Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Meditation

ध्यान

163 सूत्र · पृष्ठ 3 / 3

वैराग्य, तत्त्वज्ञान, निर्ग्रंथ अवस्था, समता और परीषह जय ये पाँच ध्यान के साधन हैं।
ध्यान
ध्यान करने वाले का लक्षण- जिनेन्द्र आज्ञा का श्रद्धानी हो, साधु के गुणों का प्रशंसक हो, दान, श्रुत, शील, तप, संयमी, प्रसन्नचित्त, प्रेमी, शुभोपयोगी, शास्त्राभ्यासी, स्थिरचित्त, वैरागी, निरोगी, निर्विषयी, दयालु, शुभगन्ध, अल्प मल-मूत्र वाला होना चाहिए।
ध्यान
ध्यानमेवप्राणाः मुनीश्वराणां- मुनीश्वरों के प्राण ध्यान ही हैं, ध्यान का प्रयोजन परम वैराग्य भाव है।
ध्यान
जो रत्नत्रय को प्राप्त किये विना साक्षात् ध्यान करने की इच्छा करता है वह मूर्ख आकाश के फूलों से वन्ध्यापुत्र का सेहरा बनाना चाहता है।
ध्यान
ऊपरी गुणस्थानों में अर्थात् मुनियों के आत्मध्यान से ही दोषों का परिमार्जन हो जाता है।
ध्यान
हवाई जहाज उड़ने लगता है तो पहिये बन्द हो जाते हैं, उतरने लगता है तो खुल जाते हैं, उसी प्रकार मुनि ध्यान में बैठते हैं तो समिति बन्द होकर, गुप्ति में आ जाते हैं, बाहर आते हैं तो समिति प्रारम्भ हो जाती है।
ध्यान
आत्माधीनता, विषयविरक्ति, तत्त्व तल्लीनता, गुप्ति, स्वहित में लीनता, पूर्ण आत्मानन्द, अभीक्ष्णज्ञानोपयोग, समता, आजीवन नियम, तप व ध्यान करना 'केवलज्ञान प्राप्ति के कारण' हैं।
ध्यान
वृषभसेन महाराज आठ वर्ष की उम्र में मुनि बन गये, किसी बैरी ने शिला को ऊष्ण कर दिया, महाराज ने नियम लिया था कि इसी शिला पर बैठेंगे, आहार के बाद आये शिला पर पैर रखते ही जलने लगे, ध्यान में लीन हो गये और केवलज्ञान प्राप्त हो गया था।
ध्यान
छाता को देखकर भूले हुये अपने छाते की याद आ जाती है उसी प्रकार सिद्धों के स्वरूप से निज स्वरूप का स्मरण होता है।
ध्यान
स्मरण गुरु- जैसे कछवी स्मरण करके अण्डे पकाती है वैसे ही तीर्थंङ्कर सिद्धों का स्मरण करके दीक्षित होते हैं।
ध्यान
तब लों तुम ध्यान हिये बरतों, तब लों श्रुत चिन्तन चित्त रतों, तब लों व्रत चारित चाहतु हों, तब लों शुभ भाव सु गाहत हों, तब लों सत्सङ्गति नित्य रहों, तब लों मम सञ्जम चित्त गहों। जब लों नहिं नाश करों अरि को, शिव नारि वरों समता धरि को।।
ध्यान
हे भगवन्! आपने अपने दोषों को ध्यान के तेज से भस्म कर दिया था।
ध्यान
आचार्यश्री का प्रथम दीक्षा दिवस मनाने के लिए आचार्य ज्ञानसागरजी से अनुमति ली, उन्होंने कहा विद्या से पूँछ लो, लोगों ने उनसे पूँछा कल आपका दीक्षा दिवस मनायेंगे, आशीर्वाद दे दो, आचार्यश्री ने कहा! देख लो, दूसरे दिन तैयारी हो गयी, आचार्य श्री ध्यान में बैठ गए उठे ही नहीं, लोगों ने पूँछा महाराज आपने दीक्षा दिवस नहीं मनाया, आचार्य श्री ने कहा हमने तो ध्यान में बैठकर अच्छे से मनाया।
ध्यान