Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

दुर्जनजनसंसर्गात्, साधुजनश्चापि दोषमायाति। दसमुख कृतापराधे, जलनिधिरपि बन्धनं प्राप्तः।।

दुर्जनों की सङ्गति से साधु जनों में भी दोष आ जाते है जैसे कि रावण के सीता हरण करने पर समुद्र को भी बन्धन प्राप्त हुआ था।

Through the company of the wicked, faults enter even the good — just as, when Ravana (the ten-faced one) committed his crime, even the ocean was put in bondage.

— आराध्य सूत्र · #4

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति