Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Meditation

ध्यान

163 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

भगवान् से मिलने नहीं भगवान् बनने साधना की जाती है।
ध्यान
एकान्त में रहकर निवास कर लेना किन्तु ऐसी भीड़ में मत जाना जहाँ निज भगवान् से विछोह हो जाये मंदिर के भगवान् तो पुनः मिल सकते हैं पर परिणामों के भगवान् पुनः नहीं मिलते हैं।
ध्यान
निष्काम कर्मयोगी तभी सिद्ध होता है जब हमारे बाह्य कर्म के साथ अन्दर से चित्तशुद्धि रूपी कर्म का संयोग होता है।
ध्यान
भली-भाँति विचार करने से और सत्य के अभ्यास से वासनाओं का नाश हो जाता है, वासनाओं के विलय से चित्त उसी प्रकार विलय हो जाता है जैसे तेल समाप्त हो जाने पर दीपक बुझ जाता है।
ध्यान
सामने आया हुआ मनुष्य अनुरक्त हो जाए, परोक्ष में गुणों की प्रशंसा करने लगे और कोई भी प्राणी भयभीत न हो यह योग की सिद्धि का सूचक लक्षण है।
ध्यान
ज्ञान से वैराग्य की रक्षा करो तथा ध्यान से आत्मा की शुद्धि करो।
ध्यान
श्रीफल में तीन आँखें होती हैं, तीसरी आँख प्राप्त करने श्रीफल चढ़ाते, दोनों आँखें बंद करते तब तीसरी आँख (केवलज्ञान) प्राप्त होती है।
ध्यान
प्रार्थना और ध्यान इंसान के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि प्रार्थना में भगवान् भक्त की बात सुनता है और ध्यान में भक्त भगवान् की बात सुनता है। प्रार्थना प्राणों से होती है और ध्यान भावों से होता है। प्रार्थना प्रभु के साकार रूप की होती है और ध्यान प्रभु के निराकार रूप का होता है। प्रार्थना में भक्त भगवान् से जुड़ जाता है और ध्यान से भक्त भगवान् बन जाता है। गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिए प्रार्थना और साधु जीवन जीने वालों के लिए ध्यान परमात्मा को पाने का सरल उपाय है।
ध्यान
यात्रा पर निकला हूँ लोग बार-बार पूछते हैं, कितना चलोगे, कहाँ तक जाना है? मैं मुस्कुराकर आगे बढ़ जाता हूँ किससे कहूँ मुझे इस बार जाना नहीं, अपितु अपने तक आना है।
ध्यान
भीड़ में समाधि नहीं होती, समाधि में भीड़ हो सकती है।
ध्यान
मौन लेकर पेपर पढ़ना, टी.व्ही. देखना या कुछ अन्य सांसारिक कार्य करना सामायिक नहीं है।
ध्यान
प्राणायाम से चित्त शुद्ध हो जाता है और विशुद्ध चित्त में अन्तः प्रकाश स्वरूप शुद्ध आत्म तत्त्व का साक्षात्कार होने लगता है।
ध्यान
ध्यान के द्वारा जो परिणामों की विशुद्धि होती है, वही शास्त्र स्वाध्याय से होती है।
ध्यान
ज्ञान से ज्यादा ताकत ध्यान में लगती है, एक हजार उपवास और एक मुहूर्त का ध्यान बराबर है। प्रीति बहुत सारे लोग दे सकते हैं प्रसन्नता नहीं।
ध्यान
ज्ञान से ध्यान की सिद्धि होती है, ध्यान से कर्मों की निर्जरा और निर्जरा से मोक्ष होता है। अतः ज्ञानाभ्यास करते रहना चाहिए।
ध्यान
जो शक्ति ध्यान में है वह शक्ति संसार में कहीं नहीं है, ध्यानी को तीर्थों में मंदिरों में जाने की आवश्यकता नहीं है।
ध्यान
ध्यान से जो भी च्युत हुए वे शब्दों के कारण हुए और जो भी ध्यान में गये वह सब शान्ति से गये। अतः कोलाहल रहित स्थान में सामायिक करें।
ध्यान
साधु शरीर की साधना को गौण कर भावों की साधना को प्रधान करता है।
ध्यान
श्वासें उन्हीं की लम्बी चलती हैं, जिनके भाव विकृत होते हैं, जिनके भाव शान्त होते हैं उनकी श्वासें स्वयमेव ही शान्त हो जाती हैं और यही ध्यान है।
ध्यान
ज्ञान से ध्यान की सिद्धि होती है, ध्यान से अष्टकर्मों का नाश होता है, अतः ध्यान की सिद्धि करने वाले ज्ञान का अभ्यास अवश्य करना चाहिए।
ध्यान
जिसे देखने से ऐसा प्रतीत हो मानो मूर्तिमान प्रशम गुण है, यही कायशुद्धि है, वीतराग संयम के विना मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती और वीतराग संयम की साधना उत्कृष्ट तप के द्वारा ही सम्भव है, वह उत्कृष्ट तप स्वाध्याय से सम्भव है, स्वाध्याय से ध्यान का अभ्यास करना चाहिए और ध्यान से स्वाध्याय को चरितार्थ करना चाहिए।
ध्यान
संसारी प्राणी गुरु से पूँछता है सुख कहाँ है? गुरु कहते हैं हमने अभी मगर को बताया है, उससे पूँछ लो, वह मगर से पूँछने गया, मगर ने कहा पहले हमें पानी पिला दो प्यास लग रही है, वह मनुष्य हँसता है कि पानी में रहकर भी प्यासा है, मगर भी कहता है, कि तुम भी हँसी के पात्र हो, सुख आत्मा का स्वभाव है तुम सुख को बाहर ढूँढ़ते हो। ज्यों तिली में तेल है, ज्यों चकमक में आग। तेरा प्रभु तुममें बसे, जाग-जाग रे जाग॥
ध्यान
अनादि अशुभ परिणामों का नाश करने के लिये रात-दिन समता का अभ्यास आवश्यक है।
ध्यान
शारीरिक व्यायाम जिस प्रकार शरीर की शक्ति को बढ़ाता है, उसी प्रकार एकाग्रता मन की शक्ति को बढ़ाती है, कठिन विषयों पर भी अपना ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास करना चाहिए ताकि मन पर सच्चा नियन्त्रण पाया जा सके, एकाग्रता का अर्थ वर्तमान क्षण में जीना है, अर्थात् प्रत्येक कार्य मन लगा कर करना है।
ध्यान
आध्यात्मिक उन्नति के लिए मौन, एकान्त और आत्मनिरीक्षण से शारीरिक, मानसिक शक्ति का सञ्चय होता है।
ध्यान
क्या आप अपने को अकेला और ऊबा हुआ महसूस करते हैं? आध्यात्मिक शब्दावली में अकेला व्यक्ति वह है जिसे आत्मज्ञान नहीं है और जो स्वयं सत्य का सामना नहीं कर सकता है, केवल ऐसा ही व्यक्ति दूसरी वस्तुओं और व्यक्तियों के पीछे भागता है, ताकि वह अपने मन को स्वस्थ रख सके। जब उसके पास अपने मन को व्यस्त रखने के लिये कोई व्यक्ति या वस्तु नहीं होती है, तो वह ऊबने लगता है, 'वह यह अनुभव नहीं करता कि अपने ध्यान को अपने अन्दर केन्द्रित करके विना किसी वस्तु के भी खुशी पायी जा सकती है।' ऐसा व्यक्ति जो आत्मा में उपस्थित है अपने उस आन्तरिक आनन्द और शान्ति को पाने में सफल रहता है। यदि आप अकेले नहीं रह सकते तो इसका अर्थ है कि आपके मन में शान्ति नहीं है, जिस शान्ति को आप पाने के लिए बेचैन हैं, वह तभी मिल सकती है जब आप अपने साथ मित्रता कर लें, और देर सबेर आपको ऐसा करना ही पड़ेगा। अपने आप से भागना शान्ति की राह नहीं, इससे केवल शान्ति पाने में देर लगती है।
ध्यान
संसार के सब काम ध्यान से करते हैं, जैसे नोट गिनना, गाड़ी चलाना, भोजन करना, टी.वी. देखना आदि सब ध्यान से करते हैं पर माला, पूजा, ध्यान, प्रवचन विना ध्यान के करते हैं।
ध्यान
मोक्ष गिफ्ट या लिफ्ट में नही खुद में सिफ्ट होने पर मिलता है।
ध्यान
जैसे नेत्रों में जरा सा कण जाने से वस्तु ठीक से नहीं दिखती है, उसी तरह मन में थोड़ी सी भी वासना रहने से आत्म दर्शन नहीं होता है।
ध्यान
चैसठ प्रहरी पीपल- बाजार में नहीं मिलता, पीपल को चैसठ पहर तक घोटते रहो, उसके एक-एक कण को कई बार घोटने के बाद चैसठ प्रहरी बनता है, उसका सेवन करने से हड्डी का बुखार निकल जाता है, इसी तरह एक-एक भावना को बार-बार घोटने पर संसार का रोग समाप्त हो जाता है।
ध्यान
विचारों की भीड़ से मुक्त होना ही एकान्त हैं।
ध्यान
जागृति का एक क्षण करोड़ों मूर्छा के क्षणों से श्रेष्ठ है।
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कलाँ का सूत्र हैआँख खोलकर देखना और संयम का सूत्र हैआँख बन्द कर देखना।
ध्यान
मन का विशुद्ध होना ही तीर्थ है, वचन, संयम और इन्द्रिय निग्रह करना भी शरीर में उत्पन्न तीर्थ है, जिस पुरुष के ये तीर्थ हैं वे उसकी स्वर्ग गति को निर्दिष्ट करते हैं।
ध्यान
न मुझे भक्तों की भीड़ से, न शिष्यों के समूह से, न पुस्तकादिक से, न शरीरादि से और न किसी कार्य से प्रयोजन है, विशुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा में ही मेरी सदा लीनता रहे।
ध्यान
जिस उपाय के द्वारा चित्स्वरूप आत्मा से वेग पूर्वक शीघ्र ही सङ्क्लेश दूर हो जाता है, और चित्स्वरूप में विशुद्धि आती है, मोक्षाभिलाषी जीव को वही उपाय करना चाहिए।
ध्यान
तीन शुद्धि- स्नान से देह की, दान से धन की और ध्यान से मन की शुद्धि होती है।
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वर्षों का बना महल क्षण में धराशायी हो जाता है उसी प्रकार अनादि का कर्म महल अन्तर्मुहूर्त के ध्यान में धराशायी हो सकता है।
ध्यान
ओम् के ध्यान के लिये श्रेष्ठ समय रात्रि दो से प्रातः आठ बजे तक है।
ध्यान
परमात्मा की परम शान्त वीतराग मूर्ति की पूजन का महत्त्व यह है कि संसारी जीव संसार के माया और गृहस्थी के प्रपञ्च में ज्यादा फँसा रहता है तथा मन चञ्चल होने से और आत्मा बलवान न होने से केवल शास्त्रों से परमात्मा का वर्णन सुनकर एकाएक विना किसी नक्से के परमात्म स्वरूप का नक्सा या चित्र अपने हृदय में खींचने में समर्थ नहीं होते हैं, वे भी उस मूर्ति के द्वारा परमात्म स्वरूप का कुछ-कुछ ध्यान और चिन्तन करने में समर्थ हो जाते हैं और उसी से आगामी दुखों और पापों की निवृत्ति पूर्वक अपने आत्मस्वरूप की प्राप्ति में अग्रसर होते हैं, कोई चित्रकार चित्र खींचनें का अभ्यास करता है तब वह सुगम और सादे चित्रों को देखकर अपना चित्र खींचने का अभ्यास बढ़ाता है, एकदम कठिन गहन और गम्भीर चित्र को वह नहीं खींच सकता, जब उसका अभ्यास बढ़ जाता है तब कठिन रङ्गीन चित्रों को भी बड़ी सुन्दरता से बनाने लगता है और छोटे चित्रों को बड़ा और बड़े चित्रों को छोटा करने लगता है, जब चित्र विद्या में निष्णात हो जाता है, तब चलती-फिरती वस्तुओं का भी चित्र बड़ी सफाई के साथ बातों-बातों में ही खींचकर रख देता है और चित्र को न देखकर केवल व्यवस्था और हाल मालूम करके उसका साक्षात् जीता-जागता चित्र भी अङ्कित कर देता है, उसी प्रकार यह संसारी जीव एकाएक परमात्म स्वरूप का ध्यान नहीं कर सकता अर्थात् परमात्मा का फोटो अपने अन्दर नहीं खींच सकता वह परमात्मा की परम वीतराग मूर्ति पर से ही अपना ध्यान बढ़ाता है। निरन्तर दर्शनादि के अभ्यास से जब वीतराग छवि से परिचित हो जाता है तब शनै: शनै: एकान्त में बैठकर उस मूर्ति का फोटो अपने हृदय में खींचता है और फिर कुछ देर तक रहने के लिए समर्थ होता है। ऐसा करने पर उसका मनोबल और आत्मबल बढ़ने लगता है फिर वह इस योग्य हो जाता है, कि उस मूर्ति के मूर्तिमान श्री अरहन्त देव का समवसरणादि विभूति सहित साक्षात् चित्र अपने हृदय में खींचने लगता है, इस प्रकार के ध्यान का नाम रूपस्थ ध्यान है और यह ध्यान प्राय: मुनि अवस्था में होता है।
ध्यान
भगवान् पैर पर पैर इसलिए रखे हैं क्योंकि चलना बाकी नहीं है, हाथ पर हाथ रखे इसलिए बैठे हैं क्योंकि कुछ करना बाकी नहीं है, नासाग्र दृष्टि किये हैं क्योंकि कुछ देखना बाकी नहीं है, ज्ञान चक्षु खुल गया है इसलिए चर्म चक्षु बन्द हो गये हैं मात्र आत्मदर्शन कर रहे हैं।
ध्यान
उदासोऽहम्, दासोऽहम्, सोऽहम्, अहम्। प्राणी पहले संसार शरीर भोगों से उदास होता है फिर पञ्च परमेष्ठी का दास होता है फिर अपने आप को भगवान के समान चिन्तन करता है तब वह मात्र ज्ञायक हो जाता है।
ध्यान
धर्मध्यान के बाह्य लक्षण- शास्त्र के अर्थ की खोज करना, शीलव्रत का पालन करना, गुणों के समूह में अनुराग रखना, अङ्गड़ाई, जमुहाई, छींक, डकार और श्वासोच्छ्वास में मन्दता होना शरीर को निश्चल रखना, आत्मा को व्रतों से युक्त करना आदि धर्मध्यान के बाह्य लक्षण हैं।
ध्यान
जाप/सामायिक ईशान दिशा में बैठकर करने से विशेष लाभ होता है, दक्षिण में जाप-स्वाध्याय वर्जित है एवं अभिषेक पूजा उत्तर मुख होकर करना चाहिए।
ध्यान
‘जैसा सोचो वैसा पाओ सोऽहम्, शुद्धोऽहम्, बुद्धोऽहम्’ मैं भगवान् जैसा शुद्ध, बुद्ध, ज्ञानी हूँ ऐसा बार-बार ध्यान करने से आत्मा में स्थिरता होती है, आत्म सुझाव, आत्म सम्बोधन, हिंसा छोड़ता हूँ अहिंसा ग्रहण करता हूँ आदि आत्मा को सम्बोधित करके आत्मा को अच्छा बनने की सलाह दें, अवगुण छोड़कर गुणों को ग्रहण करें इससे आत्मा में स्थिरता प्राप्त होती है।
ध्यान
आनन्दस्वरूप शुद्धात्मा का चिन्तन होने पर रस विरस हो जाते हैं, गोष्ठी-कथा आदि का कौतूहल विघटित हो जाता है, पञ्चेन्द्रियों के विषयों की प्रीति घट जाती है, शरीर सम्बन्धी प्रीति भी विश्राम ले लेती है निरन्तर चलने वाली वाणी भी मौन ले लेती है और मन भी दोषों के साथ मृत्यु को प्राप्त करने की इच्छा करता है अर्थात् मन में उठने वाले विविध विकल्प शान्त हो जाते हैं।
ध्यान
अपने दोषों को विलीन करना है तो परमात्मा में लीन हो जाओ।
ध्यान
मत रूप निहारो दर्पण में दर्पण गंदला हो जायेगा। निज रूप निहारो अन्तर में, अन्तर उजला हो जायेगा।।
ध्यान
शुद्ध मौन धारण करने से मन की सिद्धि पूर्वक शुक्लध्यान की प्राप्ति होती है, वचन ऋद्धि के साथ तीनों लोकों का उपकार करने वाली दिव्यध्वनी खिरती है।
ध्यान
मौन और एकान्त ये दो आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं, मौन से आत्म साधना में बल मिलता है।
ध्यान
इस दुःखमा काल में भी रत्नत्रय से शुद्ध होकर आत्मा का ध्यान करके लौकान्तिक देव एवं इन्द्र बनकर वहाँ से च्युत होकर मोक्ष प्राप्त करते हैं।
ध्यान
गम्भीरता के विना तपश्चरण का अनन्द नहीं आता है।
ध्यान
दया, इन्द्रिय दमन, त्याग, ध्यान की परम्परा के मार्ग में सरलता के साथ प्रयत्न पूर्वक गमन करो, यह मार्ग अवश्य ही विकल्पों से रहित वचनातीत सुखों वाले स्थान में ले जाता है।
ध्यान
प्रतिदिन बोधि दुर्लभ भावना का चिन्तन करना चाहिए, 'दुर्लभ है निगोद से थावर' इत्यादि।
ध्यान
विविक्तशय्यासन- शून्यगृह, एकान्त स्थान, विकलत्रय, स्त्री-असंयमी पुरूषों के आवागमन से रहित वन खण्ड में ध्यान, अध्ययन करना, पाप से भयभीत श्रावक भी गृह धन्धो से विरक्त होकर जिनालय आदि में साधर्मी के साथ तत्त्व चर्चा, जाप, चिन्तन आदि में समय व्यतीत करता है।
ध्यान
ध्यान के भेद- दुर्ध्यान, स्वार्थ ध्यान, परार्थ ध्यान, विशुद्ध ध्यान। !!प्रवचन कार इनकी व्याख्या करें!!
ध्यान
आर्त और रौद्र ध्यान नरक और तिर्यञ्च, कुदेव और कुमनुष्यों में उत्पन्न कराते हैं, धर्म और शुक्लध्यान सुदेव, सुमनुष्य और मुक्ति प्रदान कराते हैं।
ध्यान
आत्मध्यान से बढ़कर सुख नहीं है, आत्मध्यान से बढ़कर तप नहीं है और आत्मध्यान से बढ़कर कहीं कोई मोक्ष का मार्ग नहीं है।
ध्यान
पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत के भेद से धर्म्यध्यान के चार भेद हैं, 1.शरीर में स्थित स्वात्मा का चिन्तन करना पिण्डस्थध्यान है, 2.मन्त्र तथा आगम के वाक्यों का चिन्तन करना पदस्थध्यान है, 3.समवसरण में स्थित चैतन्यरूप अरहन्त परमेष्ठी का ध्यान करना रूपस्थध्यान है, 4.द्रव्यकर्म-भावकर्म-नोकर्म से रहित सिद्ध परमेष्ठी का ध्यान करना रूपातीत ध्यान है।
ध्यान
64 वर्णों में ईकाई 4, दहाई 6 को गुणा करने पर 24 तीर्थंङ्कर हो जाते हैं, इनका चिन्तन करना रूपस्थ ध्यान कहलाता है।
ध्यान
ध्यान में शास्त्रों के विषय का, तीर्थों की प्रतिमाओं का, मन्त्र के माहात्म्य का, आचार्यों के नाम व आचरण का चिन्तन करना चाहिए।
ध्यान
वैराग्य, तत्त्वज्ञान, निर्ग्रन्थ अवस्था, एकाग्रता और परीषह विजय के होने पर ध्यान होता है।
ध्यान
परिग्रह का त्याग, कषायों का निग्रह, व्रतों का धारण, मन और इन्द्रियों की विजय, ध्यान की उत्पत्ति में निमित्त होते हैं।
ध्यान
उत्कृष्ट ध्यान की सिद्धि के लिए इष्ट-अनिष्ट पदार्थों में राग-द्वेष मोह मत करो।
ध्यान
चिन्तन से चिन्ता मिटे, मिटे ध्यान से पाप। चिन्तन चिन्ता जब मिटे, प्रभु बनेंगे आप॥
ध्यान
काना पोंडा पड़ा हाथ यह चूसे तो रोवे। फले अनन्त जु धर्मध्यान की भूमि विषै बोवे॥
ध्यान
कोई तपस्वी सन्तान, धन, स्वर्गादिक की तृष्णा से तपस्या करते हैं किन्तु हे शीतलनाथ भगवन्! आपने जन्म, जरा और मरण के नाश के लिए मन, वचन, काय को स्थिर करके ध्यान किया।
ध्यान
भूकम्प आया तो लोग अपने घर को भागे, मुनि आँखें बन्द करके बैठ गए, श्रावक ने पूँछा! आप क्यों नहीं भागे? मुनि ने कहा हम भी अपने आत्मा रूपी घर की ओर भागे। अर्थात् तुम बाहर की ओर भागे और हम भीतर की ओर भागे।
ध्यान
रामचन्द्रजी विचार करतें हैं, कि मैं राम नहीं हूँ और न हि भोगों की मेरी इच्छा है, मैं तो जिनेंद्र भगवान् की तरह आत्मा में शान्ति से स्थिर रहना चाहता हूँ।
ध्यान
मोक्ष के इच्छुक को सदा बारह भावनाओं का चिन्तन करना चाहिए, इससे मोक्षमार्ग में आने वाले विघ्न दूर होते हैं, मन को शान्ति मिलती है और सांसारिकता से आसक्ति हटती है, बारह भावना आसक्ति नष्ट करने का अमोघास्त्र है।
ध्यान
हे श्रमण ! तुम इसी (ज्ञायक स्वरूप) में नित्य रमण करो, इसी में नित्य सन्तुष्ट रहो, इसी से तृप्ति होगी, इसी विधि से तुम्हें उत्तम सुख की प्राप्ति होगी।
ध्यान
वर्तमान में भरत क्षेत्र में आर्त-रौद्रध्यानी, नष्ट, दुष्ट, दु:खी, पापी और अशुभ लेश्या वाले जीव अधिक है, पर धर्मध्यान आज भी हैं।
ध्यान
'जगत्कायस्वभावौ वा संवेग वैराग्यार्थम्'-इन दो में बारह भावनाएँ आ जाती हैं या पूरा भावना अधिकार आ जाता है।
ध्यान
टी.वी. नहीं है तो 'मिल जाए' इस निमित्त आर्तध्यान होता है और है तो देखने से विषय कषाय की पुष्टि करता है इसलिए रौद्रध्यान होता है।
ध्यान
सुख पूर्वक प्राप्त किया गया ज्ञान, दुःख आने पर नष्ट हो जाता है, इसलिए मुनि दुःख पूर्वक आत्मा की भावना करें।
ध्यान