Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 243

संयम संस्कृत सदन।

33 सूत्र

जो जीव हीन संहनन के होने पर भी चारित्र का पालन करता है उसे उत्कृष्ट संहनन की अपेक्षा हजार गुणा ज्यादा फल मिलता है।
चरित्र
रत्नत्रय के प्राप्त होने पर जगत में सब वैभव प्राप्त हो जाता है, इसके विपरीत यदि रत्नत्रय नष्ट हो गया है तो लोक के सब रत्नों का सङ्ग्रह नष्ट हो गया है, ऐसा समझना चाहिए।
धर्म
उसी ने जन्म का फल व जीवन की सार्थकता को प्राप्त किया है, जिसने इस प्रशंसनीय पवित्र रत्नत्रय को प्राप्त किया है।
धर्म
जिन शासन में तीर्थंङ्कर भी क्यों न हो, वस्त्रधारी सिद्ध नहीं होते, नग्नता ही मोक्ष का मार्ग है, शेष सभी उन्मार्ग हैं।
धर्म
विषयासक्त मन कर्म बन्ध का कारण है, विषय विरक्त मन मोक्ष के लिए कारण है, अतः मनुष्य का मन ही बन्ध और मोक्ष का कारण है, एक मन नर से नारायण और एक मन नर से नारकी बना देता है, राम–रावण की तरह।
मन
इस दुःखमा काल में भी रत्नत्रय से शुद्ध होकर आत्मा का ध्यान करके लौकान्तिक देव एवं इन्द्र बनकर वहाँ से च्युत होकर मोक्ष प्राप्त करते हैं।
ध्यान
करने योग्य कार्य करना ही चाहिये भले ही प्राण कण्ठगत हो जाएँ, और नहीं करने योग्य कार्य को नहीं करना चाहिये भले ही प्राण कण्ठगत हो जाएं।
चरित्र
हिंसा ही नरक का घोर द्वार है, हिंसा ही गहन अन्धकार है इसलिये समस्त प्राणियों की दया से युक्त एक अक्षर का ज्ञान भी अच्छा है।
अहिंसा
आहार, निद्रा, भय, मैथुन, मनुष्य और पशु में समान होते हैं, किन्तु मनुष्य में ज्ञान विशेष होता है इसलिए ज्ञान से हीन मनुष्य को पशु के समान कहा है।
ज्ञान
अव्रती रहकर नरक में जाने की अपेक्षा व्रती बनकर स्वर्ग में जाना अच्छा है, क्योंकि जैसे छाया और धूप में प्रतीक्षा करने वालों में बहुत अन्तर होता हैं वैसे ही नरक व स्वर्ग में रहकर मोक्ष की प्रतीक्षा करने वालों में बहुत अंतर होता है।
धर्म
एक लक्ष्य निश्चित करके उसमें मन को एकाग्र करना चाहिये, क्योंकि संयम पूर्वक किया गया अभ्यास शीघ्र ही सिद्धि को देता है।
पुरुषार्थ
एक निगोदिया जीव के शरीर में द्रव्य प्रमाण की अपेक्षा सिद्धों से अनन्तगुणे और सम्पूर्ण भूतकाल के जितने समय होंगे उतने जीव होते हैं।
ज्ञान
ऐसे अनन्त जीव हैं, जिन्होंने आज तक त्रस पर्याय को प्राप्त नहीं किया, भावों की कलुषता के कारण वे निगोदवास को नहीं छोड़ते हैं।
कर्म
चरणों की पूजा होती है, मस्तक की नहीं, क्योंकि आचरण प्रधान है।
चरित्र
संयम के साथ ज्ञान भी मूल्यवान होता है।
संयम
परमार्थ से संयम वही है जहाँ दयाधर्म है।
अहिंसा
संयमधर्म संसार के बन्धनों को काटकर प्राणियों को मुक्ति प्रदान करता है।
संयम
अनावश्यक कार्य छोड़ना आवश्यक कार्य ग्रहण करना मुक्ति का कारण है।
संयम
सिर मुण्डन की अपेक्षा मन मुण्डन कठिन है, स्वर्ण को जितना तपाओ, उतना खरा उतरेगा, उसी प्रकार जितना संयम है उतना मोक्ष के निकट है।
संयम
अठ्ठाईस इन्द्रिय विषयों के विरोधी, अठ्ठाईस मूलगुण संसार के बन्धन को छेदकर मुक्ति दिलाते हैं।
संयम
यदि इन्द्रिय सम्बन्धी विषयों का दमन कर लिया है, तो पुरुषों की शूरता, गम्भीरता, उदारता, ध्यान, अध्ययन और तप सभी सार्थक होते हैं।
संयम
महावीर की कहानी- पुरूरवा भील ने मद्य, मांस, मधु के त्याग से प्रारम्भ की, और बढ़ते–बढ़ते तीर्थंङ्कर महावीर बन गया।
आहार
व्याघ्री ने तन खाया- व्याघ्री ने सुकौशल स्वामी को खाया और कीर्तिधर मुनि का उपदेश सुनकर प्रायश्चित्त से रो–रो कर भीग गयी और संयम धारण कर स्वर्ग गयी, मुनि भक्षी व्याघ्री भी संयम के प्रभाव से स्वर्ग चली गयी तथा असंयम से क्षायिक सम्यग्दृष्टि श्रेणिक नरक गया था।
संयम
संयम आचरण के चारों ओर लगायी जाने वाली बाड़ी है।
संयम
संयम के साथ थोड़ा भी ज्ञान मूल्यवान है पर संयमी विद्याध्ययन करें।
ज्ञान
अव्यवस्थित मन किसी व्यवस्था को जन्म नहीं देता है, सङ्कल्प लेने से विकल्प मिट जाता है।
मन
मोक्ष मार्ग शरीर आश्रित नहीं आत्म आश्रित है, एवं सङ्कल्प में शक्ति होती है।
पुरुषार्थ
सत्पुरूष प्राण जाने पर भी अपनी प्रतिज्ञा से विचलित नहीं होते हैं।
चरित्र
आज तक आयु और नोकर्म की निर्जरा की है, पर कर्म निर्जरा का लक्ष्य होना चाहिए।
कर्म
संसारिक सुख पर पदार्थ के आलम्बन से होता है, पर आनन्द स्वाधीनता में है।
अनासक्ति
बचपने में मुनिपना चल सकता है पर मुनिपने में बचपना नहीं चल सकता है।
संयम
जिसका वर्तमान उज्ज्वल होता है उसका भविष्य नियम से उज्ज्वल होता है।
पुरुषार्थ
साधारण व्यक्ति से राजा, राजा से व्यन्तर, व्यन्तर से ज्योतिषी, ज्योतिषी से भवनवासी,
Misc.