Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
धन

अर्थार्थी जीवलोकोऽयं, श्मशानमपि सेवते। करोति च महानर्थान्, येन प्राप्नोति दुर्गतिं।।

धन के इच्छुक प्राणी श्मशान में भी सेवा करते हैं और अनेकों अनर्थों को करते हैं जिससे दुर्गति को प्राप्त होते हैं।

Beings hungry for wealth will serve even in a cremation ground and commit countless misdeeds, by which they attain a wretched destiny.

— आराध्य सूत्र · #60

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लक्ष्मी हिंडोले की तरह चंचल है। विषयों से उत्पन्न हुआ सुख अंततः दुःखप्रद है। देह विपत्ति का घर है। अत्यधिक धन मृत्यु का प्रचुर साधन है। संसार अत्यधिक शोकपूर्ण है। स्त्रियाँ अनर्थ की जड़ हैं। फिर भी लोग इस घोर संसार में ही रत रहते हैं। आत्मा में रत नहीं होते यह आश्चर्य है।
धन