Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Diet & Ratri-bhojan

आहार

166 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

बहुत बार भोजन करने से शरीर की पुष्टि, कान्ति, उत्साह, प्रयोग और बल में कमी आती है। अतः अपनी शक्ति को देखते हुए भोजन करना चाहिए मान के वश होकर न बहुत अधिक और न बहुत कम ही भोजन करना चाहिए।
आहार
रात्रि भोजी सदा कुरूप, विकलांग, अल्पायु, रोग पीड़ित, भाग्यहीन और धरमहीन होता है तथा मरकर उल्लू, काक, बिलाव, गीध, सांवर, साँप बिच्छू तथा गोह होते हैं।
आहार
रात्रि भोजन के लोभी मनुष्य परभव में तिर्यंच तथा नरकादि गतियों में अन्धे बौने, विकलांग, अल्पायु, शोक, क्लेश, विषाद तथा दुःखों से परिपूर्ण कोढ़ आदि रोगों से सहित, दरिद्रता पीड़ित, अत्यन्त चंचल, अल्प आदर वाले होते हैं।
आहार
मांस खाने वाला जीव भव-भव में अल्पायु, विकलांग, रोगी, बहरा, दुर्जन, बौना, कोढ़ी और नपुंसक होता है।
आहार
भोजन, भजन और प्रवचन के पहले संक्लेश उत्पन्न होने वाली बात नहीं सुनना चाहिए।
आहार
रात्रि में जीवादि के न दिखने से पानी को पीना भी योग्य नहीं है और फिर पान सुपारी तथा फलादि का भोजन भष्य कैसे हो सकता है?
आहार
रात्रि में चारों प्रकार के आहारों का त्याग करने से आधे उपवास का फल जिनेन्द्र भगवान् ने कहा है–एक साल में १८३ उपवास का फल मिलता है।
आहार
भोजन सिर्फ आहार नहीं सेहत भी है, सिर्फ भोजन नहीं अमृत भी है, खाने के लिए नहीं किन्तु जीने के लिए खाए, जीभ जो माँगे वह न दें, पेट जो माँगे वह दें।
आहार
समाधि के समय सबसे अशुद्ध विकल्प करने वाली आहार संज्ञा है।
आहार
रात्रि के समय पर्व में अथवा अन्य अवधि तक या जीवनपर्यंत के लिए इन्द्रियों को वश में करने के लिए व स्वर्ग-मोक्ष सुख हेतु भोजन विषयक नियम अवश्य करें।
आहार
शुद्धि की विधि बताने के अतिरिक्त कभी भी भोजन कथा मत करो।
आहार
स्वस्थ मन के लिए सात्विक भोजन करें- अच्छे स्वास्थ्य का एक रहस्य सदैव थोड़ा भूखा रहना है, पर्याप्त मात्रा में पानी, सब्जियां, फल लेवें, वस्त्र आदि वस्तुओं की व दांत, नाखून आदि अङ्गों की सफाई रखें।
आहार
नमक व मीठा निकाल दिया जाय तो शेष स्वाद अपने आप छूट जाते हैं।
आहार
समुद्र ने नहीं शराब ने अधिक लोगों को डुबाया है, जब शराब का प्रवेश होता है तो बुद्धि बाहर निकल जाती है।
आहार
संसार की सारी सेनायें मिलकर इतनी सम्पति नष्ट नहीं करतीं जितनी अकेली शराब नष्ट करती है।
आहार
शरीर को भोजन दो वेतन जैसा, आत्मा को भोजन दो चिन्तन जैसा, अधिक खाने से चर्बी बढ़ती है, बुद्धि नहीं।
आहार
नींद, नशा और तेज रफ्तार दुघर्टना के कारण हैं।
आहार
भोजन को प्रसाद मानकर ग्रहण करो जो अन्दर बैठे परमात्मा को चढ़ाया जा रहा है, नैवेद्य प्रसन्नता पूर्वक चढ़ाया जाता है।
आहार
भारतीय समयानुसार पूर्णाहार का श्रेष्ठ काल दिन दस बजे से दो बजे तक है।
आहार
मांसभोजी शाकाहारी से सात गुना ज्यादा खर्चीला होता है और छः वर्ष अल्प जीता है।
आहार
जैसा व्यक्ति अन्न खाता है वैसी बुद्धि होती है, जैसे दीपक अन्धकार खाता है तो काजल का वमन करता है।
आहार
'मांस' खाने वाला जीव भव-भव में अल्पायु, विकलाङ्ग, रोगी, नेत्र रहित, बहरा, दुर्जन, छोटे कद का, कोढ़ी और नपुंसक होता है।
आहार
कोई कहता है कि मांस जीव का शरीर है और फल-शाक आदि भी जीव का शरीर है, फिर मांस अखाद्य है और फल आदि खाद्य क्यों है? इसके उत्तर में कहा गया है कि मांस तो जीव का शरीर है पर जीव का शरीर मांस हो, ऐसा नियम नहीं है, त्रस जीव का शरीर मांस है पर स्थावर का शरीर मांस नहीं है, जैसे पिता पुरुष ही है पर सब पुरुष पिता नहीं होते हैं।
आहार
जो अन्न मात्र अग्नि पर पकाया गया है अथवा घी मिलाकर पकाया गया है, मांस भक्षण का त्यागी मनुष्य उस अन्न को बासी नहीं खावें, जहाँ मांस का दोष होने से बासा अन्न आदि भक्ष्य नहीं है वहाँ मदिरा, मुरब्बा तथा अचार आदि की कथा ही क्या है?
आहार
जो पदार्थ भक्षण करने/खाने योग्य नहीं होते हैं, उन्हें अभक्ष्य कहते हैं, इसके पाँच भेद हैं- त्रस हिंसाकारक, बहुस्थावर हिंसाकारक, प्रमादकारक, अनिष्ट और अनुपसेव्य।
आहार
जिस पदार्थ के खाने से त्रस जीवों का घात होता है, उसे त्रस हिंसाकारक अभक्ष्य कहते हैं, जैसे पञ्च उदम्बर फल, घुना अन्न, अमर्यादित वस्तु जिनमें बरसात में फफूँदी लग जाती है, चौबीस घण्टे के बाद का मुरब्बा, अचार, बरी, पापड़ और द्विदल आदि के खाने से 'त्रस जीवों का घात' होता है, दूध में या दूध से बने हुए दही आदि में दो दाल वाले मूँग, उड़द, चना आदि अन्न की बनी चीज मिलाने से द्विदल बनता है।
आहार
जिस पदार्थ के खाने से अनन्त स्थावर जीवों का घात होता है उसे 'स्थावर हिंसाकारक' अभक्ष्य कहते हैं जैसे- प्याज, लहसुन, आलू, मूली आदि कन्दमूल तथा तुच्छफल खाने से अनन्त स्थावर जीवों का घात होता है।
आहार
माँस के त्यागी पुरुषों के द्वारा घुना अन्न, गोभी आदि पत्तियों का शाक, मक्खन, जमीकन्द, मूली तथा चमड़े के पात्र में रखा हुआ पानी आदि भी छोड़ा जाता है।
आहार
अवन्ती देश में चण्ड नामक चाण्डाल मांस का त्याग करने से मरकर यक्षों का प्रधान हुआ था।
आहार
जिसके खाने से प्रमाद या काम विकार बढ़ता है वे 'प्रमाद कारक' अभक्ष्य हैं जैसे- शराब, भाँग, तम्बाकू, गाँजा और अफीम आदि नशीली चीजें, ये स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक हैं।
आहार
जो पदार्थ भक्ष्य होने पर भी अपने लिए हितकर न हों वे 'अनिष्ट' हैं जैसे- शीतज्वर वाले को हलुआ एवं जुकाम वाले को दही, लस्सी आदि ठण्डी चीजें हितकर नहीं हैं।
आहार
जो पदार्थ सेवन करने योग्य न हों वे 'अनुपसेव्य' हैं जैसे- लार, मूत्र आदि पदार्थ।
आहार
जो मद्य, मांस, मधु, पाँच उदम्बर फल एवं रात्रि भोजन का त्यागी होता है, वह ब्राह्मण कहलाता है।(महाभारत शान्ति पर्व)
आहार
विस्तार से अभक्ष्य के बाईस भेद भी हैं- ओला घोर बड़ा निशि भोजन, बहुबीजा बैंगन संधान। बड़, पीपर, ऊमर, कठऊमर, पाकर फल जो होय अजान। कन्दमूल माटी विष आमिष, मधु माखन अरु मदिरापान। फल अतितुच्छ तुषारचलित रस, ये बाईस अभक्ष्य बखान।। ओला, दहीबड़ा, रात्रि भोजन, बहुबीजा, बैंगन, चौबीस घण्टे बाद का अचार, बढ़, पीपल, ऊमर, कटूमर, पाकर, अजानफल (जिसको हम पहचानते नहीं ऐसे कोई फल, पत्ते आदि फास्ट फूड भी अजान फल जैसे ही हैं), कन्दमूल (मूली, गाजर आदि जमीन के भीतर लगने वाले), मिट्टी, विष (शङ्खिया, धतूरा आदि), आमिष(मांस), शहद, मक्खन, मदिरा, अतितुच्छ फल (जिसमें बीज नहीं पढ़े हों ऐसे बिल्कुल कच्चे छोटे-छोटे फल), तुषार-बर्फ और चलित रस (जिनका स्वाद बिगड़ जाये ऐसे फटे हुए दूध आदि) ये सब अभक्ष्य हैं। दहीं बिलोने के बाद मक्खन को निकाल कर तत्काल गर्म कर लेना चाहिए अन्यथा वह अभक्ष्य हो जाता है अथवा कच्चे दूध से भी जो यन्त्र से मक्खन निकाला जाता है, उसमें भी कच्चे दूध की मर्यादा 48 मिनट की है, उसी मर्यादा के अन्दर मक्खन निकाल कर जल्दी से गर्म करके घी बना लेना चाहिए। बाजार की बनी हुई चीजों में मर्यादा का विवेक न रहने से और अनछने जल आदि से बनाई जाने से सब अभक्ष्य हैं, अर्क, आसव (शीरा), शर्बत आदि भी अभक्ष्य हैं, चमड़े में रखे घी, हींग, पानी आदि भी अभक्ष्य हैं, इसलिए इन अभक्ष्यों का त्याग कर देना चाहिए।
आहार
नरक के चार द्वार हैं रात्रिभोजन, परस्त्रीगमन, अचार भक्षण और जमीकन्द भक्षण।
आहार
सूर्य के अस्त हो जाने पर पानी खून कहलाता है एवं अन्न को वैष्णव मार्कण्डेय महर्षि ने मांस के समान कहा है।
आहार
चातुर्मास में जो रात्रि में भोजन करता है उसकी चन्द्रायण व्रत अर्थात् कृष्ण पक्ष के चन्द्रमा की कलाओं के समान एक-एक ग्रास घटाना और शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की कलाओं के समान एक-एक ग्रास को बढ़ाना एक चन्द्रायण व्रत कहलाता है ऐंसे सैकड़ों व्रत करने से भी शुद्धि नहीं हो सकती है।
आहार
भोजन के साथ पेट में मक्खी जाने से उलटी होती है, चींटी जाने से पेशाब में जलन होती है, बाल जाने से स्वर भंग होता है, जुंआ-लीख जाने से जलोदर रोग होता है, मकड़ी जाने से कोढ़ होता है, छिपकली जाने से मृत्यु होती है, इसलिए भोजन में सूर्य का प्रकाश विवेक और शोधन क्रिया आवश्यक है।
आहार
अहिंसा व्रत की रक्षा व मूलगुण की शुद्धि के लिए धीरपुरुष मन-वचन-काय से रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग करें।
आहार
जो स्वभाव से रात्रिभोजन का त्याग करता है, वह अपने कुल के आभूषणपने को व तीन जगत के स्वामियों की सम्पदा को प्राप्त होता है।
आहार
रत्नत्रय से परिपूर्ण तथा अणुव्रतों को धारण करने में तत्पर भव्य जीव सूर्योदय के रहते दोष रहित भोजन करते हैं।
आहार
जो दयालु पुरुष रात्रि में भोजन नहीं करते, वे वैमानिक देव होते हैं और वहाँ उत्कृष्ट भोगों को प्राप्त करते हैं और स्वर्ग से आकर प्रशंसनीय मनुष्य पर्याय प्राप्त कर चक्रवर्ती आदि के वैभव से प्राप्त सुख का उपभोग करते हैं।
आहार
जगत् में जो धनवान, गुणों से उदार, सुन्दर, दीर्घायु, सम्यग्ज्ञान से सहित और प्रधान पद पर स्थित हैं वे सब दिन में भोजन करने से हुए हैं।
आहार
जो दिन में भोजन करते हैं, वे सूर्य के समान प्रभा वाले, चन्द्रमा के सामान सौम्यदर्शन तथा स्थायी भोगों से युक्त होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य संसार में उत्कृष्ट प्रताप से युक्त, नगरों के स्वामी, नाना प्रकार के वाहनों से सहित, सामन्तों से पूजित, भवनवासी देव, वैमानिक देव, चक्रवर्ती के वैभव से सहित और उत्कृष्ट लक्षणों से सम्पन्न होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य उन नगरियों में ऐसे विद्याधर राजा होते हैं, जो कलाओं में निपुण हैं, जिनके शरीर, नेत्र और हृदय में स्नेह उत्पन्न करने वाले हैं, जो अमृत झराने वाली वाणी से समस्त जगत् को आह्लादित करते हैं तथा उत्साह से युक्त होते हैं, दिन में भोजन करने से मनुष्य नारायण, बलदेव, चक्रवर्ती, बिजली और लाल कमल के समान कान्ति वाले देदीप्यमान सुन्दर कुण्डलों से युक्त एवं राजाओं से सम्बन्ध करने वाले होते हैं।
आहार
दया में तत्पर रहने वाले जो लोग रात्रि में भोजन नहीं करते हैं उन्हें सेवकों के द्वारा तैयार किया हुआ इच्छानुकूल भोजन प्राप्त होता है।
आहार
जो लोग रात्रिभोजन से दूर रहते हैं, वे शान्त हृदय, ब्रह्मचर्य सहित तथा साधु समूह के लिए हितकारी होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से स्त्रियाँ श्रीकान्ता, सुप्रभा तथा सुभद्रा के समान लक्ष्मी तुल्य कान्ति वाली होती हैं।
आहार
जिन्होंने पहले रात्रि भोजन का त्याग किया था वे स्त्रियाँ यान तथा हाथी आदि वाहनों पर लीलापूर्वक गमन करती हैं और सुन्दर भवनों में निवास करती हैं, वे स्त्रियाँ स्वर्ग में इच्छानुकूल भोग को प्राप्त होती हैं, तथा मस्तक पर हाथ रख आज्ञा की प्रतीक्षा करने वाले परिवार से घिरी रहती हैं।
आहार
जिन पुरुषों ने पहले रात्रिभोजन का त्याग किया है, वे सुरीली आवाज वाले, निर्मल शरीर से युक्त तथा सुन्दर वस्त्राभूषणों से सहित मनुष्य होते हैं, इस लोक में जो सुन्दर राजा दिखाई देते हैं, वह सब निःसन्देह रात्रिभोजन त्याग का ही फल है।
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जो मनुष्य सूर्यास्त हो जाने पर भोजन करते हैं, वे विद्वानों के द्वारा मनुष्यता से युक्त पशु कहे गये हैं।
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जो रात्रि में भोजन करता है, वह अल्पआयु, अल्पधन से युक्त, रोग से पीड़ित और परभव में सुख से हीन होता है।
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जो दुर्बुद्धि रात्रि में भोजन करता है, वह हजारों उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल तक खोटी योनियों में दुःख को प्राप्त होता है।
आहार
रात्रि में भोजन करने से पुरुष स्त्री वेद को प्राप्त होते हैं, और वे स्त्रियाँ अनाथ, सौभाग्यहीन, माता-पिता तथा भाई से रहित, शोक एवं दरिद्रता से युक्त होती हैं, जिनके हाथ-पैर आदि अङ्ग रूक्ष तथा फटे हुए हैं, जिनकी नाक चपटी है, जिनका देखना ग्लानि को उत्पन्न करता है, जिनके नेत्र कीचड़ से भरे हैं, जिनके लक्षण दुष्ट हैं, जिनके शरीर से दुर्गन्ध आती है, जिनके होठ कटे तथा मोटे हैं, जिनके कान विरूप हैं, जिनके केश पीले तथा रूक्ष हैं, जिनके दाँत तूमड़ी के बीज के समान हैं, शरीर सूखा है, जो कानी, लंगड़ी और कान्ति रहित हैं, विरूप हैं, कठोर चमड़ी वाली हैं, अनेक रोगों से सहित हैं, मलिन हैं, फटे वस्त्र वाली हैं, खराब भोजन से जीवित हैं, दूसरों के कार्य पर आश्रित हैं, दुःखों के भार से दबी हुई हैं, बाल्यावस्था में ही पति के मरण के दुःख से दुःखी हैं, पानी भरती हैं, लकड़ियाँ ढोती हैं, बड़े दुःख से पेट भर पाती हैं, सब लोगों से तिरस्कृत हैं, कुवचन रूप वसूला से जिनका मन नष्ट हो गया है, तथा शरीर सैकड़ों घावों का आधार है, ऐसी स्त्रियाँ रात्रिभोजन करने से ही होती हैं।
आहार
रात्रिभोजन में तत्पर लोग कटेकान, कटीनासिका, धन तथा बन्धुओं से रहित पति को प्राप्त होते हैं, जो रूक्ष शरीर वाले दास दासी आदि हैं, जो पुत्र, पत्नि और पति आदि से रहित हैं और जो दुर्भाग्य रूपी ग्रह से ग्रस्त हैं, वे रात्रिभोजन से ही होते हैं।
आहार
रात्रिभोजन के पाप से जीव दुर्गति को प्राप्त होते हैं, लोक में जो रोगी, दरिद्र और क्रूर पुरुष दिखाई देते हैं, वे भी रात्रिभोजन के पाप से दिखाई देते हैं, जिनके हाथ-पैर फटे हैं, जो दीन हैं, लकड़ी और घास ढोते हैं, मलिन वस्त्र वाले हैं तथा नीच कुल में उत्पन्न हैं, वे सब रात्रिभोजन करने से ही होते हैं, रात्रिभोजन के फल से मनुष्य रोग से पीड़ित, दूसरों के घरेलू नौकर तथा अपने बन्धुजनों से रहित होते हैं, रात्रि में भोजन करने वाला मिथ्यादृष्टि मनुष्य सूकर, भेड़िया, बिलाव, उल्लू तथा कौआ आदि की योनियों में उत्पन्न होता है।
आहार
भोजन की तीव्र लालसा रखने वाला जो पापी जीव सूर्य के अस्त हो जाने पर भी भोजन करता है, वह दुर्गति को नहीं जानता, यह नहीं समझता कि इस रात्रिभोजन के पाप से मुझे नरकादि
आहार
अन्धकार के समूह से जिसके नेत्र आच्छादित हो रहे हैं, तथा पाप में जिसकी बुद्धि लग रही है, ऐसा पापी जीव मक्खी, कीड़े तथा बाल आदि को खा जाता है।
आहार
जो रात्रिभोजन करता है, वह डाकिनी-शाकिनी तथा भूत-प्रेतादि निन्द्य प्राणियों के साथ खाता है।
आहार
जो रात्रि में खाता है उसने कुत्ता, चूहा, बिल्ली आदि मांसाहारी जीवों के साथ खाया, अथवा व्यर्थ के विस्तार से क्या? इतना ही कहा जाता है, कि रात्रि में खाने वाले ने सब अपवित्र पदार्थ खाये, रात्रि में दीपकों के ऊपर जो चींटी आदि जीव पड़ते हैं, रात्रि में खाने वाले पुरुष ग्रासों के साथ उन्हें भी निगल जाते हैं।
आहार
जिन लोगों ने रात्रिभोजन रूप अधर्म को धर्म मान रखा है, उन पापकर्म से क्रूर मनुष्यों को समझाना कठिन है।
आहार
सूर्य की किरणों से अछूता भोजन प्रेतों के समूह से जूठा हो जाता है, तथा सूक्ष्म जीवों से युक्त होता है, अत: रात्रि में खाना उचित नहीं है।
आहार
जो रात-दिन खाता है ''वह जिनधर्म से विमुख'', व्रतरहित व नियम से दूर है, ऐसा मनुष्य पर भव में सुखी कैसे हो सकता है?
आहार
रात्रिभोजन के लोभी मनुष्य परभव में तिर्यञ्च तथा नरकादि गतियों में अन्धे, बौने, अत्यन्त विकलाङ्ग, अल्पायु, शोक, क्लेश, विषाद तथा दुःख से परिपूर्ण, कोढ़ आदि रोगों से सहित, दरिद्रता से पीड़ित अत्यन्त चञ्चल और अल्प आदर वाले नियम से होते हैं।
आहार
रात्रि में अन्न के बर्तन तथा अग्नि आदि में अनेक जीव पड़ते हैं, जिससे मांस खाने का दोष तथा हिंसा होती है, अत: रात्रिभोजन छोड़ने के योग्य है।
आहार
महावीर की कहानी- पुरूरवा भील ने मद्य, मांस, मधु के त्याग से प्रारम्भ की, और बढ़ते–बढ़ते तीर्थंङ्कर महावीर बन गया।
आहार
ओला घोर बड़ा निशिभोजन बहुबीजा बैंगन सन्धान, बड़ पीपर ऊमर कठऊमर पाकर फल जो होय अजान। कन्दमूल माटी विष आमिष मधुमाखन अरु मदिरापान, फल अतितुच्छ तुषार चलितरस ये बाईस अभक्ष्य बखान।।
आहार
एक बार खाय सो योगी, दो बार खाय सो भोगी। तीन बार खाय सो रोगी, चार बार खाए तो जल्दी मृत्यु होगी।।
आहार
घर में भाई का जूठा नहीं खायेगें होटल में और वफर में जूठा खायेंगे, घर में वासी वस्तु नहीं खायेगें होटल में कई दिन पुरानी मेंदा इत्यादि की वस्तुयें खायेंगें।
आहार
जो जिह्वालोभी मूर्ख मनुष्य भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार नहीं करता है, वह दुर्बुद्धि अभक्ष्य खाकर दुर्गति को प्राप्त होता है।
आहार
यथायोग्य निर्दोष आहार करना अच्छा है, परन्तु मासोपवास आदि की पारणा में सदोष आहार करना अच्छा नहीं है।
आहार
एक बार ही प्राणों का नाश करने वाला हालाहल विष खा लेना अच्छा है, परन्तु सदोष आहार लेना अच्छा नहीं है, क्योंकि वह संसार सागर में गिराने वाला है।
आहार
पेट को नगर पालिका का कचरा घर या कब्रिस्तान नहीं बनाना चाहिए।
आहार
जिसका खान-पान शुद्ध नहीं होता है उसका खानदान शुद्ध नहीं होता है।
आहार