Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 17

खुश मिजाज-हाजिर जवाब

186 सूत्र · पृष्ठ 3 / 4

सत्य समझो, सहिष्णु व शीतल बनो, संक्लेश से बच जाओगे।
संयम
धर्म के साथ सहनशीलता सबसे ऊँची तपस्या है।
धर्म
धैर्य और धर्म की परीक्षा संकट में होती है।
पुरुषार्थ
धर्मात्मा जीव वही है जो कष्ट में भी धर्म को न छोड़ें।
धर्म
जिसमें धीरज है और जो मेहनत से नहीं घबराता कामयाबी उसकी दासी है।
पुरुषार्थ
धैर्यहीन मनुष्य तेलरहित दीपक के समान निन्दनीय है।
पुरुषार्थ
धैर्य और शान्ति कठिनाइयों के बादलों को बिखेर देती है।
पुरुषार्थ
बदला लेने में साहस नहीं, बल्कि उसे सहन करने में साहस है।
क्षमा
सम्पूर्ण बल मिलकर एक धैर्य की बराबरी नहीं कर सकते हैं।
पुरुषार्थ
मुसीबतें टूट पड़ें, हाल बेहाल हो जाए, तो भी जो लोग निश्चय से डिगते नहीं और धीरज रखकर चलते हैं वे ही सच्चे धैर्यशाली हैं।
पुरुषार्थ
धैर्य और संतोष जीवन-नौका के वे पतवार हैं जो नौका को मंजिल तक ले जाते हैं।
पुरुषार्थ
धैर्य व साहस संसार की हर आपत्ति का उपचार हैं।
पुरुषार्थ
निराशा धैर्य को समाप्त कर देती है।
पुरुषार्थ
आत्मा जिस कार्य से सहमत न हो, उस कार्य के करने में शीघ्रता न करो।
विवेक
धीरज से कमजोर आदमी को भी बल मिलता है बेसब्री से शक्ति बर्बाद होती है।
पुरुषार्थ
बिना निराश हुए पराजय को सहन कर लेना, इस धरा पर साहस की सबसे बड़ी परीक्षा है।
पुरुषार्थ
निर्भय का लोहा शत्रु भी मानता है।
पुरुषार्थ
परिवर्तन प्रकृति का नियम है, जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे।
समय
बुद्धि की स्थिरता के बिना भी आदर्श पूरा नहीं होता है।
मन
बुद्धिमान वही है, जो पूरे संकल्प से कार्य को निपटाना जानता है।
पुरुषार्थ
संसार में आधे से अधिक सक्षम लोग तो इसलिए असफल हो जाते हैं क्योंकि समय पर उनमें साहस का संचार नहीं हो पाता और वे भयभीत हो उठते हैं।
पुरुषार्थ
बाधाओं और विरोधों से भयभीत न हो।
पुरुषार्थ
जिसके पास मनोबल नहीं उसके पास कुछ नहीं, यहाँ तक कि मनुष्यता भी नहीं है।
पुरुषार्थ
उत्तम पुरुष वही है, जो अपने मन को वश में रखकर विपरीत स्थिति में धैर्य रखकर उन परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लें।
संयम
विपदाओं के समूह बाढ़ की लहरों के समान आया करते हैं, धीर पुरुष उन्हें चट्टान की तरह सहता रहे, तो वह धीरे-धीरे आप ही चले जाते हैं।
पुरुषार्थ
हमारी जितनी मानसिक और शारीरिक शक्तियाँ हैं आत्मविश्वास उन सबका सरदार है।
पुरुषार्थ
जब सामने आई परिस्थिति का सामना करना तय है तो क्यों न धैर्य एवं साहस से सामना किया जाए।
पुरुषार्थ
जगत् में कुछ मानव ऐसे भी होते हैं, जो पेड़-पौधों की तरह सब कुछ सहन कर पाते हैं।
पुरुषार्थ
कोई भी साधना जल्दी परिणाम नहीं दिखाती, साधना सब्र माँगती है।
पुरुषार्थ
साहस गया कि आधी समझदारी भी उसके साथ चली जाती है।
पुरुषार्थ
मन में विकार उत्पन्न करने वाली वस्तुओं के पास होने पर भी जिनके मन में पाप नहीं आता, वे ही धीर पुरुष माने जाते हैं।
संयम
शीघ्रता में आकर जो तुमने सुना और माना है उसे कहने मत लगो।
वाणी
शान्ति की परीक्षा क्रोध का निमित्त मिलने पर होती है प्रिय विषय साधन मिल जाने पर तो सभी शांत बन जाते हैं।
क्षमा
धीरज की चाल धीमी पर फल मीठा होता है।
पुरुषार्थ
किसी से भी सब खुश नहीं हो सकते अतः अपने संतोष से सन्तुष्ट रहना बुद्धिमत्ता है।
संतोष
ऊपरी शान्ति से भी क्रोध की पुष्टि होती है।
क्षमा
सफलता के शिखर पर समर्थक कम और विरोधी ज्यादा मिलेंगे उन विरोधियों को सकारात्मक ऊर्जा से शांत करना और संतुलन बनाये रखना आवश्यक है।
पुरुषार्थ
खुद पर भरोसा करना कोई परिंदों से सीखे क्योंकि जब वो शाम को वापस घोंसलों में जाते हैं तो उनकी चोंच में कल के लिए कोई दाना नहीं होता है।
पुरुषार्थ
हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हम कमियों को नजर अंदाज कर उस व्यक्ति की अच्छाइयों को कितना उजागर करते हैं?
चरित्र
पूछे गये हर प्रश्न का उत्तर मिले, जरूरी नहीं।
विविध
निर्णय पर दवाब या प्रभाव हावी नहीं होना चाहिए।
विवेक
सब कुछ खोने से बुरा क्या है? वो उम्मीद खोना जिसके भरोसे सब कुछ वापस पा सकते हैं। दुर्घटना को भी अवसर बनाना सीखना है, गिरो तो कुछ उठाकर ही उठना है।
पुरुषार्थ
अगर हमारा मन कमजोर है तो हमें एक राई बराबर घटना पहाड़ जैसी लगने लगती है, अगर हमारा मन मजबूत है तो पहाड़ जैसी घटना भी राई बराबर नजर आती है।
मन
फैसला फासले से बेहतर होता है।
विवेक
दुनिया विरोध करे तुम डरो नहीं क्योंकि लोग फल-फूल से लदे वृक्ष को ही पत्थर मारते हैं।
पुरुषार्थ
जो परिस्थितियों से सामंजस्य करना जानता है, प्रसन्नता परछाई की तरह उसका साथ देती है।
संतोष
परिणामों में निर्मलता आने से असंयम स्वयं ही भाग जायेगा।
संयम
समता की परीक्षा विषमता में ही होती है। समता के बिना साधुपन नहीं रह सकता।
संयम
समता के अभाव में मौन, अध्ययन, नियम, व्रत, उपवास, तप सब व्यर्थ हैं।
संयम
हम हर मिलने वाले से कुछ सीख सकते हैं पर हमारा दिमाग खुला होना चाहिए।
विनम्रता
सब्र और सच्चाई एक ऐसी सवारी है जो अपने सवार को गिरने नहीं देती ना किसी के कदमों में और न किसी की नजरों में।
पुरुषार्थ
सम्पत्ति स्वयं अपने साथ विपत्ति को लेकर आती है।
धन
साधु शरीर से श्रम भले करते हों पर लक्ष्य अंदर की शान्ति का रहता है, यदि अन्तरंग में शान्ति नहीं तो ‘श्रम’ मजदूर के श्रम समान है।
ध्यान
साहस मानवीय गुणों में प्रमुख है क्योंकि वह बाकी सभी गुणों की गारंटी देता है, साहस सिर्फ खड़े होकर बोलना ही नहीं, बैठकर धैर्यपूर्वक सुनना भी है।
पुरुषार्थ
‘शोक’ धर्म, बुद्धि, शास्त्र ज्ञान, शरीर, जप, तप, संयम और शान्ति को नष्ट करता है। शोक से मुक्त होना है तो शौक करना छोड़ दो।
पुरुषार्थ
जब भी आप हार जायें उसे सफलता की ओर एक सीढ़ी मानें, जो कि आप तय कर चुके हैं।
पुरुषार्थ
कोटि-कोटि साधना का उद्देश्य मन को शान्त करना है, अन्यथा सारी साधना बेकार है।
ध्यान
कटा हुआ वृक्ष भी बढ़ता है, क्षीण हुआ चन्द्रमा भी पुनः बढ़कर पूरा हो जाता है, इस बात को समझकर सन्त पुरुष अपनी विपत्ति में घबराते नहीं हैं।
पुरुषार्थ
आपत्ति पड़ने पर जो घबराता नहीं है, वह कल्याण को प्राप्त करता है।
पुरुषार्थ
अज्ञानी लोग छोटे काम ही आरम्भ करते हैं और अत्यन्त व्यग्र हो जाते हैं, बुद्धिमान लोग महान् कार्य हाथ में लेते हैं परन्तु व्याकुल नहीं होते हैं।
पुरुषार्थ