गुरून् प्रतिभुवः कृत्वा, भङ्क्त्येकम्धृतं व्रतं। सहस्रकूट जैनेन्द्र, सद्य भङ्घघ भागलं।।
गुरुओं से व्रत लेकर जो तोड़ता है उसे सहस्रकूट जिनालय तोड़ने का पाप लगता है।
One who takes a vow from the gurus and then breaks it incurs the sin of demolishing a thousand-shrine Jinalaya.
— आराध्य सूत्र · #24
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