Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

अणुरप्यसतां सङ्गः, सद्गुणं हन्ति विस्तृतं। गुण रूपान्तरं याति, तक्र योगाद् यथा पयः।

थोड़ी भी दुर्जनों की सङ्गति महान सद्गुणों का नाश करती है जैसे कि छाछ के संयोग से दूध अपना स्वभाव छोड़ देता है।

Even a little company of the wicked destroys great virtues, just as milk, on contact with buttermilk, abandons its own nature.

— आराध्य सूत्र · #5

इसी विषय के और सूत्र

सभी संगति →
संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति