Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 16

लड़के व्यसन में-परिवार टेंशन में

258 सूत्र · पृष्ठ 1 / 5

जिसके देव-शास्त्र-गुरु की भक्ति, दान, दया और पूजन है तथा जो आठमद और सप्त व्यसनों से रहित है उसे जिनेन्द्र भगवान् ने श्रावक कहा है।
धर्म
दरिया ने झरने से पूछा तुझे समन्दर नहीं बनना है क्या? झरने ने बड़ी नम्रता से कहा बड़ा होकर खारा होने की अपेक्षा छोटा रहकर मीठा होना अच्छा है।
विनम्रता
चंदन की अपेक्षा वंदन शीतल होता है, भोगी होने की बजाय उपयोगी होना ज्यादा अच्छा है।
चरित्र
'प्रभाव' अच्छा होने की बजाय 'स्वभाव' अच्छा होना ज्यादा अच्छा है।
चरित्र
वस्त्र, धन, भोजन, यश और विद्या; ये पाँच जुए में हाथ डालने वाले के पास नहीं आयेंगे।
चरित्र
समृद्धि के क्षणों में पिच्छी जैसी मृदुता और विपत्ति के क्षणों में कमण्डलु जैसी कठोरता होनी चाहिए, मयूर-पिच्छी को देखकर जिसका मन मयूर नाच उठे कमण्डलु को देखकर आभामण्डल चमक उठे वही श्रावक है।
चरित्र
इंसान से मोहब्बत आपकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है, भगवान् से मोहब्बत आपकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है।
भक्ति
हे आत्मन्! आप अपने प्राण दे देना पर नियम मत छोड़ना।
संयम
गुण दिखाई दें तो मन को कैमरा बना लीजिए, अवगुण दिखाई दें तो आईना।
विवेक
माना दुनिया बुरी है पर आपको अच्छा बनने से किसने रोका है।
चरित्र
जितना अँगूठा फोन पर चलता उतना माला पर चलता तो जीवन सफल हो जाता।
णमोकार
प्रवीचार की भावना से सुविचार खत्म हो जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
बुरी आदतें अगर वक्त पर न बदली जायें तो वे आपका वक्त बदल देंगी।
चरित्र
जिन्दगी में आप कितने खुश हैं यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्त्वपूर्ण है कि आपकी वजह से कितने लोग खुश हैं।
दान
हमेशा छोटी-छोटी गलतियों से बचने की कोशिश किया करो क्योंकि इंसान पहाड़ों से नहीं पत्थरों से ठोकर खाता है।
विवेक
इंसान चेहरा तो साफ रखता है जिस पर लोगों की नजर रहती है, पर दिल को साफ नहीं रखता जिस पर ऊपर वाले की नजर रहती है।
चरित्र
जमीं पर मकान बनाना सरल, दूसरे के दिल में जगह बनाने में जिन्दगी गुजर जाती है।
चरित्र
एक बार इंसान ने कोयल से कहा—तू काली न होती तो कितनी अच्छी होती? फिर सागर से कहा तेरा पानी खारा न होता तो कितना अच्छा होता, फिर गुलाब से कहा—तुझमें काँटे न होते तो कितना अच्छा होता? तब तीनों एक साथ बोले हे इंसान! तुझमें दूसरों की कमियाँ देखने की आदत न होती तो तू कितना अच्छा होता?
विवेक
स्त्री आलिंगन किसी अन्य का करती है, वचन से किसी अन्य को बहलाती है, किसी अन्य को देखती है, किसी अन्य के कारण रोती है, किसी अन्य को शपथों द्वारा अभिप्राय प्रकट करती है, किसी को वरती है, किसी अन्य के साथ शयन करती है, शयन को प्राप्त होकर भी किसी अन्य का चिंतन करती हैं।
चरित्र
प्रसन्न मुख, निर्मल दृष्टि, वार्तालाप में प्रीति, मधुर वाणी स्नेह का अधिक प्रकट होना तथा आदरपूर्वक देखना ये सदा अनुराग रखने वाले पुरुष के चिह्न हैं।
चरित्र
स्वयं के दोष देखने वाले को दूसरे के दोष देखने का समय ही नहीं मिलता है।
विवेक
जिसके हृदय में सत्य है उसके हृदय में परमात्मा विराजते हैं।
सत्य
असंयमित जीवन पशु जैसा जीवन है, जिसके जीवन में संयम है उनको शान्ति है।
संयम
संसार में महान् वह है जो गुणवान की प्रशंसा कर पाता है और सुन पाता है।
विनम्रता
संसार में सबसे अवगुणी वह है जो गुणीजनों के गुण कहने में हिचकता है।
विनम्रता
यदि आपको किसी एक से शिकायत है तो उससे कहिए, यदि अधिकतर या सभी लोगों से शिकायत है तो अपने आपसे कहिए और यदि किसी से भी शिकायत नहीं है तो शायद आप सन्त हैं।
चरित्र
सहज, सरल, मृदु, विनयी, सदाचार ही सच्चे संत के गुण हैं।
चरित्र
संत वही है जिसे देखकर असंत की दुर्जनता पलायन कर जाये।
चरित्र
अपनों से तो सभी प्रेम से बोलते हैं पर जो परायों से भी अपनेपन से बोले वह संत पुरुषों की भाषा है।
वाणी
मनचाहा सुख किसे मिलता है क्योंकि सुख भाग्य के अधीन है इसलिए संतोष का आश्रय लेना चाहिए, जो संतोष से उत्पन्न अमृत को पीकर भोग तृष्णा को छोड़ते हैं वे गृहस्थ मुनि तुल्य होते हैं।
संतोष
अपनी स्त्री, भोजन और धन इन तीनों में संतोष करना चाहिए परन्तु स्वाध्याय, तप और दान इन तीनों में संतोष नहीं करना चाहिए।
संतोष
अगर आप संतुष्ट हैं तो आजाद रहेंगे क्योंकि आजादी ही संतुष्टि का फल है।
संतोष
अगर आप संतुष्ट हैं तो आपकी गिनती दुनिया के सबसे अमीर लोगों में होगी।
संतोष
दो ही पुरुष अपने विपरीत कर्म के कारण शोभा नहीं पाते–अकर्मण्य गृहस्थ और प्रपंच में लगा हुआ संन्यासी।
चरित्र
जो व्यक्ति थोड़ी चीजों से संतुष्ट नहीं होता है, वह जिन्दगी में कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकता है।
संतोष
भोगासक्त मनुष्य सप्तम नरक के नारकी से भी पतित है क्योंकि नारकी तो सम्यक्त्व उत्पन्न कर सकता है, परन्तु भोगासक्त मनुष्य नहीं।
अनासक्ति
दोष का प्रायश्चित्त, उन्नति मार्ग में ही लग जाना है।
चरित्र
मात्र पुण्योदय से लाभ नहीं होता है किन्तु पुण्यात्मा बनने में लाभ है।
कर्म
निर्मोही तो स्वयं ही पुण्यात्मा है धन, संतान, परिवार के कारण नहीं।
अनासक्ति
यदि शान्ति चाहते हो तो किसी कार्य के मुखिया मत बनो, जो कार्य उचित लगे तो उसके बारे में बतलाकर विरक्त बने रहो।
अनासक्ति
किसी भी प्रकरण में गुणों पर दृष्टि रहे तो वह समय व्यर्थ गया नहीं कहलाता है।
विवेक
फूलों की सुगंध केवल एक दिशा में फैलती है लेकिन एक व्यक्ति की अच्छाई हर दिशा में फैलती है।
चरित्र
गाड़ी के चारों पहिया ठीक होना चाहिए एवं श्रावक की चारों कषायें मन्द होना चाहिए।
संयम
हमें सुबह उठकर चेहरे पर मुस्कान रखनी है क्योंकि शीशे में स्वयं के मुरझाये चेहरे को देखने से अपशकुन हो जाता है। प्रतिदिन आधा घंटा योगासन, प्रार्थना, ध्यान करें, अपना घर, कार्यालय स्वच्छ, साफ रखें। अच्छा दिमाग और दिल ये दोनों विजय दिलाते हैं।
चरित्र
लड़कियाँ फैशन में, लड़के व्यसन में रहने से परिवार टेंशन में रहता है। सादा और पौष्टिक आहार लेवें, छोटी-छोटी बचत नियमित करते रहें क्योंकि खराब समय जीवन में कभी आने की सूचना नहीं देता है।
परिवार
हर परिस्थिति में अपने को ढालें, कभी बिना ए. सी. पंखे के भी सोने की आदत डालें, हर जगह, हर समय हर चीज उपलब्ध हो जरूरी नहीं है।
संतोष
समय के पूर्णतः पाबंद रहें, आप घड़ी दिखाने के लिए नहीं, समय पर कार्य करने के लिए पहनते हैं।
समय
अगर आपका व्यवहार अच्छा है तो आप लोगों के दिल में उतरेंगे अन्यथा दिल से उतर जायेंगे।
चरित्र
विफलता में गलती खोजना चाहिए भाग्य को नहीं कोसना चाहिए।
पुरुषार्थ
हमेशा अपनी वाणी मधुर, कोमल तथा नम्र रखें।
वाणी
हमेशा हर कार्य के लिए अपनी जवाबदारी समझें और मौजूदगी दर्ज करायें।
चरित्र
माफ करना, धन्यवाद, कृपया ये शब्द जितने अधिक प्रयोग करेंगे जीवन उतना ही आनंदित होगा।
वाणी
कार्यशैली हमेशा उत्तम होनी चाहिए आपका हर कार्य परफेक्ट होना चाहिए, कार्य को पूजा समझ कर करें यही जीवन प्रबंधन की कला है।
पुरुषार्थ
जब आप सच्चाई की राह पकड़ लोगे तो सब राहें आसान हो जायेंगी।
सत्य
जो मनुष्य बदला लेना चाहता है वह अपने घाव को ताजा बनाये रखता है।
क्षमा
योग्यता और परिस्थिति को ध्यान में न रखकर महत्त्वाकांक्षा गढ़ने वाला दुःखी रहता है और उपहास का पात्र होता है।
संतोष
बेकसूर कौन होता इस जमाने में बस सबके गुनाह पता नहीं चलते हैं।
विविध
ऐसी बात जिसे कहने में लज्जा आये उसे मन से भी नहीं सोचना चाहिए। ऐसा कार्य जिसे छुपकर करना पड़े उसे कभी नहीं करना चाहिए।
चरित्र
कभी आप भगवान् से दूसरों के लिए माँग कर देखो, आपको कभी अपने लिए माँगने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
भक्ति
नफरत को हजार मौके दो कि वो प्रेम में परिवर्तित हो जाये लेकिन प्रेम को एक भी मौका मत दो कि वो नफरत में बदल जाये।
क्षमा