Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 48

स्वयं स्वयं पर बनो कृपालु

67 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

सम्यक् प्रवृत्ति करने में यदि लोक हास्य का भय है, तब वह सम्यक्त्व का अतिचार है, अतः लोक हास्य का भय मत करो, जो उचित हो, उसे करें।
धर्म
स्वभावदृष्टि, परमात्म स्मरण, शास्त्राभ्यास, दोषवाद में मौन, सद्वृत्त कथा, प्रियहित वचनालाप और सत्संग, इस प्रकार के क्रम से पुरुषार्थ करो अर्थात् पूर्व-पूर्व की और बढ़ो। यदि पूर्व में शिथिल हो जाओ या थक जाओ, तब उत्तर का आश्रय लो। सर्वप्रथम स्वात्म दृष्टि इसलिए है कि इससे भी चूक जाने पर कल्याण की आशा नहीं है।
धर्म
अपने विचार के विपरीत दूसरों की परिणति देखकर संक्लेश मत करो तुम्हारी परिणति ही तुम्हारे अधीन है।
संयम
व्याधि और मृत्यु कभी भी आ सकती है अतः शीघ्र ही आत्म शान्ति पाने का उद्यम करो।
समाधि
पुरुषार्थी मनुष्य मात्र जो बोलने वाले हैं, उन पर अपना स्वामित्व जमा लेता है, मात्र वक्ता पुरुष पुरुषार्थियों का मनोरंजन करते हुए उपासना (प्रशंसा) करता है।
पुरुषार्थ
अरे आत्मन्! तुझ पर तू ही कृपा कर सकता है, अतः अपनी ही दृष्टि में भला बनने का प्रयत्न करके अपने में प्रसन्नता प्राप्त करना चाहिए।
मन
इक ले रहो तो निर्जन वन में, ग्राम रहो तो धर्मी गण में। मन न लगे तो लगो लिखन में, निर्मल मन हो तो लगो पठन में। कुमति रहे, चल गुरु चरणन में, हो विकल्प लग देव भजन में। काम समय लग मल (अशुचिभावना) वर्णन में, क्रोध करो तो निज कुमतिन में। मान करो निजशुचि गुण गान में, माया हो छुप शुद्धातम में। लोभ करो निर्मल निज गुण में, हो प्रसन्न निर्मल चिन्तन में। प्रेम करो केवल ज्ञानि में, कर विरोध मिथ्याभावन में। शोक करो कुत्सित कृत्यन में डर नित डरनित पाप करन में। घृणा करो तो पापीमन में, रह निःशंक नित आत्म मनन में। तन मन धन दो ज्ञान मिलन में, प्रिय हित वचन कहो सब जन में।
संयम
नीच विघ्न भय से कार्य प्रारम्भ नहीं करते हैं, मध्यम विघ्न आने पर छोड़ देते हैं उत्तम पुरुष बार-बार विघ्न आने पर भी प्रारम्भ किए कार्य को छोड़ते नहीं हैं।
पुरुषार्थ
विपरीत परिस्थितियों में भी जो ईमान, साहस और धैर्य को कायम रख सके वस्तुतः वही सच्चा शूरवीर है।
चरित्र
कठिन परिस्थितियाँ एक वाशिंग मशीन की तरह होती हैं, जो हमें ठोकर मारती, घुमाती हैं और निचोड़ती भी है पर आखिर में जब हम इनसे बाहर आते हैं, तो हमारा व्यक्तित्व पहले की अपेक्षा अधिक साफ चमकीला और बेहतर होता है।
चरित्र
लोग क्या कहते हैं इस पर ध्यान मत दो, सिर्फ यह देखो कि जो करने योग्य था वह बन पड़ा या नहीं। नेक बनने के लिए ऐसी कोशिश करो जैसी खूबसूरत दिखने के लिए करते हो।
चरित्र
पढ़े लिखे लोग परिस्थितियों के हिसाब से खुद को बदल लेते हैं, अनुभवी लोग अपने हिसाब से परिस्थितियों को बदल लेते हैं।
ज्ञान
हर परिस्थिति में शान्त रहें तो जीवन में अपने आप को बहुत मजबूत पायेंगे क्योंकि लोहा ठंडा रहने पर ही, मजबूत होता है गर्म रहने पर लोहे को मनचाहे आकार में ढाल दिया जाता है। ''पुरुषत्व तो परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाने में है।''
संयम
शरीर कभी भी पूरा पवित्र नहीं हो सकता है फिर भी सभी लोग इसको पवित्र करने की कोशिश करते हैं, जबकि मन पवित्र हो सकता है पर लोग कोशिश नहीं करते हैं।
मन
जो व्यक्ति जितनी अपने स्वार्थ की आहुति करता है, उसकी शक्ति उतनी ही बढ़ती है।
संयम
जो कुछ हमारे पास है उसमें संतोष करना उचित है लेकिन हम जो हैं उससे संतुष्ट कभी नहीं रहना चाहिए।
संतोष
भाव परावर्तन ही पञ्च परावर्तन कराता है, अतः अपने भावों को सुधारो अर्थात् पाँच पापों को तजो और पञ्च परमेष्ठी को भजो। भाव सुधरने से भव सुधरता है।
कर्म
अगर आप आलसी हो तो अकेले मत रहो, अकेले हो तो आलसी मत बनो।
पुरुषार्थ
जीवन का अंत समय सुधारना है तो प्रतिक्षण सुधारो।
समाधि
अपना आदर्श उपस्थित करके ही दूसरों को सच्ची शिक्षा दी जा सकती है।
चरित्र
कर्म से ही पहचान होती इंसान की दुनिया में, अच्छे कपड़े तो बे-जान पुतलों को भी पहनाये जाते हैं दुकानों में।
चरित्र
दीपक बोलता नहीं उसका प्रकाश परिचय देता है, ठीक उसी प्रकार आप अपने अच्छे कर्म करते रहें वही आपका परिचय देंगे।
चरित्र
कुछ कर गुजरने के लिए मौसम नहीं मन चाहिए, साधन सब जुट जाऐंगे, संकल्प का धन चाहिए।
पुरुषार्थ
शुरू में वह कीजिए जो आवश्यक है, फिर वह कीजिए जो संभव है और अचानक आप पायेंगे कि आप तो वह भी करने लग गये हैं जो असंभव था।
पुरुषार्थ
आसक्ति से किए हुए शुद्ध काम में भी दाँव-पेंच आते ही हैं।
अनासक्ति
१०० काम छोड़कर स्नान, १००० काम छोड़कर भोजन, लाख काम छोड़कर प्रभु दर्शन और करोड़ काम छोड़कर सत्संग करना चाहिए।
भक्ति
जब सड़क का पत्थर मन्दिर का देवता बन जाता है तो हम इंसान क्यों नहीं बन सकते हैं।
चरित्र
आप अपने भविष्य को नहीं बदल सकते हैं परन्तु अपनी आदतें अवश्य बदल सकते हैं, आपकी आदतें आपका भविष्य बदल देंगी।
चरित्र
भोजन मिलता भाग्य से है पर पेट भरता पुरुषार्थ से ही है।
पुरुषार्थ
अरे आत्मन्! शान्ति की परीक्षा अनिष्ट समागम में होती है।
संयम
जिस पद्धति में अब तक रहते आए उस पद्धति में शान्त तो हो नहीं सके, फिर इन संस्कारों को छोड़ो अलौकिक वृत्ति धारण करो, दुनिया से अपरिचित रहो, अकेलापन अनुभव करने वाला शान्त और सुखी रहता है।
अनासक्ति
सिगरेट मौत के लिए लाभदायक है उसको जितना खींचों जिन्दगी उतनी छोटी होती है।
स्वास्थ्य
जिन्हें कुछ करना है उनके शब्दकोश में असंभव शब्द नहीं होना चाहिए बल्कि लक्ष्य के अनुरूप समय और श्रम अधिक होना चाहिए।
पुरुषार्थ
अंतिम समय में वासना, कामना नहीं सताती है, रसना इन्द्रिय सताती है अतः नियंत्रण रखो।
आहार
आपने जगत् के सारे जीवों के साथ रहकर जी लिया फिर भी भगवान् नहीं बन पाये, अब एक बार स्वयं के साथ रहना सीख लो तो सदा के लिए सिद्धों में वास हो जायेगा।
ध्यान
जो स्वयं भीतर की निर्बलता से लड़े वह साहसी है।
संयम
किसी के गुणों की प्रशंसा करने के साथ उन गुणों को अपनाने का प्रयत्न भी करें।
चरित्र
मौत और भगवान् को न भूलो, हो सकता है जीवन का आखिरी दिन आज ही हो।
समाधि
किस्मत भी तब रोती है जब मेहनत नहीं होती है।
पुरुषार्थ
अपनी कमजोरियों का जिक्र न करना जमाने से क्योंकि लोग कटी पतंग को लूटते हैं।
विवेक
कुछ अलग करना है तो जरा भीड़ से हटकर चलो क्योंकि भीड़ साहस तो देती है लेकिन पहचान छीन लेती है।
चरित्र
संस्थापक बनना सरल है, पर व्यवस्थापक बनना कठिन है।
पुरुषार्थ
यदि आत्मोन्नति चाहते हो तो खाली मत बैठो, अपने कार्य में व्यस्त रहो।
पुरुषार्थ
वचन चाहे कितने भी श्रेष्ठ क्यों न हो किन्तु दुनिया हमारे कर्मों से ही पहचानती है।
चरित्र
कर्मों से लड़ना नहीं, खोटे कर्मों से बचना साधना है।
कर्म
जो जिम्मेदारी मिले उसे सम्मानपूर्वक निभाना मनुष्य का सर्वोत्तम कर्त्तव्य है।
चरित्र
दुनिया में कोई 'Impossible' काम नहीं बस होसला और मेहनत की जरूरत है 'I' 'M' 'Possible' को गौर से देखो वो खुद कहता है, मैं संभव हूँ।
पुरुषार्थ
धन, साधन, समय, कर्म और स्थान इन पाँचों का स्पष्ट विचार करके किसी कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए।
विवेक
किसी भी काम को लेकर ज्यादा संकोच और डर न रखें क्योंकि जिन्दगी एक प्रयोग है आप जितने ज्यादा प्रयोग करेंगे उतने बेहतर होते जायेंगे।
पुरुषार्थ
आपकी जिस काम में पहले से महारत है और उससे आगे बढ़कर अगर आपने कुछ अलग करने के प्रयास नहीं किए तो आप कभी आगे नहीं बढ़ पायेंगे।
पुरुषार्थ
जब आप पैदा हुए थे तब आप रोये थे और दुनिया हँसी थी किन्तु जिन्दगी में ऐसे काम करो कि जाते वक्त आप हँसो और दुनिया रोये।
चरित्र
तूफान का सामना करने के बाद ही कोई अच्छा कप्तान बनता है अतः आगे बढ़ने के लिए समस्याओं का सामना करना आवश्यक है।
पुरुषार्थ
कोई बड़ा काम करना है तो पहले थोड़ा गलत काम करें।
पुरुषार्थ
स्तोत्र, मंत्र, व्रत, पूजा, ध्यान, ज्ञान, उत्तम विचार, दान, शील, सहयोगीजन और गुरुजनों की सेवा के द्वारा मनुष्य जिससे संभव हो प्रयोजन सिद्ध करें।
धर्म
अज्ञान, प्रमाद या उपेक्षा से यदि कार्य नष्ट हो गया तो पुरुष का समस्त प्रयास निष्फल है।
पुरुषार्थ
छोटे बनकर बड़े काम करना श्रेष्ठ है, बड़े बनकर छोटे काम करना अच्छा नहीं है।
विनम्रता
गलत कार्य करने के पश्चाताप का एक मात्र उपाय है पंचपरमेष्ठी की आराधना करना।
भक्ति
पुण्य के प्रभाव से हर जगह सहायता करने वाले मिल जाते है, राम को लंका में विभीषण मिल सकता है तो फिर आपको कोई क्यों नहीं मिल सकता है ''पुण्य कमाओ''।
कर्म
जो यौवन में स्थिर होकर भी स्त्री लक्ष्मी आदि को तृण के समान छोड़ देते है वे धन्य है।
ब्रह्मचर्य
सम्पूर्ण अनर्थों की जड़ प्रमाद वृत्ति है ''दीपक की तरह प्रकाश से अपना परिचय दो।''
पुरुषार्थ