विवेक
वैभव असावधान लोगों के लिए नहीं है ऐसा संसार के सभी विज्ञजनों का अभिमत है।
पुरुषार्थ
पूर्ण विचार करो और किसी की ओर मत झुको, निष्पक्ष होकर नीतिज्ञजनों की सम्मति लो, न्याय की यही रीति है।
सत्य
दुष्टों को मृत्यु दण्ड देना अनाज के खेत से घास को बाहर निकालने के समान है।
धर्म
छल-छिद्र द्वारा संचित किया हुआ धन ऐसा ही है जैसे कि मिट्टी के कच्चे घड़े में पानी भरकर रखना है।
धन
अधूरा काम और पराजित शत्रु–ये दो बुझी चिंगारियों के समान हैं, वे समय पाकर बढ़ जाते हैं और असावधान आदमी को आ दबोचते हैं।
पुरुषार्थ
लोग एक हाथी को दूसरे हाथी का माध्यम बनाकर पकड़ते हैं, ठीक इसी प्रकार एक काम को दूसरे काम का साधन बना लेना चाहिए।
विवेक