Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 17

खुश मिजाज-हाजिर जवाब

186 सूत्र · पृष्ठ 1 / 4

यदि निर्धनता सभी अपराधों की माता है, तो बुद्धिहीनता अपराधों का पिता है।
ज्ञान
सज्जन लोग रत्न पाकर उतने प्रसन्न नहीं होते हैं, जितने प्रसन्न उस रत्न को किसी निर्लोभ पात्र को देकर होते हैं।
दान
पुण्य बताने से घटता है, छिपाने से बढ़ता अतः छपाकर नहीं छिपाकर दान दें।
दान
थोड़े में से भी जो दान दिया जाता है, वह हजारों के दान की बराबरी करता है क्योंकि वह श्रद्धा पूर्वक दया से दिया जाता है।
दान
जलते हुए घर में से आदमी जिस वस्तु को निकाल लेता है, वही उसके काम की होती है न कि वह जो वहाँ जल जाती है इसी प्रकार यह संसार जरा-मरण से जल रहा है इसमें से दान देकर निकाल लो, जो दिया जाता है वह सुरक्षित होता है।
दान
यदि किसी को दूध नहीं पिला सकते तो छाछ देने में क्या हानि है? अन्न देने में समर्थ नहीं तो प्यासे को पानी तो पिला सकते हो।
दान
धन में अस्थिरता का स्वभाव होता है वह प्राप्त हो तो तुरन्त स्थिर धर्मों को सम्पन्न करना चाहिए।
दान
त्यागी व्यक्ति पहले धन का दान देता है बाद में प्राण त्याग करता है, कृपण पहले प्राण त्याग कर देता है बाद में धन।
दान
जिसमें उदारता है उसे वीरता की आवश्यकता नहीं है।
दान
उदार हृदय वाला पुरुष जब तक जीता रहता है तब तक आनन्द से ही रहता है और संकीर्ण हृदय वाला आयुपर्यंत दुःखी ही रहता है।
दान
सर्वस्व का त्याग मोक्ष है, मेरा मन मोक्ष चाहता है, यदि मुझे सब कुछ छोड़ ही देना है तो अच्छा है कि उसे प्राणियों को दे दिया जाय।
दान
जिस आदमी ने अपना सब कुछ दे दिया है, उसने दिया नहीं पाया है।
दान
धन का देना मित्रता का कारण है परन्तु वापस लेना शत्रुता का कारण है।
दान
प्रशंसा करने वालों के मुख पर सदा उन लोगों का नाम रहता है जो गरीबों को दान देते हैं।
दान
अप्रसिद्ध और अप्रतिष्ठित लोगों को प्रसिद्ध तथा प्रतिष्ठित बनाने में धन का दान जितना समर्थ है, उतना और कोई पदार्थ नहीं।
दान
चिन्ता से रूप, बल और ज्ञान का नाश होता है अर्थात् चिन्ता चिता बनाती है। जिसे नहीं करना चाहिए उसे करने से और जिसे करना चाहिए उसे नहीं करने से ही चिन्ता और भय होते हैं।
मन
जितना समय आप किसी कार्य की चिंता में लगाते हैं, यदि उतना ही समय आप उस कार्य में लगाएँ तो चिंता जैसी कोई चीज ही नहीं रह जाएगी।
मन
बिस्तर पर चिंताओं को ले जाना अपनी पीठ पर गट्ठा बाँधकर सोना है।
मन
चिन्ताओं से दूर भाग्यशाली व्यक्ति ही जीवन का आनन्द ले सकता है।
मन
सबसे ज्यादा हिंसा बुरा चिन्तन करने से होती है।
अहिंसा
उपहार का मूल्य बढ़ता जा रहा है और भावनाओं का अवमूल्यन हो रहा है।
विविध
किसी दिन अखबार नहीं मिले और चाय नहीं मिले तो पेट साफ नहीं होगा मतलब हम किसी वस्तु के नियंत्रण में हैं।
अनासक्ति
हमारी आदत के कारण हम स्वयं से ज्यादा अपने निकट के लोगों को परेशान करते हैं।
परिवार
कार्य करने के पहले सोचना चिंतन है बाद में सोचना चिंता है।
मन
मोह रहित अल्पज्ञान मोक्ष का कारण है मोह सहित बहुत ज्ञान संसार का कारण है।
ज्ञान
आप कैसे कृतघ्न बेटे हो जिस माँ ने दूध पिलाया उसे आप पानी भी नहीं पिलाना चाहते हो।
परिवार
आज आदमी को भोजन की भूख कम सम्मान की भूख ज्यादा सताती है।
विविध
जिस प्रकार ईंधन सहित अग्नि में वृद्धि होती है उसी प्रकार चिंता युक्त मनुष्य के संसार की वृद्धि होती है क्योंकि चिंता से कर्म बंध होता है। ‘‘दरिद्र को सदा अनेक प्रकार की चिंता होती हैं। जो होने वाला है वह होता है, जो नहीं होने वाला है, वह नहीं होता है इस प्रकार की निश्चित बुद्धि वाले को चिंता की बाधा नहीं सताती है।’’
मन
चक्रवर्ती का बेटा चक्रवर्ती नहीं होता क्योंकि सभी का अपना-अपना पुण्य होता है, अतः आप अपने बेटों की चिन्ता मत करो, वे अपना कर्म साथ में लाये हैं।
कर्म
आप जिसके कारण चिंता करते हो उसका कुछ नहीं बिगड़ता, पर आपका सब कुछ नाश को प्राप्त हो रहा है।
मन
चिंतन चिदानंद के पास ले जाता है और चिन्ता चिता के पास ले जाती है।
मन
समय से पहले बूढ़ा होना, समय से पहले मरना, अपनी प्रज्ञा को नष्ट करना अपने शारीरिक एवं मानसिक बल को नष्ट करना हो तो चिन्ता करो।
मन
चिंतारूपी गुप्तरोग से पीड़ित मनुष्य के लिए मित्र उत्कृष्ट औषध है क्योंकि उसके लिए युक्त अयुक्त सब कुछ कह दिया जाता है।
संगति
जिसका जितना विशाल चिंतन है उसके समीप चिन्ता परमाणु मात्र भी नहीं मिलती है।
मन
अपने को पर का और पर को अपना कर्त्ता मानने पर चिंता उत्पन्न होती है।
मन
चिन्ता से मस्तिष्क की नसें फूल जाती हैं, जिससे व्यक्ति ‘पागल’ हो जाता है।
मन
चिन्ता के दुष्परिणाम–१. मन का उदास रहना, २. बुद्धि का भ्रष्ट होना, ३. मस्तिष्क का भारीपन होना, ४. चेहरे का मुरझाना, ५. शरीर की शक्ति का क्षीण होना, ६. क्रोधी स्वभाव का होना, ७. बालों का सफेद होना, ८. समय से पूर्व वृद्धत्व का आगमन होना है।
मन
जितना विशुद्ध संयम होता जाता है, उतना ज्ञान का क्षयोपशम होता जाता है।
संयम
वैद्य और वक्ता दोनों ही धीरता से काम लेते हैं। ‘‘चिंता सब सुखों को नष्ट करती है।’’
मन
कल की चिंता करने वाले, आने वाले जन्म की चिंता नहीं कर पाते हैं।
मन
जब तक मन में विकल्प चलता है तब तक गुरु प्रभु कुछ भी नहीं दिखता है, विकल्प संसार बढ़ाने वाला है।
ध्यान
वृद्धाश्रम में माँ बाप की दुर्दशा को देखकर सब बेटों को कोसते हैं परन्तु सब भूल जाते हैं कि दुर्दशा करने में किसी की ‘बेटी’ का अहम् रोल होता है।
परिवार
क्या बताऊँ बहन जब बहू थी, तो अच्छी सास नहीं मिली और अब सास बनी तो अच्छी बहू नहीं मिली अर्थात् महिलाएँ प्रायः अपनी गलती न स्वीकार करना चाहती हैं और न सुधरना चाहती हैं।
परिवार
बचपन की यादों को अगर ठीक से सँजोकर रखा जाये तो वे बुढ़ापे का अच्छा सहारा बन सकती हैं।
विविध
आम आदमी को अपनी विचारधारा बदलनी होगी और ऐसे संगठनों से कारोबार करना होगा जहाँ भ्रष्टाचार और अनैतिकता न हो। यही समस्या का समाधान है।
विविध
दान के लिए वर्तमान ही सबसे उचित समय होता है।
दान
जब आपने किसी वस्तु का दान कर दिया तो फिर वह आपकी रही ही नहीं, तब उस पर आपके नाम की क्या जरूरत है ?
दान
दान हमारे समाज में बनाई गई एक सुन्दर व्यवस्था है, जो आर्थिक स्तर पर असमानता को पाटने में मदद करती है।
दान
जीवन में पहले दिन से कुछ न कुछ दान करने की आदत डालें, अगर आप दस हजार की आमदनी में दान नहीं कर सकते तो दस लाख होने पर भी नहीं कर पायेंगे। गुप्त दान को प्राथमिकता देनी चाहिए।
दान
दान की प्राथमिकता हमेशा हमारे नजदीकी परिजन, मित्र, कर्मचारी के प्रति पहले होनी चाहिए। देश में बहुत मात्रा में लोग आँखों की रोशनी से वंचित हैं।
दान
हर साल हजारों लोगों की मृत्यु जलने से होती है, जिन्हें नई त्वचा लगाकर बचाया जा सकता है। यह बहुत ही दूर-दृष्टि भरा साहसिक निर्णय है।
दान
प्रतिभा को तलाशना और प्रतिमा को तराशना अन्यथा जिंदगी ‘लाश’ से ज्यादा कुछ नहीं है।
विविध
दान बंधी मुट्ठी, ध्यान बंद दृष्टि करें।
दान
जिस प्रकार स्वाति नक्षत्र में उत्पन्न नीर यदि सीप में जाता है तो वह मोती बन जाता है और सर्प के मुख में जाता है तो विष बन जाता है, उसी प्रकार पात्र-अपात्र में दिया दान भी जानना चाहिए।
दान
हमें जो मिलता है, उससे हमारी जिन्दगी चलती है, जो देते हैं उससे जिन्दगी बनती है। दान देने से पहले अपने कमजोर भाई को सहारा दो क्योंकि भगवान् से ज्यादा आपके भाई को आवश्यकता है। स्वयं जाकर दिया गया दान उत्तम, अपने यहाँ बुलाकर दिया गया दान मध्यम और माँगने पर दिया गया दान अधम व सेवा के बदले दान देना निष्फल है।
दान
पूर्वाभिमुख होकर देना उत्तराभिमुख होकर लेने से दोनों की आयु बढ़ती है।
दान
जिसने कभी दान-पूजा नहीं की वह साधु बनकर भी दुःखी रहता है।
दान
जब हम किसी को कुछ भी देते हैं तो हमारे पास सच्चा और अच्छा है वह देना चाहिए।
दान
जिस मनुष्य ने सर्प की आयु का बंध कर लिया है, तो वह न स्वयं दान देता है और न किसी को दान देने देता है।
दान
यदि कोई दरवाजे पर माँगने आ जाए तो अपना सौभाग्य समझना चाहिए कि उसने आप को इस योग्य समझा।
दान