Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 69

साहित्य साधने का सदन है

128 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

अज्ञानी को कर्म लिप्त करते हैं, ज्ञानी को कर्म लिप्त नहीं करते हैं, जैसे घी हथेली को लिप्त करता जिह्वा को नहीं।
कर्म
पढ़कर आनन्द के अतिरेक से आँखें यदि गीली न हो जायें तो वह कहानी कैसी?
ज्ञान
शास्त्र कटु औषधि के समान अविद्या रूप व्याधि का नाश करता है, काव्य आनन्ददायक अमृत के समान अज्ञान रूप रोग का नाश करता है।
ज्ञान
सब कुछ नष्ट करने वाला काल भी कवियों की सूक्तियों को नष्ट नहीं करता है।
समय
विद्वानों का उपदेश जिन्हें न तो शब्द ज्ञान है और न अर्थ ज्ञान, उनके लिए भी कर्ण प्रिय होता है।
ज्ञान
क्रमशः एक-एक बूँद गिरने पर कलश भर जाता है, यही रहस्य सभी विद्याओं धर्म और धन के सम्बन्ध में है।
पुरुषार्थ
गुरु के मुख में स्थित विद्या गुरु की भक्ति से प्राप्त होती है।
भक्ति
गुरु शिष्य को यदि एक अक्षर भी पढ़ा देता है, तो दुनिया में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जिसको देकर शिष्य ऋण रहित हो सकता है।
ज्ञान
अध्ययन करने वाले का मूर्खत्व और जप करने वाले का पाप नहीं रहता है।
ज्ञान
सभी लोग स्वभाव से ही ज्ञान चाहते हैं।
ज्ञान
जिस प्रकार सदा माँजा जाने वाला दर्पण निर्मल रहता है, उसी प्रकार ज्ञान अभ्यास से पुरुषों की बुद्धि निर्मल रहती है।
ज्ञान
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह कुछ भी नहीं है।
ज्ञान
मन रूपी हाथी को वश में करने के लिए ज्ञान अंकुश के समान है।
मन
बुद्धिमान बनने के लिए आगामी कल तक टाल-मटोल न करें, हो सकता है कि तुम्हारे लिए कल का सूर्य कभी उदित ही न हो।
समय
प्रकृति की अपेक्षा अध्ययन के द्वारा अधिक मनुष्य महान् बने हैं और अध्ययन केवल एकान्त में किया जाता है।
ज्ञान
आज पढ़ना सब जानते हैं, पर क्या पढ़ना चाहिए, यह कोई नहीं जानता है।
ज्ञान
जिसे पुस्तक पढ़ने का शौक है, वह सब जगह सुखी रह सकता है।
ज्ञान
पढ़ने से सस्ता कोई मनोरंजन नहीं, न कोई खुशी उतनी स्थायी है।
ज्ञान
जो पुस्तकें तुम्हें सबसे अधिक सोचने के लिए विवश करती हैं, वे पुस्तकें तुम्हारी सबसे बड़ी सहायक हैं।
ज्ञान
ईमानदार मनुष्य स्वभावतः स्पष्ट भाषी होता है, उसे अपनी बातों में नमक मिर्च लगाने की जरूरत नहीं होती है।
वाणी
हम संसार को गलत पढ़ते हैं और कहते हैं कि वह हमें धोखा देता है।
विवेक
पुस्तकों की कीमत रत्नों से भी अधिक है क्योंकि रत्न बाहरी चमक-दमक दिखाते हैं जबकि पुस्तकें अन्तःकरण को उज्ज्वल करती हैं।
ज्ञान
अगर आपके पास दो रुपये हैं तो एक रुपये से भोजन और एक रुपये से अच्छी पुस्तक खरीदें, भोजन जीवन देगा, अच्छी भोजन जीवन जीने की कला देगी।
ज्ञान
पुस्तक पास में हो तो मित्रों की कमी नहीं खटकती है।
ज्ञान
पुस्तकें विचारों के युद्ध में अस्त्र का काम करती है।
ज्ञान
यदि कोई पुस्तक पढ़ने के योग्य है तो वह खरीदने के योग्य भी है।
ज्ञान
सिर्फ पुस्तकें पढ़ने से कुछ नहीं सीखा जा सकता, जब तक कि उन पर मनन न किया जाये।
ज्ञान
पुस्तक से रहित कमरा आत्मा से रहित शरीर के समान है।
ज्ञान
आज के लिए और सदा के लिए सबसे बड़ा मित्र हैं अच्छी पुस्तकें।
ज्ञान
रात-रात भर प्रार्थना करने कि अपेक्षा एक घंटा दूसरों को ज्ञान देने में खर्च करना अधिक अच्छा है।
ज्ञान
वह व्यक्ति बुद्धिमान है, जो उन वस्तुओं के लिए दुःखी नहीं होता, जो उसके पास नहीं है, बल्कि उनसे प्रसन्न होता है जो उसके पास है।
संतोष
जब भाग्य अनुकूल होता है तब जिनके बारे में कुछ सोचा नहीं गया है, ऐसी सब सम्पत्तियाँ अपने आप आ जाती हैं।
समृद्धि
जहाँ नदी गहरी होती है, वहाँ जल प्रवाह अत्यन्त शांत व गंभीर होता है उसी प्रकार गुणवान पुरुष शांत व गंभीर होता है।
विनम्रता
वह लेखक सबसे अच्छा लिखता है, जो अपने पाठकों का सबसे कम समय लेकर उन्हें सबसे अधिक ज्ञान देता है।
ज्ञान
लेखनी तलवार से अधिक शक्तिशाली होती है।
ज्ञान
जिस मनुष्य का व्यवहार मधुर होता है, उसका कोई विरोध नहीं करता जो किसी से द्वेष नहीं करता, उसे किसी प्रकार का भय नहीं होता है ऐसे मनुष्यों को अनेकों सुख स्वयमेव मिलते रहते हैं।
चरित्र
मैले बर्तन में डाला साफ पानी भी मैला हो जाता है, वैसे ही मैले मन में अच्छे विचार भी मैले हो जाते हैं।
मन
संसार में न कोई तुम्हारा मित्र है और न शत्रु है, तुम्हारा अपना विचार ही शत्रु और मित्र बनाने के लिए उत्तरदायी है।
मन
कटा हुआ वृक्ष भी बढ़ने लगता है, क्षीण हुआ चन्द्रमा भी पुनः बढ़कर पूरा हो जाता है इस बात को समझकर संत पुरुष अपनी विपत्ति से नहीं घबराते हैं।
पुरुषार्थ
विपत्ति में भी जिस हृदय में सद्ज्ञान उत्पन्न न हो, वह एक ऐसा सूखा वृक्ष है जो पानी पाकर पनपता नहीं बल्कि सड़ जाता है।
ज्ञान
विद्वान् की संसार में प्रशंसा होती है, विद्वान् सारे भूमंडल का गौरव है, विद्या से सभी कुछ मिल जाता है और विद्या की सभी जगह पूजा होती हैं।
ज्ञान
विद्वान् कभी अपशब्द का प्रयोग नहीं करता है।
वाणी
ज्ञान प्राप्त करने के लिए श्रद्धावान होना आवश्यक है उसके साथ इन्द्रिय संयम भी, तब शीघ्र ही शान्ति की प्राप्ति होती है।
ज्ञान
आजकल शिक्षा तो रोटी कमाने का एक धंधा सा हो गया है, यह शिक्षा नहीं, मजदूरी है, उससे राष्ट्र की उन्नति नहीं, उलटे अवनति ही होगी।
ज्ञान
ऐसे माता-पिता शत्रु के समान हैं, जो अपनी संतान को पढ़ाते नहीं, उनको शिक्षित व संस्कारित नहीं करते।
परिवार
अशिक्षित बालक किसी सभा में जाने पर उपेक्षित रहता है, जैसे हंसों के बीच बगुला।
ज्ञान
शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य व्यक्तित्व का विकास कर आत्म निर्भर बनना है।
ज्ञान
संसार में जितने प्रकार की प्राप्तियाँ हैं, उनमें शिक्षा सबसे बढ़कर है।
ज्ञान
विदेशी माध्यम के द्वारा वास्तविक शिक्षा असंभव है।
ज्ञान
जो अहंकारी को शिक्षा देता है उसे स्वयं शिक्षा की आवश्यकता है।
विनम्रता
सज्जन चाहे फटे हाल ही हो, बड़प्पन के पूरे ठाठ वाले दुर्जन से अधिक शक्तिशाली होता है।
चरित्र
सच्चे आदमी को हम धोखा नहीं दे सकते क्योंकि उसकी सच्चाई हमारे हृदय में उच्च भावों को जागृत कर देती है।
सत्य
जिसका शरीर बलवान और हृष्ट पुष्ट है परन्तु जिसके मन में बुरी वासना, काम, क्रोध, लोभ, घृणा, द्वेष, वैर, हिंसा, अभिमान, कपट, ईर्ष्या, स्वार्थ आदि दुर्गुण और दुष्ट विचार निवास करते हैं, वह कदापि नीरोग नहीं है, उसकी शारीरिक नीरोगता बहुत ही जल्द नष्ट हो जाती है।
स्वास्थ्य
स्वाभिमानी मनुष्य मर मिटता है, पर किसी के सामने दीन नहीं बनता है आग बुझ भले ही जाये, पर जीवित रहते वह ठंडी नहीं होती है।
चरित्र
दिनों के फेर से तु खट्टा होकर मत बैठ क्योंकि संतोष रूपी अमृत से संतुष्ट मनुष्य के लिए सतत् सुख और शान्ति के द्वार खुले रहते हैं एवं सतोष स्वर्ग प्राप्ति से बढ़कर है।
संतोष
स्वाध्याय ज्ञान, संयम और आत्म विकास का सर्वोत्तम साधन है।
ज्ञान
चाहे राजा हो या किसान, जो अपने घर में शान्ति पाता है वही सबसे सुखी है।
संतोष
सुख संतोष में मिलता है विलासता में कभी नहीं मिल सकता है।
संतोष
कोयल का सौन्दर्य उसके स्वर में है, स्त्री का सौन्दर्य उसके पतिव्रत धर्म में है, कुरूपों का सौन्दर्य विद्या में है और तपस्वियों का सौन्दर्य क्षमा में है।
चरित्र
सुंदरता मनोभावों पर निर्भर करती है, माता अपने कुरूप बालक को भी सुन्दर समझती है।
परिवार