एदम्हि रदो णिच्चं, सन्तुट्ठो होदि णिच्चमेदम्हि। एदेण होदि तित्तो, होहदि तुह उत्तमं सोक्खं।।
हे श्रमण ! तुम इसी (ज्ञायक स्वरूप) में नित्य रमण करो, इसी में नित्य सन्तुष्ट रहो, इसी से तृप्ति होगी, इसी विधि से तुम्हें उत्तम सुख की प्राप्ति होगी।
O ascetic! Ever delight in this (the knowing Self), ever remain content in this; by this you will find satisfaction, and by this method you will attain the highest bliss.
— आराध्य सूत्र · #22
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