Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 37

कुटिल नीति पर नहीं, धर्म नीति पर चलें

186 सूत्र · पृष्ठ 1 / 4

मूढ़ आदमी यदि अपने नंगे बदन को ढँकता है, तो इससे क्या लाभ जबकि उसके मन के अवगुण ढँके ही नहीं हैं।
चरित्र
जो आदमी न तो स्वयं भला बुरा पहचानता है और न ही दूसरों की सलाह मानता है वह जीवन भर अपने बन्धुओं के लिए दुःखदायी बना रहता है।
विवेक
उज्जड़पन से दूसरों की हँसी उड़ाना ऐसा दुर्गुण है, जिससे सभी व्यक्तियों के भीतर घृणा पैदा होती है।
वाणी
यह तो असीम मूर्खता और अपात्रता है कि मदिरा में अपना धन खर्च करें और बदले में विस्मृति और विभ्रम मोल लेवें तथा धर्म व यश नष्ट करें।
आहार
मक्खियाँ घाव चाहती हैं, राजा धन चाहता है, नीच कलह चाहते हैं, पत्नि प्रेम चाहती है, पति काम चाहता है, माता-पिता सेवा चाहते हैं, स्त्रियाँ प्रशंसा चाहती हैं, संतान स्नेह चाहती है, मित्र प्रेम चाहते हैं, श्रावक सम्पत्ति चाहते हैं और साधु शान्ति चाहते हैं।
Misc.
जन्मदाता, दीक्षादाता, विद्यादाता, अन्नदाता और भयत्राता ये पाँच पिता माने गये हैं।
परिवार
राजपत्नी, गुरु पत्नी, मित्र पत्नी, पत्नी की माता और अपनी माता ये पाँच माताएँ मानी गई हैं।
परिवार
प्रत्येक मनुष्य प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर अग्रसर होता है जैसे राग के बाद विराग, लोभ के बाद शौच, संग्रह के बाद त्याग, काम के बाद निष्काम, श्रम के बाद विश्राम, भोग के बाद योग।
अनासक्ति
आदमी अपराध तीन कारणों से करता है–पेट, समाज और संगति के कारण।
संगति
जरा (बुढ़ापा) रूप को, आशा धैर्य को, मृत्यु प्राण को, क्रोध कान्ति (श्री) को, काम लज्जा को नष्ट कर देता है किन्तु अभिमान अकेला ही सब गुणों को एक साथ नष्ट कर देता है।
विनम्रता
आप यदि अपनी उन्नति चाहते हो तो कभी चार के कच्चे नहीं होना श्रद्धा, कर्त्तव्य, विचार और कान।
चरित्र
आपका पहला गुण सत्यवादी, दूसरा समझदारी, तीसरा खुशमिजाजी और चौथा हाजिर जवाबी हो।
चरित्र
जो आमदनी से अधिक खर्च करता है, शक्ति रहित होकर कलह करता है, रोगी होकर सब कुछ खाता है, पुत्र रहित होकर धन संग्रह करता है, खोटी संगति करता है वह मनुष्य शीघ्र नष्ट होता है।
धन
स्त्री विषयक आसक्ति, जुआ, शिकार, मद्यपान, वचन की कठोरता, अत्यन्त कठोर दण्ड देना और धन का दुरुपयोग करना; ये सात दुःखदायी कार्य लोगों को सदा के लिए त्याग देने चाहिए क्योंकि इनसे प्रतापी राजा भी प्रायः नष्ट हो जाते हैं।
संयम
जो किसी दुर्बल का अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर शत्रु के साथ बुद्धिपूर्वक व्यवहार करता है, बलवानों के साथ युद्ध पसन्द नहीं करता तथा समय आने पर पराक्रम दिखाता है वही वीर है।
चरित्र
जो क्रोध या उतावली के साथ धर्म, अर्थ तथा काम का आरंभ नहीं करता, पूछने पर यथार्थ बात ही बतलाता है, मित्रों के साथ झगड़ा नहीं करता, आदर न पाने पर क्रुद्ध नहीं होता, विवेक नहीं खोता, दूसरों के दोष नहीं देखता, सब पर दया करता है, बढ़ चढ़कर नहीं बोलता, विवाद नहीं करता तथा दुःखों को समता से सह लेता है, ऐसा मनुष्य सब जगह प्रशंसा पाता है।
चरित्र
जो मनुष्य शत्रु से मिले हुए मित्र को, कुल्टा स्त्री को, कुल को ध्वस्त करने वाले पुत्र को, मूर्ख मंत्री को, उतावली करने वाले राजा को, प्रमादी वैद्य को, रागी देव को, विषयी गुरु को और दया रहित धर्म को मोह वश नहीं छोड़ता वह कल्याण के द्वारा छोड़ दिया जाता है अर्थात् उसका कल्याण नहीं होता है।
विवेक
प्रेम से बढ़कर दूसरा बन्धन नहीं, विषय से बढ़कर दूसरा विष नहीं, क्रोध से बढ़कर दूसरा शत्रु नहीं, विवेक से बढ़कर दूसरा मित्र नहीं, जन्म से बढ़कर दूसरा दुःख नहीं, सन्तोष से बढ़कर सुख नहीं, लोभ से बढ़कर पाप नहीं, सेवा से बढ़कर पुण्य नहीं और दया-अहिंसा से बढ़कर धर्म नहीं है।
अहिंसा
लोभी मनुष्य को धन से, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसके इच्छानुकूल कार्य से, पंडित को भोजन से या यथार्थता से, शूद्र को शक्ति से, क्षत्रिय को सम्मान से, बच्चों को प्रेम-स्नेह से, स्त्री को उसकी प्रशंसा करके वश में करना चाहिए।
विवेक
सत्य से धर्म की रक्षा होती है, योग से विद्या सुरक्षित होती है, सफाई से सुन्दर रूप की रक्षा होती है और सदाचार से कुल की रक्षा होती है।
सत्य
लालची को धन देकर, मूर्ख को उपदेश देकर और विद्वान् को सत्य का ज्ञान कराकर वश में करना चाहिए।
विवेक
मीठे वचन से-मित्रता, विनय से-पात्रता, दान से-यश, अभ्यास से-विद्या, उदारता से-प्रभुता, सदाचार से विश्वास, शृंगार से-अनुराग, उद्यम से-लक्ष्मी, न्याय से-राज्य, क्षमा से-तप और लोभ से पाप बढ़ता है।
चरित्र
कीचड़ से कंचन उठा लेना सज्जनों की नीति है।
चरित्र
'नेता' मंच, माला, माइक और नोट-वोट-सपोर्ट चाहते हैं परन्तु नैतिकता सेवा चाहती है।
चरित्र
पागल हाथी से, क्रुद्ध सर्प से, भूखे सिंह से, मूर्ख नौकर से, व्याभिचारिणी स्त्री से, अहंकारी से, शरारती से, वैरी से, वैद्य से सदा सावधान रहें।
विवेक
धनवान आदमी, कुत्ता, सांड और शराबी इनसे सदा सावधान रहें।
विवेक
बहुत खाने वाले, सब लोगों से वैर रखने वाले, अधिक मायावी, क्रूर, देश काल का ज्ञान न रखने वाले और निन्दित वेष धारण करने वाले मनुष्य को कभी अपने घर में न ठहरने दें।
संगति
मनुष्य को कदापि समुद्र में स्नान नहीं करना चाहिए चाहे समुद्र में तरंगों का उठना युगों-युगों से बंद हो गया हो।
विवेक
सीधे आदेश देने की बजाय प्रश्न पूछिये।
वाणी
जो जितने ऐश-ओ-आराम में जीते हैं, वे उतने ही आलसी और देह प्रेमी होते हैं।
संयम
आलस्य सबसे अधिक विघ्नकारक है, आलस्य से देह और मन दोनों ही कमजोर होते हैं।
पुरुषार्थ
असली हीरे के विरोधी, कंकर-पत्थर नहीं, नकली हीरे होते हैं।
Misc.
अकेले कभी किसी पथ पर नहीं चलना चाहिए यदि कोई गंभीर और पराक्रमी न भी हो तो किसी डरपोक या तुच्छ का ही साथ कर लेना चाहिए।
संगति
भूत को भूलना ही श्रेयस्कर है।
समय
दूसरों को गिराकर आगे बढ़ने वाले को आखिर एक दिन गिरना ही पड़ता है।
चरित्र
सोने को कसौटी पर कसने से और व्यक्ति के पास में रहने से मालूम पड़ता है कि वह कैसा है?
संगति
किसी से कुछ पाना हो तो भिखारी बनकर जाओ, सम्राट् बनकर नहीं।
विनम्रता
शास्त्रों को साधुओं के लिए और मूर्तियों को पुजारियों के लिए सौंप दिया इसलिए मंदिर खाली हो गये हैं।
भक्ति
आदमी कान का कच्चा होता है और स्त्री सन्देह की पुतली होती है।
मन
प्रेम सबसे कीजिए विश्वास कुछ पर और बुरा किसी का भी मत कीजिए।
चरित्र
न्याय में देरी करना, अन्याय को बढ़ावा देना है।
सत्य
जहाँ पर सम्मान नहीं, जीविका नहीं, बंधु नहीं और विद्या का लाभ भी नहीं वहाँ नहीं रहना चाहिए।
विवेक
अपने सुख के दिनों का स्मरण करने से बड़ा दुःख कोई नहीं है।
समय
शराब, सैक्स और संगीत मूर्च्छा में ले जाते हैं।
संयम
विरोध प्रचार की कुँजी है।
Misc.
पीड़ा पाप का परिणाम है।
कर्म
बच्चों को पढ़ा-लिखा कर इतने लायक भी मत बना देना कि कल वह आपको ही नालायक समझने लगे।
परिवार
उत्तम जीवन जीने के लिए नकारात्मक सोचना छोड़ दें।
मन
किसी का चहेता बनने के लिए उसके नाम को न भूलें।
चरित्र
सभी के लिए अपना नाम सबसे महत्त्वपूर्ण और मधुरतम शब्द होता है।
चरित्र
हर साधु उपदेशक हो सकता है, पर हर उपदेशक साधु नहीं हो सकता।
चरित्र
एक पुण्य ही महाबन्धु है, एक पाप ही महाशत्रु है, असंतोष ही बड़ा रोग है और धैर्य ही सब प्रयोजन सिद्ध करने वाला है।
कर्म
दूसरों के दोषों पर ध्यान रखने वाला अपने पापों के प्रति अंधा हो जाता है।
विवेक
अतिथि सत्कार से इंकार सबसे बड़ी दरिद्रता है।
दान
बहुत अधिकार मिल जाने पर मनुष्य का विचार दूषित हो जाता है।
चरित्र
किसी के अस्तित्व को मिटाने का अधिकार किसी को नहीं है।
अहिंसा
धन से भी बड़ा पाप है अधिकार का लोभ, इसी के कारण मनुष्य स्वयं को खो बैठता है।
अनासक्ति
विपत्ति से बढ़कर अनुभव देने वाला विद्यालय आज तक नहीं खुला है।
ज्ञान
विनय से पढ़ा हुआ शास्त्र यदि प्रमाद से विस्मृत भी हो जाता है तो वह भवान्तर में नियम से प्राप्त होता है और केवलज्ञान प्राप्त करा देता है।
ज्ञान
अनुभव सिर्फ ज्ञान नहीं देता, अपितु अनुभव वासनाओं से भी मुक्ति दिला देता है।
ज्ञान