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जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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संगति

452 सूत्र · पृष्ठ 4 / 7

सत्संग करने से भीतर का शैतान भाग जाता है।
संगति
सत्संग आत्म जागरण के लिए है, साम्प्रदायिक संगठन और प्रदर्शन के लिए नहीं।
संगति
सत्संग का फल उसे ही मिलता है, जो व्यसनों और कुव्यक्तियों का त्याग करता है।
संगति
सत्संग के लिए शास्त्र को छोड़ना पड़े तो कोई बात नहीं क्योंकि सत्संग से अज्ञान पलभर में समाप्त हो जाता है।
संगति
खराब संगति में रहने से तो अच्छा है कि आप अकेले ही रहें।
संगति
दुर्जन के संग से बढ़कर और कोई दुःख नहीं है।
संगति
मुझे बताइये आपके संगी-साथी कौन हैं? मैं बता दूँगा, आप कौन हैं?
संगति
जो व्यक्ति उच्च विचारों की सुखद संगति में रहते हैं, वे कभी अकेले नहीं रहते हैं।
संगति
बच्चा जितना सिखाने से नहीं सीख पाता उतना आस-पास के परिवेश से स्वयं सीख लेता है, अतः परिवेश अच्छा होना चाहिए।
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सन्त का क्रोध भी कल्याणकारी होता है, जबकि दुष्ट का प्यार भी दुःख देने वाला होता है, सन्त अगर गुस्सा करके डाँट भी दें तो समझ लेना चाहिए कि इसमें भी भला है, दुष्ट आदमी प्यार की बात भी करे तो उसके प्यार में कुछ न कुछ मुसीबत छुपी होगी।
संगति
जिस प्रकार स्वभाव से शीतल जल अग्नि की संगति से उष्ण हो जाता है उसी प्रकार कायर पुरुष भी वीर पुरुष के आश्रय (संगति) से वीर हो जाता है और वीर पुरुष भी कायर की संगति (आश्रय) से कायर हो जाता है।
संगति
बगैर सत्संग के आत्मा में बसा अमृत सूख जाता है।
संगति
दुर्जन की संगति करने से सज्जन का भी महत्त्व गिर जाता है, जैसे कि मूल्यवान माला मुर्दे पर डाल देने से निकम्मी हो जाती है।
संगति
जो नीच पुरुषों के संग रहते हैं ज्ञानी जनों का सत्संग नहीं करते, वे कृष्णपक्ष के चंद्रमा के समान निरंतर हीन होते जाते हैं।
संगति
सत्संग में बिना कुछ किए उन्नति होती है और कुसंग में बिना कुछ किए पतन होता है। भगवान् में प्रेम होना भी सत्संग है और नाशवान का प्रेम (मोह) छूटना भी सत्संग है। हर हाल में खुश रहने की विद्या सत्संग से ही मिलती है।
संगति
सच्ची बात को मान लेना, यह सत्संग है।
संगति
जैसे भीतर अग्नि कमजोर हो तो भोजन पचता नहीं, ऐसे ही भीतर लगन न हो तो सत्संग की बातें पचती नहीं।
संगति
व्यापार में तो लाभ और नुकसान दोनों होते हैं, पर सत्संग में लाभ-ही-लाभ होता है, नुकसान होता ही नहीं।
संगति
अज्ञानी से दूर व ज्ञानी के निकट रहने से मंगल होता है।
संगति
सत्पुरुषों के दर्शन व समागम का लाभ लेना ही ज्ञानी पुरुष का लक्षण है।
संगति
सफल लोगों की संगति आपकी सफलता का अहम् हिस्सा है।
संगति
जिन पुरुषों के यश और मान का लोभ अधिक हो, उनके साथ मुमुक्षु पुरुष को कभी नहीं रहना चाहिए क्योंकि उसके साथ में या तो उल्लू बनकर रहना होगा या अपमान सहना होगा और उसे भी यश का पिशाच लग जावेगा तथा प्रशंसा का आसक्त निर्दय चित्त होता है।
संगति
अनेक त्यागियों और धर्मात्माओं के बीच रहकर अपने को अकेला देखता हुआ प्रसन्न रह करके जीवन बिता, आज के युग में बाह्य में अकेला मत रह अन्तरङ्ग में अकेला रह, बहुत पुरुषों के समागम में कषाय वृद्धि और समाधिहीनता का भय है तो समागम छूटने में संयम हीनता का भय है, इस काल में समागम बहुत सहायक है।
संगति
मुमुक्षु पुरुष जब-जब अपने से विशेष पुरुष से मिले, उसके समागम और आज्ञा में रहे।
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दुर्जन की संगति से सज्जन को भी दोष लगता है और आपत्ति भोगनी पड़ती है।
संगति
हम सत्संग ढूँढते हैं क्योंकि आत्मा की वही खुराक है।
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संसार से पीछा छुड़ाना है तो पीछी पकड़ो या पीछी वालों को पकड़ो इससे ही आप पतित से पावन बन सकते हो।
संगति
कल्पवृक्ष संकल्पित वस्तु को देता है, प्रसिद्ध कामधेनु इच्छित वस्तु को ही पूर्ण करती है और चिन्तामणि चिन्तित वस्तु को ही देता है परन्तु सत्संगति समस्त वस्तुओं को देती है। ऐसी संगति करना जिससे वैभव बढ़े या ना बढ़े पर भव अवश्य घटे और वीतराग शासन पर श्रद्धा बढ़े।
संगति
संत समागम पाने वाला भले ही सन्त बने या न बने पर संतोषी अवश्य बनता है।
संगति
गुणीजनों के संसर्ग से सद्गुणों में वृद्धि होती है शील संयम का पालन होता है, मन की चंचल वृत्ति का निरोध होता है, कुभाषण, कुकर्म, कुचिन्तन नहीं होता है।
संगति
सम्यग्दर्शन से रहित, मार्ग से च्युत, व्यसनी एवं दुष्टजनों का संग छोड़ देना चाहिए, दुर्जनों, मूर्खों की संगति पद-पद पर दुःखदायी होती है।
संगति
जिस प्रकार कामवासना व्यक्ति की बुद्धि का नाश कर देती है, उसी प्रकार कुसंगति व्यक्ति का जीवन नष्ट कर देती है।
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दुर्जनों की संगति की अपेक्षा अकेले जीवन व्यतीत करना अच्छा है।
संगति
अच्छी संगति अच्छा सोचने की पक्की गारंटी है।
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जो तप करें या न करें किन्तु वृद्धजनों की उपासना करते हैं वे मनुष्य संकटरूपी जंगल को पार कर पवित्र गति को प्राप्त होते हैं।
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शील की रक्षा के लिए वृद्धजनों (गुणी जनों) की संगति करना चाहिए, वृद्ध सेवा पाप नष्ट करती है, हृदय को पवित्र करती है, क्रोध का नाश करती है, विनय को बढ़ाती है, सभी इष्ट की सिद्धि कराती है।
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आपका सलाहकार कौन है ये बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि दुर्योधन शकुनि से सलाह लेता था और अर्जुन श्रीकृष्ण से।
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परिचितों के साथ रहने से राग बढ़ता है और अपरिचित रहने से विशुद्धि बढ़ती है, इसलिए मुनि लोग परिचय नहीं बढ़ाते, वे अपरिचित रहते हैं।
संगति
साधु संसर्ग दोष से विकार को प्राप्त नहीं होते हैं जैसे चंदन सर्पों द्वारा वेष्टित होने पर भी विष रूप नहीं होता है।
संगति
साधु का दर्शन पुण्य के लिए होता है क्योंकि साधु तीर्थरूप होता है, तीर्थ तो समय पाकर फल देता है परन्तु साधु समागम शीघ्र ही फल देता है।
संगति
पानी अपने में रहता है तो स्वच्छ और शीतल होता है किन्तु पर के संपर्क से स्वच्छता शीतलता दोनों नष्ट होती हैं।
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अग्नि और दर्पणवत् दूरी बनाकर गुरु का लाभ लो।
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साधु की सेवा संसार से पार लगाती है।
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जैसे सीप में प्रवेश करने वाली पानी की बूँद मोती बनकर चमकती है, वैसे गुरु आज्ञानुवर्ती शिष्य सौभाग्य से समाहित होकर संसार में शोभित होता है।
संगति
गुरु का शिष्य बन जाना कठिन नहीं, अपितु गुरु के हृदय में स्थान प्राप्त करना कठिन है, जो मात्र गुरु भक्ति एवं समर्पण से ही संभव है।
संगति
भिन्न-भिन्न देश में जाति, कुल में उत्पन्न जो मनुष्य जिनशासन के भक्त हैं वे विद्वानों के द्वारा परस्पर भाई माने गये हैं।
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कुछ व्यक्तियों से भेंट अच्छी होती है किन्तु सहवास अच्छा नहीं होता, कुछ का सहवास अच्छा रहता है, भेंट नहीं, कुछ से भेंट भी अच्छी होती है और सहवास भी, कुछ का न सहवास अच्छा होता और न ही भेंट अच्छी होती है।
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अज्ञानी व्यक्ति की संगति नरक के समान है।
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धनिकों के लिए दूसरी निधियाँ हैं परन्तु सज्जनों के लिए गुणी मनुष्यों की समीपता ही श्रेष्ठ निधि है। श्रेष्ठ की संगति किसका बल नहीं बढ़ाती है?
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सत्संग से उत्पन्न मरण भी मनुष्यों का उद्धार कर देता है।
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महान् पुरुषों की संगति निश्चय ही महान् फल देती है।
संगति
सत्संगति बुद्धि की जड़ता को हटाती है, वाणी में सत्य का संचार करती है, सम्मान की वृद्धि करती है, पापों को दूर करती है, चित्त को प्रसन्न करती है और दसों दिशाओं में कीर्ति फैलाती है, बताओ सत्संगति मनुष्य के लिए क्या नहीं करती है? सज्जनों का संग स्वर्ग में वास के समान है।
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प्रेम करने वाला पड़ोसी दूर रहने वाले भाई से अच्छा है।
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सत्संगति का बड़ा प्रभाव पड़ता है, जो लोग साथ-साथ उठते बैठते हैं उनकी नैतिकता तथा चारित्र का स्तर भी समान हो जाया करता है, किसी व्यक्ति का चारित्र इतना सबल नहीं होता कि वह अपने आसपास की स्थितियों से प्रभावित न हो।
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जो लोग धर्म करते-करते वृद्ध हो गये हैं, उनकी तुम भक्ति करो तथा मित्रता प्राप्त करने का यत्न करो क्योंकि यह महान् सौभाग्य की बात है।
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आदमी की बुद्धि का सम्बन्ध तो उसके मस्तिष्क से है परन्तु उसकी प्रतिष्ठा तो उन लोगों पर पूर्ण अवलम्बित है, जिनकी संगति में वह रहता है।
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बुद्धिमान यद्यपि स्वयमेव सर्वगुण सम्पन्न होते हैं, फिर भी वे पवित्र पुरुषों के सुसंग को 'शक्ति का स्तम्भ' समझते हैं।
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अच्छी संगति से बढ़कर आदमी का सहायक और कोई नहीं है और कोई वस्तु इतनी हानि नहीं पहुँचाती, जितनी की दुर्जन की संगति।
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एकता से हमारा अस्तित्व कायम रहता है और विभाजन से हमारा पतन होता है।
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आपको यदि संसार में सुखी रहना है तो समझौता करना सीख लो।
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एकता रहित समाज बिना शक्कर की चाय के समान है।
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जलती हुई लकड़ियाँ अलग होने पर धुँआ फेंकती हैं और एक साथ रहने पर प्रज्वलित हो उठती हैं ठीक इसी प्रकार जातिबंधु से फूट होने पर दुःख और एकता रहने पर सुख प्राप्त होता है।
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यदि नौकर के साथ अच्छा व्यवहार किया जाए तो बदले में वे भी मालिक को आत्मीय प्यार दे सकते हैं।
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शान्ति को डंडे के बल पर स्थिर नहीं किया जा सकता, वह तो केवल पारस्परिक समझौते से ही लाई जा सकती है।
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संगठन आधुनिक युग का एक कारगर हथियार है।
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संगठन के द्वारा छोटे-से-छोटे लोग भी बड़े से बड़ों को मात दे सकते हैं।
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निर्बलों को बलवान बनाना हो तो संगठन का मन्त्र फूँक दो।
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यद्यपि शहद की मक्खियाँ कमजोर होती हैं, फिर भी वे सब मिलकर मधु निकालने वाले का प्राण तक ले लेती है, वैसे ही निर्बल पुरुष भी इकट्ठे होकर बलवान् शत्रु का नाश कर सकते हैं।
संगति
यदि कोई हजार रुपये का नोट दे तो सभी लेने को तैयार हो जाते हैं किन्तु यदि वह उस नोट के टुकड़े-टुकड़े कर दे और फिर दे तो कोई लेने को तैयार नहीं होता इसका अर्थ अखंड की कीमत है, अखंड में शक्ति है, अतः हम सभी को एक होकर रहना चाहिए।
संगति
तख्त पर नहीं, वक्त पर एकता की और संगठन की सक्त जरूरत होती है।
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संगठन में शक्ति है, अतः अपने सच्चे साथी बनाइये।
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संगठन, एकता वह शक्ति है, जिसके माध्यम से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
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इस युग में संघ में ही शक्ति निहित है और संघ-निर्माण संस्थाओं को बनाकर ही किया जा सकता है।
संगति
दिल से दिल न मिले पर हाथ से हाथ मिलाते रहे तो समर्पण का मार्ग खुल सकता है।
संगति
उस जाति की स्थिति कितनी दयनीय है जो परस्पर वैमनस्य के कारण कई सम्प्रदायों में बँट चुकी है और हर सम्प्रदाय स्वयं को एक जाति मानने लगा है।
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