Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

दुर्जनेन समं सख्यं, प्रीतिं चापि न कारयेत्। उष्णो दहति चाङ्गारः, शीतः कृष्णायते करं।।

दुर्जनों के साथ मित्रता और प्रीति दोनों ही नहीं करनी चाहिये क्योंकि अङ्गार गरम होता है तो जलाता है और ठण्डा होता है तो हाथ काला करता है।

One should form neither friendship nor affection with the wicked, for a coal when hot burns the hand and when cold blackens it.

— आराध्य सूत्र · #9

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति