Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 69

साहित्य साधने का सदन है

128 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

कमजोर व्यक्ति से दुश्मनी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि वह उस समय वार करता है, जब हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
विवेक
आपके अशुभ भाव ही आपके शत्रु हैं।
मन
दुश्मनों की मदद दिल से कीजिए क्योंकि कहते हैं बदला लेना बुजदिलों का काम है।
क्षमा
शान्ति चाहिए तो अपने काम से काम रखें एवं लोक प्रियता से बचें।
संतोष
शास्त्र वही श्रेष्ठ है जो संसार सागर से पार होने की शिक्षा दे, ग्रन्थ वही नेक है जो निर्ग्रन्थ बनने की प्रेरणा दे, बाकी जो संसार से बांधे वह शास्त्र नहीं शस्त्र हैं।
ज्ञान
जिनवाणी बदला लेना नहीं बदल जाना सिखाती है।
क्षमा
जो पुस्तकें हमें सबसे अधिक सोचने के लिए विवश करती हैं, वे हमारी सबसे अधिक सहायक होती हैं।
ज्ञान
कुमार्गगामी गुरु का त्याग करना चाहिए।
संगति
वह स्थान मन्दिर है जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक किन्तु चेतना युक्त देवता निवास करते हैं। सच्ची शिक्षा का लक्ष्य बुद्धिमत्ता के साथ चरित्र का विकास करना है।
ज्ञान
चाहता तो है हर रोज सुबह आपको अनमोल खजाना भेजूँ पर मेरे दामन में दुआओं के अलावा कुछ भी नहीं है, सलामत रहें आप और आपकी मुस्कुराहट, खुशी से बीतें दिन हर सुहानी रात हो, जहाँ बढ़ें कदम खुशियों की वर्षात हो।
Misc.
समस्त जीवों का उपकारी होने से तथा समीचीन धर्म की खान की वृद्धि का कारण होने से गृहस्थों के लिए जिनालय की प्रतिष्ठा के समान कोई पुण्य नहीं है।
भक्ति
जहाँ चैत्यालय होता है वहाँ कितने ही गुणवान मनुष्य पूजा के द्वारा प्रतिदिन पुण्य उपार्जन करते हैं, कितने ही स्तुति करते हैं कितने ही बुद्धि मान उत्तम चंदोबा, दीप, धूप, कलश, झारी तथा घंटा आदि देकर दर्शन करते हैं तथा मुनिराजों का श्रेष्ठ आश्रय भी जिनालय होता है।
भक्ति
परीषह, कषायादि के जीतने में इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने में मनुष्य की शूरवीरता है परन्तु कर्म सन्तति को बढ़ाने वाले काम के युद्ध में कोई शूरवीरता नहीं है।
संयम
दूसरों की आँखों में आँसू भरने वाले क्यों भूल जाते हैं कि उनकी भी दो आँखें हैं।
अहिंसा
ज्ञान के लिए किया जाने वाला कर्म, सभी कर्मों में श्रेष्ठतम है।
ज्ञान
जिस व्यक्ति में कल्पना है पर विद्वत्ता नहीं, उसके पंख हैं परन्तु पैर नहीं हैं।
ज्ञान
शास्त्रों से विहीन घर खिड़कियों से विहीन भवन के समान है।
ज्ञान
जो देशों में भ्रमण करता है और जो विद्वानों के सान्निध्य में रहता है, उसकी बुद्धि जल पर पड़े तेल के समान विस्तृत हो जाती है नहीं तो जल में पड़े जमे घी के समान संकुचित रहती है।
ज्ञान
आयु बढ़ने से, यश फैलने से, बार-बार प्रश्नों को पूछने से, गुरु के साथ रहने से, स्वयं ही अच्छी तरह विचार करने से, अच्छे लोगों के साथ वार्तालाप करने से, मन में प्रेम भाव बढ़ाने से और अनुकूल स्थान में वास करने से मनुष्य की बुद्धि परिपक्व हो जाती है।
ज्ञान
अध्ययन आनन्द, अलंकरण तथा योग्यता के लिए उपयोगी है।
ज्ञान
अक्षरों का उच्चारण ऐसे ढंग से करना चाहिए जैसे व्याघ्री कोमल बच्चों को दाँतों से पकड़े हुए भी उन्हें गिराने और कटने से बचाती हैं।
ज्ञान
सौ वर्ष जीने के लिए अपने चारों ओर जवान और हँसमुख मित्र रखो।
संगति
बिना सोचे समझे खर्च करने वाला, असहाय रहते हुए झगड़ा करने वाला एवं सब जगह व्याकुल रहने वाला पुरुष शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
विवेक
जब तक शरीर स्वस्थ और नीरोग है, जब तक बुढ़ापा दूर है, जब तक सभी इन्द्रियों में भरपूर शक्ति है, जब तक प्राण शक्ति क्षीण नहीं हुई है, तभी तक अपने आत्म कल्याण और उत्थान का प्रयत्न करते रहना बुद्धिमानी है, अन्यथा घर में आग लग जाने पर कुंआ खोदने से क्या लाभ?
पुरुषार्थ
अच्छा स्वभाव शहद की मक्खी की तरह है, जो प्रत्येक झाड़ी से शहद ही निकालती है।
चरित्र
मधुर स्वभाव वास्तव में एक जादू है, धन की अपेक्षा इसकी शक्ति अधिक है हीरे मणियों से बढ़कर इसका मूल्य है। मधुर स्वभाव एक सुगन्ध है, जिसका सौरभ धरती को स्वर्गीय सुरभि से भर देता है।
चरित्र
चंदन घिसे जाने पर अधिक सुन्दर गंध छोड़ता है, गन्ना चूसने पर स्वादिष्ट लगता है, सोना जलाने पर सुंदर वर्ण ही रहता है, वैसे ही प्राणान्त होने पर भी उत्तम व्यक्तियों का स्वभाव विकृत नहीं होता है।
चरित्र
अतिथि सत्कार से विमुख होना ही बड़ी दरिद्रता है और मूर्खों की असभ्यता को सह लेना ही बड़ी वीरता है।
दान
भले ही भुजाओं में बल न हो पर मस्तिष्क में ज्ञान तो होना ही चाहिए।
ज्ञान
बुद्धिमान पुरुष ज्ञानवान होने पर भी बिना पूछे या अन्यायपूर्वक पूछने पर किसी को कोई उपदेश न करें जड़ की भाँति चुप-चाप बैठे रहें।
वाणी
ईमानदार होना, 'दस' हजार में 'एक' के बराबर होना है।
चरित्र
बड़ी से बड़ी सम्पत्ति ईमानदारी के सामने तुच्छ है।
चरित्र
प्रसिद्ध होने के बजाय ईमानदार होना अधिक अच्छा है।
चरित्र
दया दो तरफी कृपा है, इसकी कृपा दाता पर भी होती है और पात्र पर भी।
दान
शिक्षित मनुष्य अशिक्षित मनुष्यों से उतने ही श्रेष्ठ हैं, जितने जीवित मनुष्य मृतकों से श्रेष्ठ है।
ज्ञान
स्वभाव एक उपार्जित गुण है उसमें शिक्षा और सत्संग से सुधार हो सकता है।
चरित्र
मनुष्य ने जगत् में जो कुछ सत्य और सुंदर पाया है और पा रहा है उसी को साहित्य कहते हैं।
ज्ञान
साहित्य, संगीत और कला में जिनकी रुचि नहीं होती ऐसे मनुष्य बिना सींग-पूँछ वाले निरे पशु होते हैं।
ज्ञान
जिस किसी को गम्भीर और ठोस साहित्य सेवा करनी है, उसे अपने समय की बचत करनी पड़ेगी, चाहे आगंतुकों के साथ उसे अशिष्टता का बर्ताव ही करना पड़े।
समय
केश श्वेत होने से कोई वृद्ध नहीं होता, जो युवा होते हुए भी अध्ययन शील है, देवगण उसी को वृद्ध श्रेष्ठ मानते हैं।
ज्ञान
अहंकार, क्रोध, भोग, रोग और आलस इन पाँच कारणों से व्यक्ति शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता है।
ज्ञान
सच्ची शिक्षा तो वह है जिसके द्वारा हम अपने को, आत्मा को, ईश्वर को और सत्य को पहचान सकें।
ज्ञान
जीवन को सफल बनाने के लिए शिक्षा की जरूरत है, डिग्री की नहीं, हमारी सही डिग्री है—हमारा सेवाभाव, हमारी नम्रता, हमारे जीवन की सरलता, अगर यह डिग्री नहीं मिली और हमारी आत्मा जाग्रत नहीं हुई, तो कागज की डिग्री व्यर्थ है।
ज्ञान
शिक्षित के लिए सभी देश और सभी नगर अपने बन जाते हैं।
ज्ञान
साहित्य का लक्षण मनुष्यता ही है, जिस पुस्तक से यह उद्देश्य सिद्ध नहीं होता, जिससे मनुष्य का अज्ञान कुसंस्कार और अविवेक दूर नहीं होता, जिससे मनुष्य शोषण और अत्याचार के विरुद्ध सिर उठाकर खड़ा नहीं हो पाता, जिससे वह छीना-झपटी, स्वार्थ परता और हिंसा के दल-दल से उबर नहीं पाता वह पुस्तक किसी काम की नहीं है।
ज्ञान
ज्ञानी पुरुषों को संसार का भय नहीं होता है।
ज्ञान
पुस्तकालय ऐसा मंदिर है जहाँ प्राचीन संतों के सद्गुणों से परिपूर्ण तथा निर्भ्रान्त पाखण्ड रहित अवशेष सुरक्षित रखे जाते हैं।
ज्ञान
जो व्यक्ति पढ़ता है, लिखता है, सूक्ष्म निरीक्षण करता है, प्रश्न पूछता है और विद्वानों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि सूर्य से कमलनियों के समान विकसित हो जाती है।
ज्ञान
विद्वान् पुरुष सर्वत्र आनन्द में रहता है और सर्वत्र उसकी शोभा होती है, उसे कोई डराता नहीं है और किसी के डराने पर वह डरता भी नहीं है।
ज्ञान
पतित अथवा पथभ्रष्ट होकर भी बुद्धिमान पुरुष पुनः उठ जाता है किन्तु मूर्ख नहीं उठ पाता है।
ज्ञान
आपत्ति उपस्थित होने पर जो उसका प्रतिकार कर लेता है वह बुद्धिमान है।
विवेक
कभी कोई प्रज्ञा से पार नहीं पा सकता है।
ज्ञान
महामति मनुष्य उच्चाभिलाषा रखकर ऊँचे से ऊँचे चढ़ता चला जाता है, जबकि नीच व्यक्ति गिरने के भय से नीचे ही नीचे चला जाता है।
पुरुषार्थ
जो कायर हैं, जिसमें पराक्रम का नाम नहीं है, वही भाग्य का भरोसा करता है, बुद्धिमान लोग तो पुरुषार्थ से उत्कृष्ट पद प्राप्त करते हैं।
पुरुषार्थ
मनुष्य अध्ययन से पूर्ण, वार्तालाप से तत्पर और लेखन से सटीक बनता है।
ज्ञान
अकेला विद्वान् लाखों मूर्खों को जीत सकता है।
ज्ञान
द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अधिक कल्याणकारी है।
ज्ञान
यदि जगत् में आलस्य रूपी अनर्थ न होता तो संसार में कौन धनी मनुष्य या विद्वान् न होता? आलस्य के कारण ही यह समुद्र पर्यन्त पृथ्वी नर-पशुओं से भरी हुई है।
पुरुषार्थ
जो उपदेश नहीं सुनते, वे भर्त्सना सुनने के लिए मजबूर होते हैं।
ज्ञान
जिस उपन्यास को समाप्त करने के बाद पाठक अपने अंदर उत्कर्ष का अनुभव करें, उसमें सद्भाव जाग उठे, वही सफल उपन्यास है।
ज्ञान