Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 39

नीति वाक्यामृत

287 सूत्र · पृष्ठ 3 / 5

कलह से मनुष्य के घर, कुवाक्य बोलने से मित्रता, कुकर्म से मनुष्य का यश नष्ट हो जाता है, प्रमाद से पढ़ा सुना हुआ श्रुत नष्ट हो जाता है।
Misc.
लोग प्रायः कहा करते हैं कि अपना मन शुद्ध है तो संसार के कहने से क्या होता है? यह बात केवल साधना की एकान्तिक दृष्टि से ठीक है, लोक, संग्रह की दृष्टि से नहीं।
मन
जिसकी लाखों मूर्ख प्रशंसा करें और दूसरी ओर एक सदाचारी धर्मात्मा का ज्ञान उसके आचार को दूषित समझें तो तत्त्वज्ञानी धर्मात्मा की सम्मति ही ठीक है।
विवेक
समय-समय पर अवसरानुकूल कभी कोमल-कभी तीक्ष्ण स्वभाव वाला बन जाना चाहिए। अचल निष्ठा ही महान् कार्य की जननी है।
विवेक
बुद्धिमान झगड़े में न पड़े, व्यर्थ वैर से अलग रहे, थोड़ी हानि सह ले, वैर से धन की प्राप्ति हो, तो भी उसे छोड़े।
क्षमा
आत्म विश्वास, दृढ़ता तथा वैराग्य ये तीन बातें जो अपने में धारण करता है, वही समस्त श्रेष्ठ गुणों का आश्रय लेने से सम्पूर्ण प्रजा का नेता होता है।
चरित्र
जब नेता उन कर्त्तव्यों को छोड़ देते हैं जो उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए निर्दिष्ट किए हैं तब सबसे अधिक शक्तिशाली संघटन भी विघटित हो जाते हैं।
चरित्र
देर तक सूर्य को न देखें। सिर से बोझा नहीं उठाना चाहिए। निरन्तर सूक्ष्म, अत्यन्त दीप्त, अपवित्र या अप्रिय वस्तुओं को देर तक नहीं देखना चाहिए।
स्वास्थ्य
घृणा और द्वेष जब बढ़ता है तब वह शीघ्र ही पतन के गड्ढे में गिराता है।
क्षमा
मनुष्य पराक्रम के द्वारा दुःखों से पार होता है और प्रज्ञा से परिशुद्ध होता है।
पुरुषार्थ
जो परिहास का उत्तर नहीं दे सकता, वह हँसता हुआ कम से कम रस तो ले सकता है।
Misc.
हम ऐसा मानने की गलती कभी न करें, कि गुनाह में छोटा-बड़ा होता है।
कर्म
गुप्त पाप करने वाले व्यक्ति शंका मात्र से प्रकाश में आ जाते हैं।
कर्म
उस पुत्र को धिक्कार है, जो समर्थ होते हुए भी पिता के मनोरथ को पूर्ण नहीं करता जो पिता की चिन्ता को दूर नहीं कर सकता उस पुत्र के जन्म लेने से क्या प्रयोजन है?
परिवार
विद्वान्, शूरवीर, धनी, धर्म निष्ठ, स्वामी, तपस्वी, सत्यवादी तथा बुद्धिमान मनुष्य ही प्रजा की रक्षा करते हैं।
चरित्र
जो अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं करता वह असभ्य है, प्रतिज्ञा का पालन ही महानता का लक्षण है।
सत्य
प्रिय व्यक्ति का दर्शन अमृत है।
Misc.
परस्पर फूट वाले लोगों का शीघ्र ही नाश हो जाता है।
संगति
बंधु के अपरिचित होने पर भी उसके मिलने पर चित्त प्रसन्न होता है।
परिवार
अपनी बुद्धि से साधु होना अच्छा है परन्तु पराई बुद्धि से राजा होना अच्छा नहीं है।
ज्ञान
प्रतिभा अविष्कार करती है, बुद्धि केवल अन्वेषण करती है।
ज्ञान
संदिग्ध कार्यों में प्रवृत्त होना बुद्धिमानी का काम नहीं है।
विवेक
बुद्धिमान पुरुष को अल्प सुख एवं अधिक क्लेश वाला कार्य न ही करना चाहिए, बुद्धिमानी इसी में है कि थोड़ा व्यय करके बहुत की रक्षा करें।
विवेक
बुद्धिमान को चाहिए कि वह अपना काम बनाने के लिए शत्रुओं को भी कन्धे पर बिठाकर ढोये।
विवेक
कार्यों को प्रारम्भ न करना बुद्धि का पहला लक्षण है और प्रारम्भ किए हुए कार्य को पूरा करना दूसरा लक्षण है।
पुरुषार्थ
बुद्धिमान व्यक्ति अपने शत्रुओं से बहुत बातें सीखते हैं।
ज्ञान
मूर्खों की सफलताओं की अपेक्षा बुद्धिमानों की गलतियाँ अधिक मार्ग दर्शक होती हैं।
ज्ञान
बुराई से हारो नहीं भलाई से बुराई को जीत लो।
चरित्र
भय से डरने वाले विवेकहीन हुआ करते हैं।
विवेक
मंत्रणा छह कान में पड़ते ही रहस्य खुल जाता है तथा चार कान में स्थिर रहता है इसलिए सभी प्रयत्नों से बुद्धिमान मंत्रणा में छह कान न होने दें।
विवेक
भोजन मसाले से मनुष्य गुणों से अच्छा लगता है।
चरित्र
मनुष्य केवल रोटी से जीवित नहीं रहता अपितु विश्वास, प्रशंसा व सहानुभूति भी आवश्यक है।
Misc.
मनुष्य उसी को कहना जो कि मननशील होकर अपने समान अन्यों के सुख-दुःख और हानि लाभ को समझे, अन्यायकारी बलवान से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल हो तो भी डरता रहे।
चरित्र
महत्वाकांक्षा की प्रेरणा मनुष्य को साहस, लगन और दृढ़ता प्रदान करती है, इन गुणों के अभाव में मानव निर्जीव हो जाता है।
पुरुषार्थ
बुद्धिमानों को चाहिए कि नियमों की रक्षा करते हुए लोक व्यवहार का निर्वाह करें क्योंकि नियमों के द्वारा निश्चय किए गए धर्म-मार्ग पर सर्व साधारण भी चलते हैं।
धर्म
सीमित खर्च को बुद्धिमत्ता की पुत्री, संयम की बहन और स्वतंत्रता की माता कहा जा सकता है। खर्चीला व्यक्ति शीघ्र ही निर्धन हो जाता है और निर्धनता परावलम्बन के लिए बाध्य करती है तथा भ्रष्टाचार को निमंत्रित करती है अतः जो भी आपके पास है उससे कम व्यय करो।
संतोष
विद्वान् शत्रु भी हो तो भी श्रेष्ठ होता है, मूर्ख हितकारी भी हो तो भी श्रेष्ठ नहीं होता है।
ज्ञान
अनुचित बातों का आग्रह करने वाला प्रायः मूर्ख होता है विद्वान् नहीं।
ज्ञान
मूर्ख के चिह्न–अहंकारी, हठी, अप्रियवादी।
ज्ञान
अधर्म में धर्म बुद्धि, धर्म में अधर्म बुद्धि रखने वाला मूर्ख होता है।
विवेक
विशाखा नक्षत्र के उपरांत वर्षा काल, प्रसव के उपरांत नारी का यौवन, प्रणाम करने के उपरान्त सत्पुरुषों का क्रोध और याचना करने के बाद मनुष्य का गौरव समाप्त हो जाता है।
Misc.
अत्यन्त चमकता हुआ भी जुगनू अग्नि नहीं होता है।
Misc.
अकेले स्वादिष्ट भोजन न करें, अकेले किसी विषय का निश्चय न करें, अकेले रास्ता न चलें और बहुत से लोग सोये हों तो अकेले जागते न रहें।
विवेक
कोई भी वस्तु इतनी अच्छी नहीं होती जितनी पहले प्रतीत होती है।
Misc.
जब बुरे व्यक्ति संगठित हो जाते हैं, तब अच्छे लोगों को भी मिल जाना चाहिए, अन्यथा एक-एक करके पराजित हो जायेंगे।
संगति
धन, जीवन, स्त्री और भोजन के विषय में सब प्राणी अतृप्त होकर गये, जा रहे हैं और जायेंगे।
संतोष
धर्म, अर्थ, काम, कीर्ति और जीवन इनके विषय में सब प्राणी सदा अतृप्त रहकर मरे हैं, मरेंगे और मर रहे हैं।
संतोष
अपकीर्ति माननीय पुरुष के लिए मरण से भी अधिक बुरी होती है।
चरित्र
यश की प्राप्ति भले ही न हो किन्तु अपयश होना उचित नहीं है।
चरित्र
हानि क्या है? अवसर चूक जाना।
समय
असमय में किया हुआ कार्य न किया हुआ जैसा ही होता है।
समय
शत्रु में दोष देखकर बुद्धिमान झट वहीं क्रोध को व्यक्त नहीं करते हैं, अपितु समय को देखकर उस ज्वाला को मन में ही समाये रखते हैं।
क्षमा
अपना अवसर पहचानो, योग्य द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव को पहचानो।
विवेक
नीतिज्ञ व्यक्ति अशुभ का समय मुहूर्त भर भी टालना बहुत मानते हैं।
विवेक
गुरुजनों की आज्ञा पर तर्क वितर्क नहीं करना चाहिए।
विनम्रता
ज्ञानियों का मूल मंत्र है कि जहाँ जो कुछ अच्छा मिले सीखना चाहिए।
ज्ञान
पुराने आघातों का स्मरण करना मानसिक अन्धकार है और आघात कर्ताओं से बदला लेने का विचार करना मानसिक आत्मघात है।
क्षमा
आधुनिकता के विषय में बिना घृणा के बोलना और प्राचीनता के विषय में बिना अन्ध श्रद्धा के बोलना चाहिए।
विवेक
जिस आपदा में अच्छी क्रिया से किसी प्रकार आत्मा की रक्षा न हो सके उसमें निषिद्ध कर्म भी करना चाहिए क्योंकि जब सड़क पर वर्षा से कीचड़ हो जाती है तब पंडित लोग भी कभी-कभी कुमार्ग से जाते हैं, उनका कुमार्ग में जाने का लक्ष्य नहीं होता बल्कि सड़क के कीचड़ से बचने का लक्ष्य होता है।
विवेक
सदाचारी, श्रद्धावान और ईर्ष्या रहित मनुष्य सौ वर्ष तक जीवित रहता है चाहे वह सब प्रकार के शुभ लक्षणों से हीन ही क्यों न हो?
चरित्र