Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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1104 सूत्र · पृष्ठ 15 / 15

डाकू खड़गसिंह ने बाबाभारती का घोड़ा अपाहिज का भेष धारण कर मदद के बहाने छुड़ा लिया, बाबाभारती ने डाकू खड़गसिंह से कहा कि तूने अपाहिज का वेश बनाकर घोड़ा लिया है, ये छल है ऐसा किसी से मत कहना नहीं तो कोई भी गरीब अनाथ अपाहिज लोगों पर विश्वास नहीं करेगा। यह बात सुनकर रात भर डाकू को नींद नहीं आई, और सुबह आकर उसने घोड़ा वापिस कर दिया।
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मगध देश के राजगृह नगर में राजा सङ्ग्रामशूर राज्य करते थे, उनकी रानी का नाम कनकमाला था, उसी नगर में सेठ वृषभदास रहता था, जो महान सम्यग्दृष्टि था, पञ्चगुणों से सहित था, परम धार्मिक था और सम्पूर्ण लक्षणों से सहित था, जैसा कि कहा है- 'पात्रे त्यागी गुणे रागी, भोगे परिजनैः सह। शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा, पुरुषः पञ्च लक्षणः।।'
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1.हाथी की शोभा मदजल से है, 2.पानी की शोभा कमलों से, 3.रात्रि की शोभा पूर्ण चन्द्रमा से, 4.वाणी की शोभा व्याकरण से, 5.नदी की शोभा हँस युगल से, 6.सभा की शोभा विद्वानों से, 7.स्त्री की शोभा ब्रह्मचर्य से, 8.घोड़े की शोभा वेग से, 9.मन्दिर की शोभा नित्य होने वाले उत्सवों से, 10.कुल की शोभा सुपुत्र से, 11.पृथ्वी की शोभा राजा से और 12.तीनों लोकों की शोभा धर्मात्माओं से होती है।
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1.मित्रद्रोही, 2.कृतघ्नी, 3.स्त्री की हत्या करने वाला और 4.चुगलखोर–'निन्दा' करने वाला इन चारों का प्रायश्चित्त हमने नहीं सुना है।
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गुरू द्रोही, धर्म द्रोही, मित्र द्रोही, कृतघ्नी, विश्वासघाती ये सदा मलिन रहते हैं।
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यदि सम्मान घटा कर आय बढ़ती है तो उस धन से निर्धनता ही श्रेयस्कर है।
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लोभ पाप का बाप है, क्रोध क्रूर यमराज। माया विष की वेलरी, मान विषम गिरिराज।।
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ईमानदारी की मिसाल– एक व्यक्ति घर बेंचकर अन्य स्थान पर रहने के लिए चला गया, जिसने घर खरीदा था उसे उसी घर में धन मिला, लौटाने आया तो उस व्यक्ति ने कहा अब हमने घर बेंच दिया, हमारे भाग्य में होता, तो हम इतने बरस से यहाँ रह रहे थे, पहले क्यों नहीं मिला, राजा के पास न्याय गया, उसी समय सिकन्दर आया था, वह देखकर सोचने लगा अरे भारत में इतने ईमानदार लोग रहते हैं?
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सौ लोगों में एक पहलवान होता है, हजार लोगों में एक पण्डित होता है, दस हजार में एक वक्ता होता है और इनमें दाता हो भी सकता है और नहीं भी।
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जिससे यह आत्मा क्षणभर में अनन्त सुख से सहित हो जाती है, उस पवित्र चारित्र को बार–बार नमस्कार हो, चारित्र से बढ़कर उत्तम सुख को उत्पन्न करने वाला दूसरा नहीं है, ''निर्दोष क्रिया चारित्र का मूल है'', मैं निरन्तर अपना चित्त चारित्र में लगाता हूँ, हे चारित्र! तुम पूर्णता को प्राप्त होओ।
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जो जीव हीन संहनन के होने पर भी चारित्र का पालन करता है उसे उत्कृष्ट संहनन की अपेक्षा हजार गुणा ज्यादा फल मिलता है।
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करने योग्य कार्य करना ही चाहिये भले ही प्राण कण्ठगत हो जाएँ, और नहीं करने योग्य कार्य को नहीं करना चाहिये भले ही प्राण कण्ठगत हो जाएं।
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चरणों की पूजा होती है, मस्तक की नहीं, क्योंकि आचरण प्रधान है।
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सत्पुरूष प्राण जाने पर भी अपनी प्रतिज्ञा से विचलित नहीं होते हैं।
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साधक साधना में जितने कठोर, भावना में उतने ही कोमल होते हैं।
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चरित्र रूपी औषधि से लोभ रूप सर्प का जहर दूर हो जाता है।
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सम्यक् चारित्र का धारक मनुष्य धनहीन होकर भी मोक्ष का स्वामी हो जाता है और सम्यक् चारित्र से रहित चक्रवर्ती भी दुःखों की सन्तति को प्राप्त होता है।
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मनुष्यों का गृहस्थ रहना अच्छा है परन्तु इन्द्रिय, आहारदोष और रागद्वेषादिक के द्वारा कलङ्कित मुनि पद अच्छा नहीं है।
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न्याय पूर्वक आजीविका हो, नव देवता की पूजा करने वाला हो, प्रशस्त वचन बोलने वाला हो, धर्म, अर्थ, काम पुरुषार्थ का एक-दूसरे की क्षति करने वाला न हो, गृहस्थ धर्म के योग्य स्त्री हो, सत्सङ्गति वाला स्थान हो, अयोग्य कार्य के करने में लज्जा वाला हो, योग्य आहार-विहार करने वाला हो, गुणवानों की सङ्गति करने वाला हो, बुद्धिमान हो, इन्द्रिय जेता हो, धर्म कथा सुनने वाला हो, कृतज्ञ हो, दयालु हो, पाप भीरु हो वह श्रावक कहलाता है।
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विपत्ति में धैर्य, अभ्युदय में क्षमाभाव, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पौरुष, यश में अभिरुचि, स्वाध्याय का व्यसन इतने गुण महात्माओं में स्वभाव से होते हैं।
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विदेश में गाँधीजी को सूट पहनने को, मांस सेवन को, शराब पीने को लोगों ने बहुत आग्रह किया, लेकिन गाँधीजी ने अपने नियम को नही तोड़ा।
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पिता की अन्तिम सीख- लोगों ने कहा पण्डितजी आपका बेटा बिगड़ रहा है, पण्डितजी ने कोशिश की लेकिन सुधार नहीं हुआ अन्त में पिताजी ने कहा बेटा अब हम जा रहे हैं, आप यदि व्यसन नहीं छोड़ते तो विपरीत क्रम से सेवन करें, वेश्या सेवन प्रातः करने जाय, दारू काउन्टर के पीछे से खरीदें, जुआ जब सज्जन कहे तब खेलें, अन्त में अनुभव आने पर बेटा सुधर गया।
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शान्तिपाठ से शान्ति नहीं, अशान्ति के कारणों को दूर करने पर शान्ति होती है, बाह्य भेष से पर को ठगना स्वयं को दुःख का कारण है।
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चोरी करे निहाई की, सुई का देवे दान। महलों पर चढ़ देखते, कितनी दूर विमान॥
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सुख अभिलाषी मनुष्य पवित्राचरण से पुण्य सम्पादन करें।
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न्यायवान की पशु भी सहायता करता है, कुमार्ग पर चलने वाले को सगा भाई भी छोड़ देता है। रावण के भाई विभीषण की तरह।
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अन्याय का धन एवं इन्द्रिय विषय ये सुमार्ग के बाधक तत्त्व हैं।
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व्यभिचारी को घृणा, पाप, भ्रम, और कलङ्क इन चारों से छुटकारा नहीं मिलता है।
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प्रदर्शन की भावना विकार के अस्तित्त्व को सूचित करती है।
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सुखद विवाह का रहस्य सही व्यक्ति पाने में नहीं, बल्कि खुद सही बन जाने में है।
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सीता हरण के बाद रामचन्द्रजी लक्ष्मण से पूँछते हैं, क्या ये जमीन में पड़े हुए बाजूबन्द, कुण्डल आदि आभूषण सीता के हैं ? लक्ष्मण जी कहते है मैंने केवल नित्य चरणों का वन्दन किया है, इसलिए बिछिया मात्र पहचानता हूँ अन्य आभूषण नहीं, पहले के लोग कितनी मर्यादा पालते थे।
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चरित्रहीन व्यक्ति का विपुल शास्त्र ज्ञान प्राप्त करना ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, जैसे नेत्रहीन व्यक्ति के सामने लाखों दीपक जलाना बेकार है।
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वर्णीजी चिरोंजाबाई के साथ गोमटेश यात्रा को गये, वहाँ वर्णीजी स्नान करने नदी पर गये, नहाते समय पैसों का पर्स अलग रख दिया, वर्णीजी ने नहाया, कमरे में आ गये, भोजन करने बैठे तब पैसों का पर्स याद आया, जैसे-तैसे भोजन किया, नदी पर गये महिलायें पानी भर कर आ रहीं थीं, पर्स वहीं पड़ा था, वर्णीजी ने उनसे पूँछा, आपने पर्स को क्यों नहीं उठाया? उन्होंने जबाव दिया, हम गोमटेश के राज्य में विना दी हुयी वस्तु को कभी नहीं छूते, यह एक आश्चर्यकारी घटना थी।
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सरकार की चोरी करना एक अरब जनता की चोरी करना है।
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एक रुद्र की इक्यासी लाख वर्ष पूर्व की आयु थी, सत्ताईस लाख वर्ष पूर्व गृहस्थ अवस्था में रहे, सत्ताईस लाख वर्ष पूर्व भावलिङ्गी मुनी रहे, सत्ताईस लाख वर्ष पूर्व भ्रष्ट होकर भोग भोगकर, मरकर नरक में गए।
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तीर्थङ्कर के छेदोस्थापना वाला चारित्र नहीं होता, वे वर्धमान चारित्र वाले होते हैं।
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विना छेद के मोती के समान तीर्थङ्कर का चारित्र होता है एवं यम रूप सामायिक चारित्र होता है।
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मैनासुन्दरी की सीख- 1.पञ्चपरमेष्ठी का स्मरण करना, 2.चार प्रकार का दान, 3.पूजा आदि अपने षडावश्यकों का पालन करना, 4.धीरे बोलो-शान्ति मिलेगी, 5.भक्ति करो-मुक्ति मिलेगी, 6.सेवा करो-शक्ति मिलेगी, 7.दान करो-सम्मान मिलेगा, 8.सन्तोष रखो-सुख मिलेगा, 9.सहन करो-साथ मिलेगा, 10.अहं छोड़ो चमन खिलेगा।
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अर्थात् यदि राजा धार्मिक होता है तो प्रजा भी धार्मिक होती है और यदि राजा पापी होता है तो प्रजा भी पापी होती है, सम होने पर सम होती है, लोग तो अनुशरण करते हैं जैसा राजा होता है वैसी प्रजा होती है।
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आते वक्त वस्त्रों का और जाते वक्त गुणों का सम्मान होता है। शरीर नहीं सिद्धान्त प्यारे होने चाहिए।
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गुरुओं से व्रत लेकर जो तोड़ता है उसे सहस्रकूट जिनालय तोड़ने का पाप लगता है।
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जो स्नान, उपभोग, पूजा, अलङ्कार से रहित हैं, मधु-मांस का त्यागी है, वह गुणवान अतिथि कहलाता है।
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शिष्य लक्षण- जो खेल व कौतूहल से रहित हो, लज्जावान हो, अधिक और अतिमधुर आहार करने वाला न हो, दयालु हो, छलरहित हो, ब्रह्मचारी हो, विनय एवं नीति से सहित हो, ज्ञान का उपयोग करने वाला हो, प्रमाद रहित हो, समीचीन उच्चारण करने वाला हो, कृतज्ञ हो, अनेक बार गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला हो, शान्त हो, एकाग्रचित्त हो, मधु के समान मधुरभाषी हो तथा अभिमानी न हो वह उत्तम शिष्य माना गया है।
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मुख, आँख, कान बन्द किये गाँधी जी के तीन बन्दर हमें शिक्षा देते हैं, बुरा मत बोलो, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत सोचो।
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नदी पर बुढ़िया आधी धोती पहनकर धो रही थी, उसकी गरीबी देखकर गाँधी जी ने खादी और घुटने तक धोती पहनने का नियम लिया था।
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महात्मा गाँधी जी नेता कम, साधक ज्यादा थे।
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गृहीत व्रतों का कभी त्याग नहीं करने वाला अच्युत कहलाता है।
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महापुरूष की हर चेष्टा बिना बाजे के प्रभावना का कारण होती है।
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कुछ महान होते हैं, कुछ महान बनते हैं और कुछ के लिये महानता थोप दी जाती है।
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दया और सरलता की मूर्ति, दृढ़ता और अनूभूतिमय प्रवृत्ति 'वज्रादपि कठोराणि, मृदूनि कुसुमादपि' अपने लिए वज्र से भी कठोर एवं दूसरों के लिए फूल से भी कोमल थे।
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हम उपदेश देने में चतुर हैं पालन करने में असमर्थ हैं, वेश बनाकर मात्र पर को उपदेश देना मोह का विलास ही है।
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लोक निन्दा के भय से व्रत पालन करने से कोई लाभ नहीं, आत्मा की भयादि परिणति दूर करो।
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सुधारक- विद्यालय के बच्चों ने एक दिन किसी के खेत के चने चुरा लिये, पण्डित गोपालदास जी को पता चला उस दिन भोजन नहीं किया, पण्डितजी को बहुत मनाया पर वे नहीं माने, उन्होंने कहा कि चोरी ही सीखना थी तो संस्था में क्यों आये, मीटिंग हुयी बच्चों ने चोरी के त्याग की प्रतिज्ञा ली, तब पण्डितजी ने शाम को भोजन किया।
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निरपेक्षवृत्ति- पण्डित गोपालदास जी की पत्नी ने एक बार विद्यालय के बढ़ई से बच्चे को एक खिलौना बनवा लिया, पण्डित जी को पता चला तो पण्डितजी ने काष्ठ की कीमत, दो घण्टे कारीगर की मेहनत का पैसा विद्यालय में जमा कर दिया, विद्यार्थियों को निरपेक्ष वृति से पढ़ाते थे, उनके पढ़ाये बच्चे सभी ठोस विद्वान् निकले जो समाज के कर्णधार बने।
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