गुणा गुणज्ञेषु गुणी भवन्ति, ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः। सुस्वादुतोयाः प्रवहन्ति नद्यः, समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः।।
गुण गुणवानों को पाकर गुणी हो जाते हैं और गुणहीन को पाकर दोष रूप परिणमन कर जाते हैं जैसे कि मीठे जल वाली नदियाँ समुद्र में मिलकर खारी हो जाती हैं।
Virtues, meeting the virtuous, become virtues, but meeting the virtueless they turn into faults — just as rivers of sweet water, on reaching the sea, become undrinkable.
— आराध्य सूत्र · #7
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