Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Attachment & Detachment

अनासक्ति

630 सूत्र · पृष्ठ 5 / 9

जंगल में रहकर महलों की चाह की अपेक्षा महलों में रहकर जंगल का चिंतन भी अच्छा है।
अनासक्ति
उतनी विषयों के सेवन में सुखानुभूति नहीं होती, जितनी विषयों की कल्पना करने में सुखानुभूति होती है।
अनासक्ति
चार अंधे कामांध, क्रोधान्ध, लोभान्ध, मदान्ध।
अनासक्ति
जो मोही मुनि राग के कारण मुनीम का कार्य करने लगता है उसे कभी मोक्ष नहीं मिलता है। मुनीम गिनता तो बहुत है पर उसे मिलता बहुत कम है। यश के पीछे अरहंत मुद्रा का अपयश करना माँ को वेश्या बनाने जैसा है।
अनासक्ति
सुन्दर वस्तु का होना भी सुन्दर शत्रु को जन्म देना है, नारायण प्रति नारायण का झगड़ा प्रारम्भ सुन्दर वस्तु से ही होता है।
अनासक्ति
संयोग में जितना सुख होता है वियोग में उससे सौ गुना ज्यादा दुःख होता है, अतः संयोग को शाश्वत मानकर अति राग मत करो क्योंकि राग ही आग है।
अनासक्ति
जितने अपरिचित रहोगे, उतने सुखी रहोगे। जब शादी नहीं हुई थी, तब मात्र आपको अपने घर का कष्ट समझ में आता था, शादी के बाद अब दस जगह के दुःखों में सम्मिलित होना पड़ता है। विषयों की मिठास में जिनमुद्रा धारण नहीं कर पाये, एक क्षण के सुख के पीछे भव-भव की शान्ति चली गयी।
अनासक्ति
सम्बन्ध स्वभाव के लिए घातक हैं, एक भक्त बढ़ जाये तो भी विकल्प बढ़ जाता है।
अनासक्ति
शरीर के विनाश होते ही सब सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं, फिर क्यों पर सम्बन्ध के पीछे आत्म शान्ति को खो रहे हो?
अनासक्ति
सम्बन्धों से साधना का ह्रास होता है।
अनासक्ति
परिग्रह, परिचय और परिणय से ही मोक्ष में बाधा है।
अनासक्ति
शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि से अपना सम्बन्ध न रखना ही सच्चा एकान्त है।
अनासक्ति
जो हाथ से छूटे वह त्याग और जो हृदय से छूटे वह वैराग्य, त्याग और वैराग्य में यही अंतर है।
अनासक्ति
कुल की रक्षा के लिए एक मनुष्य का, ग्राम की रक्षा के लिए कुल का, देश की रक्षा के लिए गाँव का और आत्म कल्याण के लिए सारी पृथ्वी का त्याग कर देना चाहिए।
अनासक्ति
जिसका स्वतः वियोग हो रहा है, उसके संयोग की इच्छा का त्याग कर दें–इसका नाम 'योग' है।
अनासक्ति
मुझको मिल जाये, यह भोग है और दूसरों को मिल जाये, यह योग है।
अनासक्ति
देश बदला, भेष बदला, नाम बदला, निवास बदला पर जिन भावों को बदलने के लिए ये सब बदला वे नहीं बदले तो कुछ नहीं बदला।
अनासक्ति
हम साधु के सामने इसलिए सिर झुकाते हैं कि उनमें त्याग का बल है।
अनासक्ति
त्याग और उपलब्धि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
अनासक्ति
अधिकांश लोगों को सन्त चरणों में आकांक्षा ही झुकाती है।
अनासक्ति
आकांक्षा की अग्नि में सुख की आहूति देना मूर्खता है।
अनासक्ति
आकांक्षा अशान्ति का कारण है।
अनासक्ति
आकांक्षा ही पाप की जननी है। अहंकार पाप का जनक है।
अनासक्ति
तुम्हारा अन्तिम ध्येय शान्ति है, उसे प्राप्त करने का उपाय त्याग और तप है।
अनासक्ति
मनुष्य खुद तो भोगी बनता है, पर दूसरों को त्यागी देखना चाहता है, यह अन्याय है। यदि उसे त्यागी अच्छा लगता है तो वह खुद त्यागी क्यों नहीं बनता?
अनासक्ति
यदि आप कुछ पाना चाहते हैं तो आपको कुछ-न-कुछ त्याग करना ही पड़ेगा।
अनासक्ति
सच्ची प्रतिष्ठा और सम्मान के लिए सम्पत्ति की जरूरत नहीं, उसके लिए त्याग व सेवा ही काफी है।
अनासक्ति
त्याग के सिवा संसार में कोई दूसरी शक्ति नहीं है।
अनासक्ति
माया को छोड़ने वाला व्यक्ति समस्त सिद्धियों का स्वामी बन जाता है।
अनासक्ति
सच तो यह है कि त्याग मार्ग से दूर रहकर सुख पाने की परिकल्पना मात्र बन्ध्या के पुत्र सी निरर्थक है।
अनासक्ति
पैसे का त्याग आसान है सुविधा का त्याग करना कठिन है।
अनासक्ति
विराट को पाने के लिए क्षुद्र को छोड़ना पड़ता है जैसे महल को बनाने के लिए झोपड़ों को मिटाना ही पड़ता है।
अनासक्ति
त्याग से अनेक प्रकार के सुख उत्पन्न होते हैं, इसलिए अगर तुम उन्हें अधिक समय तक भोगना चाहो तो शीघ्र त्याग करो।
अनासक्ति
त्याग का मतलब यह नहीं कि मोटे और तंग वस्त्र धारण कर लिए जाएँ त्याग तो यह है कि अपनी प्रतिष्ठा, इच्छाओं को जीता जाए।
अनासक्ति
कोई भी त्याग बदले की भावना से नहीं करना चाहिए।
अनासक्ति
त्याग के बिना स्वाधीनता की प्राप्ति नहीं होती है।
अनासक्ति
जितना भी भीतर से त्यागोगे, उतना ही सुख पाओगे।
अनासक्ति
परमात्मा की मंजिल वैभव की सीढ़ियों से नहीं तप-त्याग-संयम की पावन सीढ़ियों से प्राप्त होती है।
अनासक्ति
अगर इन्द्रिय सुख की इच्छा है तो पाप करना न चाहते हुए भी पाप होगा, इन्द्रिय सुख की इच्छा ही पाप करना सिखाती है, अतः पापों से छूटना हो तो इन्द्रिय सुख की इच्छा का त्याग करो।
अनासक्ति
राग इंसान को शैतान बना देता है। वैराग्य इंसान को महान् बना देता है ॥ त्याग से डरने वालों को शायद पता नहीं है। त्याग इंसान को भगवान् बना देता है ॥
अनासक्ति
मिलने से नहीं त्यागने से माँगना (याचना) मिटता है।
अनासक्ति
मोही मुनि से निर्मोही गृहस्थ और मोही गृहस्थ से निर्मोही जानवर मोक्षमार्गी हैं।
अनासक्ति
जो संत के कहने पर त्याग नहीं करते उन्हें फिर डॉक्टरों के कहने पर त्यागना पड़ता है।
अनासक्ति
ख्याति के त्याग के उपदेश में यदि ख्याति का उद्देश्य रहा, तब व्रती का वेश निरर्थक है।
अनासक्ति
त्याग वही उत्तम है जिसमें पर की प्रतीक्षा व आशा न करनी पड़े।
अनासक्ति
सर्व का त्याग ही सुख है सर्व संग्रह करने वाले सुखी नहीं हो सकते हैं।
अनासक्ति
राग-द्वेष का त्याग ही सच्चा त्याग है, केवल भेष तो दम्भ है और परवस्तु के त्याग से ही संतुष्ट हो जाना मिथ्या अन्धकार है।
अनासक्ति
परद्रव्य के संसर्ग के त्याग में शान्ति और सुख है।
अनासक्ति
पर द्रव्य के भोग, संयोग में नहीं तत्सम्बन्धी इच्छा के अभाव से सुख होता है।
अनासक्ति
जिसको त्याग के संस्कार हैं, उसे त्याग में सुख मिलता है।
अनासक्ति
छोड़ने में आनंद आता है और छूटने में कष्ट होता है, अतः सब छूटे उसके पहले ही सब छोड़ देना चाहिए।
अनासक्ति
यदि कामना और वासना का त्याग न हो तो सब व्यर्थ है।
अनासक्ति
मुक्ति के इच्छुक को विषयों को विष के समान छोड़ देना चाहिए।
अनासक्ति
रागी जीव कभी मरना नहीं चाहता यहाँ तक कि नाली का कीड़ा भी, इसलिए निर्ग्रन्थ साधु सबसे पहले राग छोड़ते हैं।
अनासक्ति
संसार में तो सुख के लिए बहुत कुछ जुटाना पड़ता, कमाना पड़ता, संग्रह करना पड़ता, परन्तु आत्मिक सुख के लिए सब कुछ छोड़ना पड़ता है।
अनासक्ति
जैसे श्लेष्म में पड़ी मक्खी मर जाती है, वैसे ही परिग्रह में पड़ा साधु भी मर जाता है।
अनासक्ति
पुद्गल के टुकड़ों का राग जिनमुद्रा को बदनाम व बर्बाद करता है।
अनासक्ति
उदार मनुष्य के लिए धन तृण के समान है, शूरवीर के लिए मरना तृण के समान है, विरक्त के लिए पत्नि तृण के समान है और निस्पृह व्यक्ति के लिए सारा जगत् ही तृण के समान है।
अनासक्ति
कोई मनुष्य त्याग किए बिना सुख नहीं पाता, त्याग किए बिना परमात्मा नहीं बनता, त्याग किए बिना निर्भय सो नहीं सकता, इसलिए तुम भी सब कुछ त्याग कर सुखी हो जाओ।
अनासक्ति
मनुष्य ने जो वस्तु छोड़ दी है, उससे पैदा होने वाले दुःख से उसने अपने को मुक्त कर लिया है।
अनासक्ति
अपने पास कुछ भी न रखना यही व्रती का नियम है एक वस्तु को भी अपने पास रखना मानो उन बन्धनों में फिर आ फँसना है जिन्हें मनुष्य एक बार छोड़ चुका है।
अनासक्ति
यहाँ भी मनुष्य को स्थिर सुख प्राप्त हो सकता है, यदि वह अपनी इच्छा का ध्वंस कर डाले, क्योंकि इच्छा ही सबसे बड़ी विपत्ति है।
अनासक्ति
वस्त्र उतरा वासना नहीं उतरी, कमाना छोड़ा कामनाएँ नहीं छूटी, भाइयों को छोड़ा भक्तों से दूर नहीं हुए तो भी आत्मानुभूति का आनंद नहीं आयेगा।
अनासक्ति
जिसे आगे स्वप्नवत् मालूम करना पड़ेगा उसे वर्तमान में स्वप्नवत् समझो तो महती शान्ति प्राप्त होगी, इष्ट समागम में हर्षभाव की तपस्या करने वालों के अनिष्ट समागम में विषादाभाव की तपस्या करना सरल है।
अनासक्ति
रागी मनुष्यों को वन में भी दोष उत्पन्न होते हैं और पंचेन्द्रिय निग्रह वाले को घर ही तपोवन होता है वैरागी के निष्पाप क्रिया करने से घर भी तपोवन जैसा होता है।
अनासक्ति
अनुकूलता प्रतिकूलता में राजी-नाराज होना साधक के लिए खास बाधक है, राग-द्वेष ही हमारे असली शत्रु हैं, राग ठंडक है, द्वेष गर्मी है, दोनों से ही खेती जल जाती है।
अनासक्ति
चारित्र तथा दान करने वाले सम्यग्दृष्टि जीव मुक्ति की इच्छा करते हैं अन्य सुख की नहीं जिस प्रकार गृहस्थ बीज बोता है तो उससे बहुत फल की इच्छा करता है तृणादिक की नहीं। ''इन्द्र, चक्रवर्ती पद विनश्वर है।''
अनासक्ति
नौका जल में रह सकती है किन्तु जल नौका में नहीं रहना चाहिए उसी प्रकार साधक संसार में रहें किन्तु संसार का माया मोह साधक के मन में न रहे।
अनासक्ति
प्रेम के मात्र चार दुश्मन हैं–लोभ, मोह, अहंकार और अधिकार है।
अनासक्ति
मिले को अपना न समझो मुक्ति स्वतः सिद्ध है।
अनासक्ति
बाह्य प्रसिद्धि के प्रसंगों से दूर भागने वाला ही ब्रह्म ज्ञानी होता है।
अनासक्ति
प्रशंसा का विष संन्यास को बदनाम कर देता है। प्रशंसा का अमृत संन्यास को मृत बना देता है।
अनासक्ति
शान्त चित्त वाले मनुष्यों को स्थाई हित के लिये वैराग्य ही प्रिय होता है।
अनासक्ति
मद को चढ़ाने वाले कोदों को खाकर, मत्त हुये पुरुष की तरह, मोह से ढका ज्ञान स्वभाव को प्राप्त नहीं होता है, ज्ञान का सागर मोह की ओट में दिखाई नहीं देता है।
अनासक्ति
विविध भाव के जीव हु, दीखत हैं जगमांहि। एक कछु चाहे नहीं, एक तजे कछु नाहीं।।
अनासक्ति