Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 39

नीति वाक्यामृत

287 सूत्र · पृष्ठ 2 / 5

जो लोग किसी व्यक्ति की आकृति देखकर ही उसके अभिप्राय को ताड़ जाते हैं, ऐसे लोगों को चाहे जैसे बने वैसे अपना सलाहकार बनाओ।
विवेक
श्रोताओं के सामने आने पर भयभीत होने वाले व्यक्ति का ज्ञान उसी प्रकार है, जैसे युद्ध क्षेत्र में नपुंसक के हाथ में तलवार।
ज्ञान
जो लोग ज्ञानी हैं, लेकिन विज्ञजनों के सामने आने से डरते हैं, वे अज्ञानियों से भी गये बीते हैं।
ज्ञान
जो आदमी अपनी भलाई चाहता है, उसे सबसे अधिक सावधानी इस बात की रखनी चाहिए कि वह महान् पुरुषों का अपमान करने से अपने को बचावे।
विनम्रता
अत्यन्त लोभी का अर्थ और अधिक आसक्ति रखने वालों का काम ये दोनों ही धर्म को हानि पहुँचाते हैं, जो मनुष्य काम से धर्म और अर्थ को, अर्थ से धर्म और काम को तथा धर्म से अर्थ और काम को हानि न पहुँचा कर धर्म, अर्थ और काम तीनों का यथोचित रूप से सेवन करता है, वह अत्यन्त सुख प्राप्त करता है।
धर्म
तुम सब लोगों को कुछ समय के लिए तथा कुछ लोगों को सदा के लिए मूर्ख बना सकते हो किन्तु तुम सबको सदा के लिए मूर्ख नहीं बना सकते हो।
सत्य
गुरुओं की कठोर अक्षरों वाली वाणी से तिरस्कृत मनुष्य महत्त्व प्राप्त करते हैं, कसौटी पर घिसे बिना मणि राजाओं के सिर पर स्थान नहीं पाती है।
ज्ञान
चरित्र हीन धनी भी विपत्ति में पड़ता है।
चरित्र
सज्जन पुरुष पच जाने पर अन्न की, निष्कलंक जवानी बीत जाने पर स्त्री की, संग्राम जीत लेने पर शूर की और तत्त्व ज्ञान प्राप्त हो जाने पर तपस्वी की प्रशंसा करते हैं।
विवेक
जगत् में जो धूर्त अथवा भद्र लोग हैं, उनका माप और कुछ नहीं केवल उनकी आँखें ही हैं।
Misc.
उपदेश की अपेक्षा उदाहरण सदैव अधिक प्रभावोत्पादक होता है।
ज्ञान
जिस व्यक्ति में अभय, मृदुता, सत्य, सरलता, करुणा, धैर्य, अनासक्ति, स्वावलम्बन, स्वशासन, सहिष्णुता, कर्तव्यनिष्ठा, व्यक्तिगत संग्रह का संयम और प्रामाणिकता होती है, वह नीतिमान कहलाता है।
चरित्र
आचार से बढ़कर और कोई प्रचार हो ही नहीं सकता, जो काम मनुष्य दूसरे से कराना चाहता है, उसे वह स्वयं करे, उसका यह सबसे बढ़कर प्रचार होगा।
चरित्र
योग्य पुरुषों की सभा में किसी मूर्ख मनुष्य का जाना ठीक वैसा है जैसा कि साफ-सुथरे पलंग के ऊपर मैला पैर रख देना है।
संगति
अपने वश किए शत्रु से दूसरे शत्रु को नष्ट करा दें, पैर में लगे काँटे को हाथ में स्थित काँटे से ही निकालते हैं।
विवेक
राजनीति के पीछे नीति से भी हाथ न धो बैठो क्योंकि नीति का विश्व मानव के साथ व्यापक सम्बन्ध है।
चरित्र
जिस राष्ट्र में विद्वान् सताये जाते हैं, वह राष्ट्र विपत्तिग्रस्त होकर वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे टूटी नौका जल में डूब कर नष्ट हो जाती है।
ज्ञान
लक्ष्य प्राप्ति के लिए सहज प्रवृत्तियों को भी होम कर देना होता है।
पुरुषार्थ
खाली होने पर सब कुछ छोटा होता है और पूर्णता गौरव के लिए होती है।
विनम्रता
लोकोक्तियों को विद्वत्ता का सूत्र कहा जा सकता है।
ज्ञान
समता में प्रतिष्ठित चित्त वाले लोगों का भी विशेष व्यक्तियों के प्रति अति गौरवमय व्यवहार होता है।
विनम्रता
जब तक तुम्हें अपना सम्मान और दूसरे का अपमान सुख देता है तब तक तुम अपमानित ही होते रहोगे।
विनम्रता
जब तक तुम्हें अपने लिए सुख की और दूसरे के लिए दुःख की चाह है तब तक तुम सदा दुःखी ही रहोगे।
मन
उदार रहो, कृपा करो, सबके साथ समानता निभाओ, पर सस्ते न बनो, अपना भेद न दो जिससे कि दूसरे लोग अनुचित लाभ उठाने लगे।
चरित्र
व्रत रहित जीवन उस जहाज की तरह है जिसके नाविक ने अपने गन्तव्य स्थान का निश्चय न किया हो।
धर्म
जो सभी का शुभ चाहता है, किसी के अशुभ की कामना नहीं करता सत्यवादी है, कोमल है, जितेन्द्रिय है वही उत्तम पुरुष है।
चरित्र
श्रेष्ठ पुरुषों के मनोरथों को पूर्ण करने में श्रेष्ठ पुरुष ही समर्थ होते हैं।
Misc.
संकट ही चरित्र को निखार कर नैतिक बल प्रदान करते हैं।
चरित्र
एक ओर एक व्यक्ति हो और दूसरी ओर एक समूह हो तो समूह को छोड़कर एक व्यक्ति का ग्रहण करने की इच्छा न करें परन्तु जो एक मनुष्य बहुत मनुष्यों की अपेक्षा गुणों में श्रेष्ठ है और इन दोनों में से एक को ही ग्रहण करना पड़े तो ऐसी स्थिति में कल्याण चाहने वाले पुरुष को उस एक के लिए समूह को त्याग देना चाहिए।
विवेक
किसी महान् कार्य को करने के प्रसंग में शत्रुओं से भी सन्धि कर लेना चाहिए।
विवेक
ईर्ष्या नहीं करना, क्षमा, शान्ति, सन्तोष, प्रियवाणी होना तथा काम क्रोध का त्याग ये श्रेष्ठ आचरण के लक्षण हैं।
चरित्र
जो आलसी हैं, कायर हैं, अभिमानी हैं, लोक चर्चा से डरने वाले और सदा समय की प्रतीक्षा में बैठे रहने वाले हैं, ऐसे लोगों को अपने अभीष्ट की प्राप्ति नहीं होती है।
पुरुषार्थ
जहाँ अपूज्यों की पूजा होती है तथा पूज्यों का अपमान होता है, वहाँ दुर्भिक्ष, मरण तथा भय तीन कार्य होते हैं।
Misc.
सर्वनाश के उपस्थित होने पर पण्डित आधे को छोड़ देता है, आधे से कार्य करता है, सर्वनाश असहनीय होता है।
विवेक
जो मनुष्य अपने को बुद्धिमान मान कर निर्भय विचरता है, उसे कभी कोई सलाह नहीं देनी चाहिए क्योंकि वह दूसरे की सलाह नहीं सुनता है।
विनम्रता
सलाह का कदाचित् ही स्वागत होता है, जिन्हें इसकी अधिकतम आवश्यकता होती है, वे ही इसे सबसे कम पसन्द करते हैं।
Misc.
मूर्ख मनुष्य कुछ भी कह दे, विद्वान् पुरुष को वह सब सह लेना चाहिए।
क्षमा
ऊँचाई पर पहुँचे हुए मनुष्यों को यत्नपूर्वक आत्मा की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि दूर तक चढ़ जाने के बाद नीचे गिरना दुःसह होता है।
विवेक
सैकड़ों दलीलें एक तरफ और एक तरफ सुभाषित जो प्रतिद्वन्दी को निरुत्तर कर देता है, उसके जवाब में सामने वाले की जुबान नहीं खुलती, उसका पक्ष कितना भी प्रबल हो पर सुभाषितों में कुछ ऐसा जादू होता है कि मानो वह एक फूँक से दलीलों को उड़ा देता है।
वाणी
अनुभवहीन व्यक्ति के लिए सूक्ति ग्रन्थ का अध्ययन अच्छी बात है।
ज्ञान
प्रत्येक व्यक्ति एवं वस्तु का अपने स्थान पर महत्त्व है एवं कार्य के योग्य स्थान पर ही कार्य की सिद्धि होती है।
Misc.
स्वाधीनता सद्गुणों को जगाती है, पराधीनता दुर्गुणों को जगाती है।
चरित्र
व्यक्तिगत स्वतंत्रता वहीं तक दी जा सकती है जहाँ तक दूसरों की स्वतंत्रता में बाधा न पड़े।
Misc.
विचार और कार्य की स्वतंत्रता ही जीवन उन्नति और कुशल क्षेम का एक मात्र साधन है।
Misc.
गरम स्वभाव सब सिद्धियों का प्रथम विघ्न है।
क्षमा
ओखली–मूसल को स्वर्ग भी ले जाओ तो वहाँ भी वे धान ही कूटेंगे।
Misc.
प्रायः स्वामियों का अपने आश्रितों के प्रति आदरभाव अपने प्रयोजन के लिए और अस्थिर होता है।
Misc.
लज्जा से रहित व्यक्ति ही स्वार्थ के साधक होते हैं।
चरित्र
सब्र के बिना कब्र ही शरण होती है।
संतोष
इस भीषण संसार में एक प्रेम करने वाले हृदय को खो देना सबसे बड़ी हानि है।
अनासक्ति
काँच का टुकड़ा टूट कर तेज धार वाला छुरा बन जाता है, वही हालत इंसान के टूटे हुए दिल की होती है।
मन
जब मनुष्य पदासीन होता है तब बहुत से अपरिचित उसके सहायक तथा सभी उसके अधीन हो जाते हैं, पदच्युत एवं धन रहित होने पर स्वजन भी शत्रु हो जाते हैं, अतः पाप से डरना चाहिए।
कर्म
श्रेष्ठ व्यक्ति का सम्मान करके उन्हें अपना बना लेना दुर्लभ पदार्थों से भी अधिक दुर्लभ है।
विनम्रता
थोड़े भी उपकार को मानना सज्जनता है नहीं मानना दुर्जनता है।
चरित्र
उत्तम विचार और महान् चरित्रबल ही परम धन है।
चरित्र
स्नेह को खोकर वस्तु को पा लेना, पाना नहीं गँवाना है।
अनासक्ति
उधार धर्म कहने कि लिए नगद धर्म करने के लिए होता है।
धर्म
किसी धर्म-सम्प्रदाय को इसलिए ग्रहण न करो कि उसके प्रवर्तक राजा या राजकुमार हैं क्योंकि राजा-महाराजा प्रायः आध्यात्मिकता में दरिद्र होते हैं।
धर्म
राग, लोभ, भय, द्वेष और एकान्त वादियों की बातें सुनना निर्णायक को इन पाँच दोषों से बचना चाहिए।
विवेक
गुण-दोष का विचार किए बिना किसी को ग्रहण करना या त्यागना मानो अपना नाश करने के लिए सर्प के मुख में हाथ डालना है।
विवेक