Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 17

खुश मिजाज-हाजिर जवाब

186 सूत्र · पृष्ठ 2 / 4

धर्म से धन आता है, धन से धर्म नहीं होता।
धन
बिना कुछ दिये कुछ पाने की कोशिश न करें।
दान
वस्त्रों का साफ होना जरूरी है, बहुमूल्य होना नहीं।
संतोष
खुद कमाना और खुद खाना प्रकृति है, दूसरों से छीनकर खाना विकृति है और स्वयं कमाना तथा दूसरों को खिलाना संस्कृति है।
चरित्र
यदि आप लक्ष्मीपति हो तो दान करोगे लक्ष्मीदास हो तो धन की सेवा करोगे।
धन
एक व्यक्ति दिखने में सुन्दर है, पढ़ा-लिखा और बुद्धिमान है, निरोग है लेकिन दरिद्री है क्योंकि उसने पूर्व में आहारदान नहीं दिया।
दान
एक व्यक्ति जिसके पूर्वज बहुत ही सम्पत्ति छोड़ गये थे और वर्तमान में भी अच्छा व्यवसाय है, निरोग है, पढ़ा-लिखा है लेकिन प्रतिसमय खाते-पीते, सोते-जागते भय बना रहता है क्योंकि उसने पूर्व में अभयदान नहीं दिया।
दान
एक व्यक्ति के पास बहुत पैसा है, लक्ष्मी सम्भाले नहीं सम्भल रही, किसी प्रकार का भय भी नहीं है, वह विद्वान् है लेकिन हमेशा रोगी ही बना रहता है, मूँग की दाल भी नहीं पचती क्योंकि उसने पूर्व में औषधिदान नहीं दिया था।
दान
एक व्यक्ति वैभव सम्पन्न है, निरोग है, पर दिन-रात अध्ययन करने पर भी कुछ याद नहीं होता क्योंकि उसने पूर्व में ज्ञानदान नहीं दिया था।
दान
अहंकार से तप नष्ट हो जाता है और इधर-उधर कहने से दान निष्फल हो जाता है।
विनम्रता
दानशीलता हृदय का गुण है, हाथों का नहीं।
दान
लेकर देने की अपेक्षा न लेने का बड़ा भारी पुण्य है।
दान
जो दान कर दिया वह सोना है और जो बचा लिया वह मिट्टी है।
दान
दान यदि धर्म की प्रभावना और आत्मा के उत्थान के लिए दिया जाता है तो सम्यग्दर्शन आदि में कारण होता है।
दान
दान देने वाले का उद्देश्य सम्मान प्राप्त करने का नहीं होना चाहिए।
दान
उदार दिलवाला दे देकर धनवान बनता है, लोभी जोड़-जोड़कर निर्धन बनता है।
दान
जो कुछ हम दूसरों को देते हैं, वास्तव में वह सब हम अपने-आपको दे रहे हैं, अगर इस तथ्य को पहचान लिया तो फिर ऐसा कौन होगा जो दूसरों को दान न दे।
दान
दान से सम्पत्ति घटती नहीं, बढ़ती है, अँगूरों की शाखाएँ काटने से और अधिक अँगूर आते हैं। दानी के चरित्र का पता दान की अपेक्षा देने की विधि से अधिक लगता है।
दान
जो देता है वह देवता होता है और जो रखता है वह राक्षस होता है।
दान
यदि आप किसी को कुछ देना चाहते हो तो बस उसका चेहरा मुस्कुराहट से भर दो।
दान
अपना किया और अपना दिया ही काम आता है, दूसरे का किया और दिया हुआ अपने काम नहीं आता है।
कर्म
प्राप्त करने की अपेक्षा दान करना कहीं अधिक सौभाग्य का द्योतक है।
दान
माँगने पर देना अच्छा है, लेकिन जरूरत को समझकर बिना माँगे देना और भी अच्छा है।
दान
न्यायपूर्वक उपार्जित हुए धन के दो ही दुरुपयोग समझने चाहिए, अपात्र को देना और सत्पात्र को न देना।
दान
तुम्हारे द्वार पर कोई कुछ माँगने आया और तुमने नहीं दिया बस यही तुम्हारा दुर्भाग्य है।
दान
अतिथियों को आहार दान दिये बिना भोजन करने वाले गृहस्थ को दो पैर वाला बिना सींग-पूँछ का पशु कहा है।
दान
जिसके पास आकर याचक लोग सन्तुष्ट नहीं होते वह गृहस्थ निन्द्य है।
दान
प्रकृति वही लौटाकर देती है जो आप अपनी ओर से औरों को देते हैं।
दान
अन्त में अकेला ही जाना पड़ेगा इसलिए पहले से ही अकेले हो जायें अर्थात् वस्तु, व्यक्ति और क्रिया से असंग हो जायें, इनका आश्रय न लें।
अनासक्ति
दूसरे की प्रसन्नता से मिली हुई वस्तु दूध के समान है, माँगकर ली हुई वस्तु पानी के समान है और दूसरे का दिल दुःखाकर ली हुई वस्तु रक्त के समान है।
दान
लोक में वीतराग को छोड़कर दूसरा कोई देव, ब्रह्मचर्य को छोड़कर दूसरा कोई तप, अभयदान को छोड़कर दूसरा कोई दान और मुनिराज को छोड़कर दूसरा कोई पवित्र प्राणी नहीं है।
धर्म
खाली पेट कोई व्यक्ति बुद्धिमान नहीं हो सकता है।
आहार
मनुष्य को अतिथियों और आश्रितों के लिए आहार दान देकर ही भोजन करना चाहिए।
दान
जो कुछ आपके पास है अतिशीघ्र प्रभु को समर्पित कर दो क्योंकि पता नहीं किस क्षण सब छोड़कर जाना पड़ जाये।
भक्ति
संसार एक प्रतिध्वनि है। जो बोलोगे वही आपके पास वापस लौटकर आएगा प्रेम दोगे तो प्रेम पाओगे घृणा दोगे तो घृणा पाओगे।
चरित्र
हाथों का सदुपयोग सुपात्रों को दान देने में ही है।
दान
सार्वजनिक संस्थाओं का काम उधार के रुपयों से नहीं चलना चाहिए।
विविध
जो भक्ति में तत्पर होता हुआ जिनालय में चंदोबा देता है वह निश्चित ही एक छत्र राज्य प्राप्त कर निर्वाण प्राप्त करता है।
दान
जो मनुष्य पुण्य के हेतु जिनालय में घण्टा देता है वह घण्टा आदि से सहित विमान को प्राप्त कर मुक्ति का वर होता है।
दान
जो मनुष्य मुनियों के लिए ज्ञान दान करता है वह स्वर्ग लोक में सुख भोगकर राज्य एवं केवलज्ञान की विभूति को प्राप्त होता हुआ मोक्ष पाता है।
दान
जो मुनियों के लिए पुण्यकारी पवित्र औषध देता है वह देवलोक में सुख भोगकर कर्म रूपी रोगादिक को नष्ट करता है।
दान
प्राणी मात्र को अभयदान देने से जीव संसार सुख भोगकर निर्भय स्थान मोक्ष को पाता है।
दान
जो मनुष्य अल्प सम्पदा से युक्त होकर भी आत्मशक्ति को प्रकट कर नाना प्रकार का दान करते हैं, वे दानियों में श्रेष्ठ हैं।
दान
दुष्ट पुरुषों का बल है ‘हिंसा’, राजाओं का बल है दण्ड देना, स्त्रियों का बल है सेवा अथवा रोना, सत्पुरुषों का बल है धन, असफल व्यक्तियों का बल है धैर्य, गुणवानों का बल है क्षमा, संतों का बल है साधना।
चरित्र
जैसे चारों ओर से जलते हुए मकान में फँसे शिशु की चिंता एक माँ को होती है, वैसी चिंता साधक को सामायिक (आत्मध्यान) की होनी चाहिए।
ध्यान
भारत के साधु यदि नशेबाजी और दुर्व्यसनों का त्याग कर देश के रचनात्मक कामों में लग जाएँ, तो वे जनता को अपने पक्ष में कर सकते हैं।
धर्म
आपत्ति, दुःख और चिंताएँ इसलिए आती हैं कि परमात्मा को याद करने का समय निकाल सकें, आत्मदर्शन कर सकें तथा दूसरों के दुःखों का अनुभव कर सकें।
भक्ति
इस असार एवं दुःख पूर्ण संसार में अनन्त अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल व्यतीत हो गए, उन समस्त कालों में यही मन्त्रराज महत्त्वपूर्ण रहा है अर्थात् अतीत काल में जिन भव्य प्राणियों ने मुक्ति पाई है, विदेहादिक से वर्तमान काल में पा रहे हैं, पाँच भरत और पाँच ऐरावत क्षेत्र से भविष्यत् काल में मुक्ति पायेंगे, यह सब मन्त्रराज का ही प्रभाव जानना चाहिए।
णमोकार
यदि कोई तराजू के एक पलड़े पर णमोकारमन्त्र को स्थापित करे तथा दूसरे पलड़े पर त्रिलोक की सम्पत्ति को स्थापित करें तो प्रथम पलड़ा ही भारी होगा, ऐसे महान् गौरवशाली णमोकारमन्त्र को ‘‘मैं त्रियोग की शुद्धिपूर्वक नमस्कार करता हूँ’’।
णमोकार
जो व्यक्ति स्वभाव से धैर्यवान है, वह महान् विपत्ति के समय भी अधीर नहीं होता, संकट के समय धैर्य धारण करना मानो आधी लड़ाई जीत लेना है, अपने धैर्य के बिना और कोई संकट से मनुष्य का उद्धार नहीं कर सकता, सज्जनों का धन तो धैर्य ही है जिसके पास धैर्य है, वह जो भी इच्छा करता है उसे प्राप्त कर सकता है।
पुरुषार्थ
जब तालाब भरता है तो मछलियाँ चींटियों को खाती हैं और जब तालाब खाली होता है तो चींटियाँ मछलियों को खाती हैं। मौका सबको मिलता है बस अपनी बारी का इंतजार करो।
पुरुषार्थ
विपत्ति में धैर्य, अभ्युदय में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में विक्रम, यश में अभिरुचि और ज्ञान का व्यसन; ये महापुरुषों के स्वाभाविक गुण हैं।
चरित्र
जीवन में कोई विपत्ति आये तो कोई आपत्ति मत कीजिए, उसका धैर्यपूर्वक सामना कीजिए, दूध फटने पर वे ही लोग उदास होते हैं, जिन्हें रसगुल्ले बनाने नहीं आते हैं।
पुरुषार्थ
दुःख में कभी घबराओ मत और सुख में कभी इतराओ मत।
संयम
अज्ञानी दुःखों से डरता है, ज्ञानी दुःख में धैर्य धारण करता है।
पुरुषार्थ
रोग पीड़ित व्यक्ति के लिए धैर्य को छोड़कर दूसरी कोई उत्तम औषधि नहीं है।
पुरुषार्थ
बिना सोचे-विचारे जल्दी से लिया गया निर्णय विनाशकारी होता है।
विवेक
दुःख सभी को होता है, पर दुःख को दुःख मानकर भी जो उसे सहने की शक्ति रखते हैं, उनके लिए दुःख भी सुख हो जाता है।
पुरुषार्थ
महात्मा पुरुष सब कुछ नष्ट हो जाने पर भी खिन्न नहीं होते हैं।
अनासक्ति
कष्ट और विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने वाले श्रेष्ठ कारक हैं।
पुरुषार्थ