Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Wealth

धन

130 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

कुछ लोग पैसे के मालिक होते हैं, कुछ लोगों का पैसा मालिक होता है, आप क्या हैं?
धन
धन कमाने की दौड़ में शामिल न हो क्योंकि धन सब कुछ दे सकता है पर खुशी नहीं दे सकता है।
धन
मलिन वस्त्र वाले, गन्दे दाँत वाले, बहुत खाने वाले, कठोर बोलने वाले, सूर्योदय और सूर्यास्त होने के समय सोने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी त्याग देती है।
धन
जिस प्रकार जवान स्त्री बूढ़े पुरूष का आलिङ्गन नहीं करना चाहती उसी प्रकार लक्ष्मी भी आलसी, भाग्यवादी और साहस हीन व्यक्ति को नहीं चाहती है।
धन
ये चार बातें छोटी होने पर भी बड़ा लाभ प्रदान करती है- न उधार लो, न दो, क्योंकि उधार देने से अक्सर पैसा और मित्र दोनों ही खो जाते हैं।
धन
अनैतिकता से पैसे कमाना कला नहीं क्रूरता हैं।
धन
बेईमानी के धन से ईमानदारी की गरीबी अच्छी है।
धन
सभी पूँछेंगे आप कैसे हैं, जब तक आपके पास पैसे हैं।
धन
न्याय पूर्वक धन का अर्जन न होने से सन्तान भाग रही है, तलाक दे रही है, सलफ़ास खा रही है।
धन
धर्महानि सङ्क्लेश अति, शत्रु विनय कर होय। ऐसा धन नहीं लीजिए, भूखे रहिए सोय।।
धन
किसी भाग्यशाली मनुष्य की ही लक्ष्मी परोपकार के लिए, विद्या विवेक के लिए और सन्तान समाधि के लिए सहायक होती है।
धन
विश्व का कल्याण धन से नहीं धर्म से होता है, धन का विकास पाप से नहीं पुण्य से होता है। धन को धर्म से श्रेष्ठ मानने वाले रे मानव!, धर्म का कार्य धन से नहीं तन मन से होता है।।
धन
जङ्गल में तप कर रहे साधु से पथिक ने रास्ता पूँछा, साधु ने उत्तर दिया इस रास्ते में मत जाओ, वहाँ मौत है। मानी पथिक नहीं माने, चले गये। आगे चलकर जङ्गल में उनकों स्वर्ण मुद्राओं का ढेर मिला, वे प्रसन्न हो गयें। चारों ने मुद्राएँ बाँट लीं एवं एक को मिठाई लेने भेजा। उसके मन में आया कि, 'मिठाई में जहर मिला देते हैं, वे तीनों खाकर मर जायेंगे और मुझे सारी मुद्राएँ मिल जायेंगी'। वहाँ उन तीनों ने सोचा कि 'जैसे ही वह मिठाई लेकर आयेगा और हम लोग उसको मार डालेंगे, जिससे कि चार नहीं तीन हिस्से करने पड़ेंगे'। जैसे ही वह मिठाई लेकर आया और तीनों ने उसे मार डाला और मिठाई खाकर स्वयं भी मर गये, इस प्रकार अहङ्कारी लोग गुरुजनों की बात को ठुकरा कर दुर्दशा को प्राप्त होते हैं।
धन
दुनिया में दो ही बड़े, दामोदर अरू दाम। दामोदर बैठे रहें, दाम करे सब काम।।
धन
जैनों में भी ऐसे लोग हैं, जो न महावीर को न राम को सिर्फ, दौलत राम को मानते हैं।
धन
लोभी हमेशा भविष्य की चिन्ता में खोया रहता है।
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चींटा–चींटी का इतना तीव्र लोभ होता है, कि उनकी गर्दन अलग हो जाये पर त्वचा नहीं छोड़ते हैं।
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कौरवों के मन में उमड़ी सत्ता और साम्राज्य की लालसा महाभारत का कारण बनी।
धन
अतीत में जितने झगड़े हुये थे, वे सब लोभ के कारण हुए थे, जैसे कौरव–पाण्डवों का युद्ध, ''नहीं रहे वे लोभी कौरव जूँझ मरे रण में''।
धन
नीतिकारों के अनुसार राम स्वर्ण मृग के पीछे गये तो सीता हरण हो गया, उसी प्रकार हमारा आत्माराम भी लोभ लिप्साओं के स्वर्ण मृग के पीछे लगा है, अतः सुख शान्ति रूपी सीता खो गयी है।
धन
जर, जोरू, और जमीन झगड़े की जड़ तीन।
धन
लोगों को समझाते हैं, धन नश्वर है, पर खुद के लिये धन ही ईश्वर है।
धन
लोभी को मक्खी चूसने में ग्लानि नहीं और रक्त बहाने में दया नहीं आती है।
धन
पैसों की कीमत गाय के सामने घास के बराबर भी नहीं है, पर मनुष्य पैसों के लिए लड़ता–मरता है क्योंकि उससे यश रूप तथा पाँच इन्द्रियों के विषय मिलते हैं।
धन
कनक–कनक तै सौ गुनी, मादकता अधिकाय। यही खाए बोरात नर, वही पाय बोराय।।
धन
अगनि, चोर, भूपति, विपति, डरत रहै धनवान। निर्धन नींद निशङ्क ले, माने का की हानि।।
धन
धन के इच्छुक प्राणी श्मशान में भी सेवा करते हैं और अनेकों अनर्थों को करते हैं जिससे दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
धन
कड़ा के लोभ में जान गवायी– एक व्याघ्र ने एक राहगीर से कहा कि मेरे पास एक सोने का कड़ा है, वह तुम्हे देना चाहता हूँ। पथिक ने कहा तुम्हारा हमे विश्वास नहीं, तब उसने कहा कि मेरे दाँत टूट गये हैं, नख गिर गये हैं, मैं बूढ़ा हो गया हूँ, अब इस कड़ा को दान देकर मुक्ति चाहता हूँ, पथिक उसके माया जाल में फँस गया, बेचारा जैसे ही निकट आया व्याघ्र ने उसे मार डाला।
धन
दो कदम पहले सूर्य अस्त– राजा ने एक गरीब को वरदान दिया कि जितनी दूर तुम दौड़ सको उतनी जमीन तुम्हारी होगी, लेकिन जहाँ से दौड़ शुरू करते हो, सूर्य अस्त के पहले लौट कर वहीं आना है, लौट के आया लेकिन दो कदम पहले ही जीवन का सूर्य अस्त हो गया।
धन
राजा नीड़ासन ने देवी से वरदान माँगा, कि मैं जिसको छू लूँ वह सोने का हो जाय, वह जिसे छूता था वह सोने का हो जाता था, यहाँ तक स्थिति हो गयी कि खाने की सामग्री भी सोने की हो गयी, तब वह घबराया कि क्या खाएँ, अन्त में उसे वरदान वापस देना पड़ा तब शान्ति हुई।
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लोभी भाई ने भाई की आँखें फोड़ी– दो सगे भाई थे, लेकिन गरीब थे, जङ्गल से लकड़ी लाते और बेच कर उदर पूर्ति करते थे, बड़ा भाई ईमानदार था, सरल था उसकी लकड़ी अच्छे दामों में जल्दी बिक जाती थी, लेकिन छोटे भाई को इससे बडा दुःख होता था, एक दिन उसने सोचा कि बड़े भाई को मार डाला जाय, तो फिर मेरी लकड़ी अच्छे दामों में बिकेगी। दूसरे दिन जङ्गल गये, भीषण गर्मी थी छोटे भाई ने कहा भैया पहले आपकी तूमड़ी का पानी खर्च कर लेते हैं, बाद में हम पिलाते रहेंगे। भैया तो भोला था, वह कुछ समझा नहीं और वैसा ही किया लकड़ी इकट्ठी करने के बाद भाई को प्यास लगी, पानी माँगा तो उसने कहा कि हम पहले आपकी एक आँख फोड़ेंगे तब पानी देंगे, बड़े भाई ने तो सोचा भी नहीं था कि ये ऐसा पाप भी कर सकता है, वह आँखें फोड़ कर चला गया, जिससे बड़े भाई को दिखना बन्द हो गया, अन्धा भाई जङ्गल में भटकते–भटकते मर गया।
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विप्र का श्रीफल– एक ब्राह्मण को श्रीफल खरीदना था, दुकानदार ने उसका पाँच रुपया बताया, उसने पूँछा इससे कम में नहीं दोगे? दुकानदार ने आगे की दूकान में भेजा, वहाँ पर भी और कम में माँगने लगा, उसने कहा आप श्रीफल के बगीचे में चले जाये, वहाँ निःशुल्क मिल जायेगा, वह श्रीफल से लटक गया, ऊँट वाले से कहा! भैया हम तुम्हें पचास रूपये देगें हमें उतार लो, ऊँट खड़ा किया, उसको पकड़ा इतने में ऊँट आगे बढ़ गया। इसी तरह घोड़ा वाला आया, तो दोनों ने कहा हम दोनों पचास–पचास रुपये देंगे, हम लोगों को उतार लो, और वह भी लटक गया, अब दोनों ने विप्र से कहा, तुम अच्छे से पकड़े रहना, हम दोनों पाँच–पाँच सौ रूपये देंगे, अब विप्र नोटों की खुशी में भूल गया, और हाथ छूट गये तीनों गिरे और, काल के गाल में समा गये।
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लोभ पाप का बाप बखाना– एक विप्र बनारस से पढ़कर आया, पत्नि ने प्रश्न किया कि 'पाप का बाप कौन है'? उसने कहा सब कुछ पढ़ा, लेकिन ये पढ़ा ही नहीं, पत्नि ने कहा फिर से जाओ और पढ़कर आओ, रास्ते में वेश्या से पूँछा, उसने कहा मैं इसका उत्तर जानती हूँ मेरे घर चलो, उसने कहा पहले में आपका आतिथ्य करना चाहती हूँ आप भोजन कर लें, विप्र बोला मैं आपके यहाँ भोजन नहीं कर सकता, वेश्या ने कहा मैं आपको सौ रुपए दूँगी आप भोजन सामग्री ले लें, विप्र तैयार हो गया, तब उसने कहा मैं भोजन बना देती हूँ दो सौ रुपए ले लेना, विप्र तैयार हो गया, अन्त में उसने कहा एक ग्रास मेरे हाथ से खा लो पाँच सौ रूपए ले लेना मेरे जीवन के सारे पाप धुल जायेंगे, विप्र ने सोचा इसने बनाया तो है ही अब इसके हाथ से एक ग्रास खाने में क्या जाता है, यहाँ कोई देख भी नहीं रहा है, पैसों के लोभ से विप्र उसके हाँथ से भोजन करने के लिए तैयार हुआ तो वेश्या ने एक चाँटा मारा और कहा यही लोभ, पाप का बाप है।
धन
मृत्यु शय्या पर पड़े पिता को देखकर बेटे सोचते हैं, कब इनके प्राण निकलें और हम सारी सम्पत्ति बटोर लें, और पिता सोचता है कि जब तक मैं जिन्दा हूँ तब तक कोई मेरी सम्पत्ति को छू नहीं सकता, दोनों तरफ लोभ है।
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धूर्त ने कञ्जूस को ठगा– धूर्त ने कञ्जूस सेठ से कहा कि हमारे यहाँ मेहमान आये हैं, बर्तन दे दो, सेठ ने बर्तन दे दिये, धूर्त बर्तन वापस करने आया तो दस के स्थान पर बीस बर्तन ले आया, सेठ ने पूँछा ये कहाँ से आये, उसने कहा ये सब बर्तन गर्भवान थे हमारे यहाँ जाकर इन ने बच्चे दे दिये, सेठ प्रसन्न हुआ और सभी बर्तन रख लिये कुछ समय बाद सोने–चाँदी के बर्तन लेने आया सेठ ने दे दिये, अब कुछ दिन बाद सिर मुड़ाकर आया और बोला सारे बर्तन मर गये, हमने उनका संस्कार किया एक हजार रूपये खर्च हुये। सेठ ने कहा बर्तन मरते हैं क्या? उसने कहा जब बर्तन बच्चे देते हैं तो मरते भी हैं। धूर्त ने सभी सोने–चाँदी के वर्तन भी रख लिए और पञ्चायत बैठाकर एक हजार रूपये भी ले गया।
धन
सोने का बैल चाहिये– एक व्यक्ति के पास समस्त जानवरों के सोने की जोड़ी थी, पर सोने का बैल केवल एक ही था, अतः ठण्ड की परवाह न करता हुआ नदी में लकड़ी पकड़ रहा था, ताकि लकड़ी बेंचकर सोने का बैल बनवा सके, रानी ने महल से देखा इतना गरीब भी हमारे राज्य में है, राजा ने उसे बुलाया और पूँछा क्या चाहते हो, उसने कहा एक बैल, राजा ने कहा जाओ हमारे बैलों में से जो बैल पसन्द हो वह ले लो, वह गया पर कोई भी बैल पसन्द नहीं आया, उसको सोने का बैल चाहिये था, ये है तीव्र लोभ।
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बालक का पवित्र हृदय– कौशाम्बी नगरी के राजा जयपाल के राज्य में समुद्रदत्त सेठ और समुद्रदत्ता सेठानी रहती थी, उनका सागरदत्त नाम का एक सुन्दर बालक था, पास में गोपायन दरिद्री पड़ोसी था, उसका सोमक नाम का एक पुत्र था, जो सागरदत्त के साथ हमेशा खेला करता था, एक दिन स्वर्णाभूषणों से युक्त सागरदत्त को देखकर गोपायन ने सागरदत्त को मारकर घर में गाड़ दिया, सेठ सेठानी पुत्र वियोग से बड़े दुःखी हुए, एक दिन सेठानी ने सोमक से पूँछा! बेटा तुम्हारा मित्र सागरदत्त कहाँ है, उसने कहा! हमारे घर में गड़ा है, सेठानी सुनकर मूर्च्छित हो गयी, जाकर देखा तो सागरदत्त का शव मिला, तब गोपायन को मृत्यु दण्ड मिला। मरकर नरक गया।
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एक लाख का नाम सुनते ही डॉक्टर को अटैक– एक नगर में धनी सेठ को बीमार देखकर डॉक्टर ने सोचा पैसा निकालने का मौका अच्छा है। डॉक्टर ने कहा सेठ जी यहाँ ठीक नहीं हो सकते, लड़के ने पचास हजार रूपये दिए, डॉक्टर ने कहा इतने में काम नहीं होगा तो उसने पचास हजार और दिये, एक लाख आते देख डॉक्टर को अटैक आ गया, डॉक्टर मर गया सेठ ठीक हो गया।
धन
भोपाल के चाचा भतीजे– सुन्दर का भतीजा पवन था, जिसकी दुकान अच्छी चलती थी, जिससे दुःखी होकर उसने किराये के गुण्डों से भतीजे को मरवा डाला, और स्वयं जेल में सड़–सड़ कर मर गया।
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कडार पिञ्ज– कडार पिञ्ज चोरी की हुई सोने की शलाकाएँ खरीदता था, एक दिन वह अपनी लड़की के यहाँ गया और लड़के से बोल गया कि शलाकाएँ ले लेना, लड़के ने चोरी की जानकर नहीं ली। पिता लड़की के यहाँ से वापस आया शलाकाएँ न देख कर अपने पैर काट लिये और मरकर अपने ही खजाने में सर्प बनकर रक्षा करने लगा, लड़के ने देखा तो उस सर्प को मार डाला, सर्प मरकर नरक में चला गया।
धन
लाख पति भी क्षण भर में खाक पति बन जाता है, महलों में रहने वाला भी सुरक्षा हीन हो जाता है।
धन
कमाई का पच्चीस प्रतिशत बचा कर रखना चाहिए, पच्चीस प्रतिशत व्यापार में लगाना चाहिए, पच्चीस प्रतिशत धर्म और भोगोपभोग में लगाना चाहिए, पच्चीस प्रतिशत परिवार के भरण पोषण में लगाना चाहिए।
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धन की तीन गति होती हैं दान, भोग और नाश।
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यदि लक्ष्मी को स्वयं उत्पन्न किया है तो वह पुत्री है, यदि पिता के द्वारा उत्पन्न की गई है तो बहिन है और यदि अन्य मनुष्यों की है तो परस्त्री है, ऐसा विचार कर बुद्धिमान मनुष्य उस लक्ष्मी का त्याग करने में तत्पर रहते हैं।
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लक्ष्मी का वाहन उल्लू जो दिन में अन्धा होता है, उसी प्रकार लक्ष्मीवान भी प्रायः अन्धे होते हैं।
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सम्पदा को वेश्या और कीर्ति को कुँवारी कहा है, क्योंकि सम्पदा किसी एक पति के पास नहीं रहती वह रोज बदलती है, कीर्ति उन्हें चाहती है, जो कीर्ति को नहीं चाहते और जो कीर्ति को चाहते हैं उसे कीर्ति नहीं चाहती है इसलिये वह आज तक कुँवारी है।
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लक्ष्मी की मूर्ति प्रायः खड़ी दिखाई देती है कहीं बैठी नहीं देखी होगी इससे सिद्ध है कि वह हरदम जाने को तैयार है।
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रुपयोंके लिए सभी कहते हैं कि ये हमारे हैं पर रुपये किसी से नहीं कहते कि तुम हमारे हो या हम तुम्हारे हैं।
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पेट की भूख से अधिक खतरनाक पैसे की भूख होती है, पेट की भूख व्यक्ति को मजबूर बनाती है, किन्तु पैसे की भूख मुनष्य को अतिक्रूर बनाती है।
धन
दूध और पानी को नींबू अलग कर देता है, आत्मीय सम्बन्धों को पैसा अलग कर देता है, अतः पैसे से सोच समझकर कर प्रीति करना चाहिए।
धन
ईमानदारी के धन से सज्जनों की भी सम्पत्ति नहीं बढ़ती है, जिस प्रकार स्वच्छ जल से समुद्र नहीं भरता है।
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अन्याय से उपार्जित धन दस वर्ष तक रहता और ग्यारहवें वर्ष में स्वयं का धन भी लेकर चला जाता हैं।
धन
धन शक्ति है, इस शक्ति के नशे में किसी के साथ अनर्थ हो जाना सम्भव है, इसका ध्यान रखना।
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सरस्वती और लक्ष्मी एक साथ नहीं रहती हैं।
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धनतेरस- आज के दिन भगवान् ने योग निरोध किया था, जिससे धन्य तेरस कहने लगे, आज यह धनार्जन तेरस हो गयी है।
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