Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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परिवार

320 सूत्र · पृष्ठ 4 / 5

जिस घर में प्रेम होता है वहाँ सफलता और धन स्वयं चलकर आते हैं।
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माँ सबकी जगह ले सकती है लेकिन एक माँ की जगह कोई नहीं ले सकता मुफ्त में सिर्फ माँ बाप का प्यार मिलता है इसके बाद दुनिया में हर रिश्ते के लिए कुछ न कुछ चुकाना पड़ता है।
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आँसू पौंछकर हँसाया है मुझे, मेरी गलती पर भी सीने से लगाया है मुझे कैसे प्यार न हो ऐसी माँ से, जिसने सच्चा जीना सिखाया है मुझे।
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जिस बेटे को बाप बचपन में बोलना सिखाता है, वही बेटा पचपन की उम्र में बाप को चुप रहना सिखाता है।
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जो वाणी मित्रों रिश्तेदारों के सामने निकलती है, वही परिवार वालों के सामने निकले तो घर स्वर्ग बन जाये। ''जिस वाणी में स्व-पर हित निहित हो वही सार्थक है।''
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रिश्ते पंछियों की तरह होते हैं, जोर से पकड़ो तो मर सकते हैं, धीरे से पकड़ो तो उड़ सकते हैं, लेकिन प्यार से पकड़कर रखो तो जिन्दगी भर साथ में रहते हैं।
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दोषों को भूलकर भाइयों पर स्नेह एवं बन्धुओं पर प्रेम स्थापित करना चाहिए, पत्नि-पति से मधुर तथा कोमल शब्द बोले, मातापिता के प्रति पुत्र निष्ठावान हो, माता-पिता और बहन का दु:ख प्राण देकर भी दूर करना चाहिए।
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अपने माता-पिता के पैर छूने में जिन्हें शर्म आती है, यश: कीर्ति भी उनके पास आने में शर्माती है।
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एक बार पड़ोसन ने सास से पूँछा आपके घर की शान्ति का राज़ क्या है? सास ने कहा हमारी बेटी शक्कर है और बहु नमक के समान है, बहु ने सुना तो उसके व्यवहार में अन्तर आ गया, सास ने बहु से पूछा! बेटा क्या तुम्हारा स्वास्थ्य खराब है? बहु ने कहा कुछ नहीं हम तो पराये घर से आए हैं इसलिए नमक के समान हैं, और आपकी बेटी शक्कर के समान है, तब सास ने कहा! हमारा अभिप्राय यह था कि जैसे शक्कर पर्व के दिनों में विशेष रूप से काम आती है, उस प्रकार बेटी का कभी-कभी सुख मिलता है, किन्तु जैसे नमक प्रत्येक पदार्थ में काम आता है, वैसे ही हमारी बहु है, तब बहु प्रसन्न हुई, सही ज्ञान के अभाव में झगड़ा होता है।
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बच्चों को श्रृंगार देते हैं संस्कार नहीं, सम्पत्ति देते हैं पर शान्ति नहीं, हम उन्हें सब कुछ देते हैं पर श्रेष्ठ जीवन नहीं और नीम का बीज बोकर आम की आशा करते हैं।
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बच्चों को जङ्गल के पौधे की तरह स्वाश्रित बनायें न कि घर के गमले की तरह पराधीन, ताकि उन्हे कोई पानी भी न दे तब भी वे अपने बलबूते फल-फूल सकें। केवल अच्छी बातें नहीं अच्छे काम भी करना चाहिए।
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सारे विश्व को अपना परिवार समझकर सदैव मुस्कराइये इससे आप हर समय सकारात्मक रहेंगे।
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कुछ समय केवल अपने परिवार के लिए सुरक्षित रखिए और उन्हें अपने शब्दों तथा कार्यों से यह जताइये, कि आप उन्हें प्यार करते हैं और वे आपके लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।
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पहले दिन अतिथि कहलाता है दूसरे दिन बोझ लगता है तीसरे दिन काँटे जैसा चुभता है।
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जिस भवन में अतिथि के चरण नहीं पड़ते, वह भवन 'वन' बन जाता है, वहाँ सत्कार का लोप हो जाता है।
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कुलीन कन्या कुरूप भी हो तो विवाह कर लो, सुन्दर होने पर भी असंस्कारित हो तो विवाह मत करो।
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जल्दवाजी के विवाह में जीवन भर पश्चाताप करना पड़ता हैं।
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वृद्धों को भार समझने की अपेक्षा अपना भाग्य समझें, बूढ़ा वृक्ष फल दे या न दे पर सघन छाया तो देता ही है।
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बुढ़ापे में सबसे बड़ी पीड़ा अपने अङ्गो के शिथिल होने की नहीं बल्कि सम्बन्ध शिथिल होने की होती है।
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अपनी बेटियाँ धनवान को नहीं धर्मवान को देना चाहिए।
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अपनों में सिर्फ अच्छाइयाँ ही न ढूँढे उनकी खामियाँ भी स्वीकार करें, उन्हें सहने और बदलने की प्रेरणा भी दें।
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पुत्र पर कर्जा छोड़ने वाला पिता शत्रु है, व्यभिचारिणी माता-पुत्र की शत्रु है, रूपवान स्त्री-पति की शत्रु है, मूर्ख पुत्र-पिता का शत्रु हैं।
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पुत्र एक कुल को तारता है, पुत्री दो कुलों को तारती है।
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बुद्धिमान जनक ने सीता को कुलवधू के ये धर्म बतलायें कि पति के आने पर खड़े हो जाना, उनके साथ नम्रता से बात करना, उनके बैठ जाने पर चरणों में दृष्टि रखना, उनकी सेवा स्वयं करना, उनके सो जाने पर सोना, उनके उठने से पहले उठ जाना।
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जिसके घर में माता नहीं हैं, प्रिय बोलने वाली स्त्री नहीं हैं, उसे जङ्गल में चले जाना चाहिये क्योंकि जैसा जङ्गल वैसा घर।
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पाँच वर्ष तक लाड़-प्यार करना चाहिए, दस वर्ष डांटकर संस्कारित करना चाहिए और सोलह वर्ष के बाद पुत्र के साथ मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए।
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कुम्भकार मिट्टी का घड़ा बनाकर उसे तपने के लिये भट्टा में रख देता है, पकने के पहले उसमें पानी की एक बून्द भी नहीं पड़ने देता, और पकजाने पर जल घड़े का कुछ बिगाड़ नहीं पाता, उसी प्रकार माता-पिता बच्चों को कठोर अनुशासन में रखते हैं, तो वे बड़े होने पर बिगड़ नहीं पाते हैं।
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जन्म से बाटल में दूध पीने वाला, जीवन में पानी हो या शराब बाटल से ही पियेगा, माँ-बाप ने बच्चों को नौकरों के हाथ थमा दिया, तो वे भविष्य में नौकर ही बनेगें।
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पिता-पुत्र में, पति-पत्नि में, भाई-बहिन में, गुरू-शिष्य में स्वर्ग-नरक व्यवहार से ही बनता है।
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पुरुष गुस्सा करना छोड़ दे और स्त्री जिद करना छोड़ दे तो घर में खुश हाली छा जाये।
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ससुराल में बेटी को कोई भला-बुरा कह दे तो सह लेती है, और यदि उसके माँ-बाप को कुछ कहा, तो झाँसी की रानी बन कर सामने आती है, इधर बेटों के सामने बहु सास-ससुर से कुछ कह दे, तो निकम्मे बेटे चुप्पी नहीं तोड़ते हैं।
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बूढ़े को घण्टी का सहारा-चौथी मञ्जिल पर बूढ़े पिताजी को रुका दिया एक घण्टी रख दी, छाती के ऊपर छप्पर पर एक रस्सी बाँध दी, उठना हो तो रस्सी का सहारा ले कर उठ जाना, खाने की इच्छा हो तो घण्टी बजा देना, चार साल का बच्चा घण्टी उठा लाया, तीन दिन तक किसी को ख्याल नहीं आया, चौथे दिन बूढ़े पिता की लाश मिली।
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जिसके सिर पर माँ-बाप का हाथ, वह कभी नहीं होता अनाथ। सद्गुण होते उसके साथ, दुनिया में होता ऊँचा उसका माथ॥
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यूज एंड थ्रो का ज़माना है, लोग वस्तु को प्रयोग करके फेंकते हैं, लेकिन लोगों ने यह नियम माँ-बाप के साथ भी बना लिया है, अपना स्वार्थ सिद्ध करके बृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं।
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नौ माह माँ ने गर्भ में रखा, लेकिन वह बेटा माँ को फ्लेट में भी नहीं रख पाता है।
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कपूत का जबाव, माँगा माँ से दवा का हिसाब- बेटा बोला, माँ मैंने तुम्हारी साड़ी और दवाई में इतना खर्च किया है उसका बिल दो, माँ ने कहा बेटा तुम्हें याद नहीं मैंने तुम्हारे लिये कितना खर्च किया, नौ माह पेट में रखा, गर्मी, ठण्डी, वर्षा में स्वयं न सोकर तुम्हें सुलाया भूखे रहकर तुम्हे खिलाया, मैं गीले में तुम्हे सूखे में सुलाया, सभाओं में अपमान सहा, मैंने तुमसे कभी बिल नहीं माँगा?
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जिस प्रकार घड़ा बनने पर यदि अग्नि में नही पकाते हैं तो पानी नही भर सकते, उसी प्रकार सन्तान को उत्पन्न किया पर संस्कार नहीं दिया तो कच्चे घड़े की तरह काम में नहीं आएगी।
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बच्चे गुरुओं (माता-पिता-गुरु) से संस्कार पाते थे तो गुरू बनते थे, अब नौकरों से संस्कार पाते हैं तो नौकर बनते हैं।
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डॉक्टर या डाकू- माँ बेटे को डाकू भी और डॉक्टर भी बना सकती है, घड़ा जब तक कच्चा है, तब तक चोट सहता है, पकने के बाद नहीं, एक बच्चे ने स्कूल से पेन चुरा लिया, घर आया तो माँ ने मुस्करा दिया, माँ की मुस्कराहट से वह आगे चलकर डाकू बन गया, फाँसी की सजा हुयी, अन्तिम इच्छा माँ के दर्शन की प्रकट की, माँ जैसे ही पास में आयी लड़के ने उसकी नाक काट दी, पूँछा ऐसा क्यों किया? उसने कहा मुझे माँ ने डाकू बनाया है, इसलिये फाँसी मेरी नही इनको होना चाहिए, जिस दिन मैं पेन चुराकर लाया था, तब माँ ने डाँटा नहीं मुस्कराया था, अगर उसी दिन डांटा होता तो मैं दुबारा चोरी करने का साहस नहीं कर सकता था।
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दस लाख पाठक जो संस्कार डालते हैं, उतने संस्कार एक पिता डाल सकता है, एक लाख पिता जो शिक्षा देते हैं वे एक माता दे सकती है।
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मिट्टी के बर्तन- पत्नी के कहने से बेटे ने माँ-बाप को खेत में रखा, एवं उनको मिट्टी के बर्तनों में भोजन देता था, जब उसके बेटे ने देखा, तो वह भी अपने पापा के लिए एक साथ मिट्टी के वर्तन ले आया, पापा के पूँछने पर उसने कहा! आपके लिए जरुरत पड़ेगी इसलिए ले आया हूँ, सुन कर वह डर गया, एवं अपने माँ-बाप को घर लाकर प्रेम से सेवा करने लगा।
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बुढापे में माँ-बाप आँखों से अन्धे होते हैं, पर हृदय से अन्धे नहीं होते हैं।
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आप कुछ भी पढ़ लो, अपनी भाषा सीखो, माँ की भाषा समझो। लड़का पढ़ लिख कर आया, माँ ने गले लगाया, आँसु बहाये, आशीर्वाद दिया, लड़का ट्राँसलेटर से पूँछता है, ये क्या कह रहीं हैं? उसने समझाया 'my dear son'। इतनी योग्यता तो हो कि अपनी माँ की भाषा को समझ सके।
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पुत्र जन्म लेते ही यौवन हरण कर लेता है, बाल्यावस्था में भोजन बटा लेता है, समर्थ होने पर धन हर लेता है, पुत्र के समान बैरी कोई नहीं होता है।
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वृद्धावस्था में स्त्री का मरना कष्टकारी होता है, यदि शरीर में रोग हो तो और दुर्दशा होती है, पुत्र मिष्ट वचन नहीं बोलते हैं, उनकी स्त्रियाँ दूर से भागती हैं, नाती पास में नहीं आते तथा अत्यधिक कटु वचन बोलते हैं।
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बेटी से माँ कहती है, तुम काम मत करो, ससुराल से थककर आई हो। बेटी कितना भी खाये, माँ यही कहेगी, बेटी कुछ खाती ही नहीं, वही माँ बहु के लिये कहती है न जाने कहाँ से आयी राक्षसी खाती है ढेर सारा, काम कुछ नहीं करती। बहु को उदार दृष्टि से देखें और अवगुणों को भी गुण समझें, सम्यग्दृष्टि सास वही है जो बहु-बेटी दोनों को समान देखे, सम्यग्दृष्टि बहु वह है जो माँ और सास को एक जैसा देखे।
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वात्सल्य से सफेद खून- माँ का बच्चे के प्रति इतना वात्सल्य होता है, कि उसके स्तन में दूध आ जाता है और तीर्थंङ्कर का तीनों लोकों के जीवों के प्रति वात्सल्य होता है इसलिये उनके पूरे शरीर में रक्त दूध जैसा होता है।
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भरत जी ने रामचन्द्र जी की खड़ाऊ सिंहासन पर रखकर राज्य किया था, किन्तु आज एक अङ्गुल जमीन के लिए भाई अपने ही भाई को हथकड़ी डलवा देता है।
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जन्म लेने मात्र से मातृभूमि का ऋण चढ़ जाता है, तब नौ माह गर्भ में रखने वाली माँ का ऋण कितना होगा?
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लोक में माँ के समान कोई हितकारी नहीं है जो माँ को ठुकराते हैं वे जीवन में उन्नति नहीं कर पाते हैं।
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समस्त रिश्तों में माँ का रिश्ता नौ माह बड़ा होता है।
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एक माँ का दिल है जो दुनिया में मुफ्त में दुआ देता है, पत्नि तलाक दे सकती है पर माँ नहीं।
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हमारा रिश्ता माँ से प्रारम्भ होता है- जैसे आसमाँ, धरती माँ, जिनवाणी माँ, गौ माँ और भारत माँ।
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माँ की पूजा होती है, क्योंकि माँ और परमात्मा के शरीर में दूध रहता है, पृथ्वी माँ से दूध की नदियाँ बहती हैं, गौ माँ मीठा दूध देती है।
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आज का बेटा माँ के साथ ऐसा व्यवहार करता है जैसे फटा पुराना सामान कोने में डाल देते हैं।
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भगवान् बनने के बाद भी माँ को याद करते हैं, वामादेवी, त्रिशलानन्दल, कौशल्यानन्दन, मरूदेवी के लाल।
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माँ ने तुम्हे मात्र दूध से नहीं पाला गर्भ में नौ माह खून से पाला है, तभी तो कहते हैं 'हमारा खून है'।
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कुत्ता तोता को पालता-पालने वाले को नहीं पालता- आज की औलाद कुत्ते, तोते आदि जानवरों को तो पालती है पर पालने वाले माँ-बाप को नहीं पालती है, एक माँ-बाप कह रहे थे काश हम कुत्ता होते तो बेटे-बहु के हाथ का खाना तो मिलता।
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माँ की महिमा वरणी न जाय- विवेकानन्द जी से किसी ने पूछा आप अपनी माँ के गीत क्यों गाते रहते हो, उन्होंने अपनी पगड़ी उतारी और कहा, उस पत्थर को पगड़ी में बाँध कर नौ घण्टे पेट में बाँधो और घूम कर आओ, वह घबरा गया, मैं तो नौ मिनट भी नहीं बाँध सकता, तब उसे माँ की महिमा समझ में आई।
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माँ-बाप सन्तान को बुढ़ापे की लाठी समझते हैं पर वही लाठी माँ-बाप का सिर फोड़ देती है।
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माँ एक रानी अनेक- माँ बाप के इतने उपकार होते हैं कि सात जनम तक स्वयं के शरीर की चमड़ी के जूते बनाकर पहनाओ तो भी नहीं चुकेंगे। रानी छयानवें हजार हो सकती हैं पर माँ एक ही होती है।
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माँ-बाप जिसको बोलना सिखाते हैं, बुढ़ापे में उसके सामने खाँसने-बोलने में डरते हैं।
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बाप दूल्हा राजा कहता है, माँ नजर उतारती है, बेटा उन्हीं माँ-बाप को नजरों से उतारकर सीढ़ियों से नीचे उतार देता है, कहता है कि! माँ-बाप ने मेरे लिये क्या किया? ये शब्द बोलना भी उन्हीं ने सिखाया है और कचराघर में नहीं फेंका, बड़े-बड़े योद्धा कंस, कर्ण जैसे नदियों में बहा दिये गये, तुम्हें नहीं बहाया ये क्या कम है।
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एक माँ बाप पाँच-छः बच्चों को पाल लेते हैं, पर पाँच-छः बच्चे एक माँ बाप को क्यों नहीं पाल सकते हैं?
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कृष्णजी ने रूक्मणि से दूध माँगा और सो गये, वह दूध रखकर चली गयी, बोली जब नींद खुले तब पी लेना, एक बार यशोदा माँ से माँगा और सो गये, माँ सारी रात बैठी रही बेटे को पहले दूध पिलाऊँगी फिर सोऊँगी, ये माँ और पत्नि में अन्तर होता है।
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माँ-बाप को दो बार नरक तुल्य पीड़ा होती है, एक बार बेटी की विदा हो जब, दूसरा बेटा मुख मोड़े तब।
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काल चक्र सबको निचोड़ देता है, बेटा आश्रम में लाके माँ-बाप को छोड़ देता है।
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माँ-बाप मन्दिरों में जा के दुआ माँगते हैं, तब कहीं जाकर सन्तान का जन्म होता है। बेटा माँ-बाप को दवा भी लाके नहीं देता है।
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कुत्ता एक रोटी खाता है और रात-दिन वफादारी करता है, किन्तु हम माँ के दूध के थोड़े भी वफादार नहीं है।
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दौलत को कहते हैं इसमें मेरा अधिकार है, माँ बाप को नहीं कहते कि इनकी सेवा सुरक्षा करना मेरा अधिकार है, श्रवणकुमार का आदर्श अन्धे माँ-बाप को कांवर में बिठाकर तीर्थ यात्रा करायी थी, श्रवण ने कहा था मेरे माँ-बाप आँखो से अन्धे हैं पर हृदय से नहीं।
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पत्नि, मित्र और भगवान् का भी चुनाव हो सकता है पर माँ-बाप का नहीं।
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बूढ़े माँ बाप को जीते जी तो शूल चुभाये, मरने पर अर्थी पर फूल चढ़ाए।
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झगड़े का कारण- अपने बेटे को बड़ा गन्ना, भाई के बेटे को छोटा गन्ना देने से भाई-भाई में झगड़ा प्रारम्भ हो जाता है।
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जो योग्य पात्र में त्याग करने वाला हो, 2.गुणों में राग करने वाला हो, 3.भोग में परिजनों के साथ रहता हो, 4.शास्त्रों का ज्ञाता हो और 5.युद्ध में योद्धा हो वही पाँच गुणों को धारण करने वाला पुरुष कहलाता है। उस सेठ की स्त्री का नाम जिनदत्ता था, वह जिनदत्ता भी परम धार्मिक, सम्यक्त्वादि गुणों से सहित, दक्षता आदि गुणों के समूह से मूर्तिमान, लक्ष्मी के समान तथा समस्त लक्षणों से युक्त थी, जैसा कि कहा है- '1.जो आज्ञा कारिणी हो, 2.सन्तुष्ट हो, 3.दक्ष हो, 4.साध्वी हो, 5.पतिव्रता हो तथा 6.विदुषी हो इन गुणों से युक्त स्त्री लक्ष्मी ही है इसमें संशय नहीं है।' जिनदत्ता यद्यपि इस प्रकार के गुणों से विशिष्ट थी, परन्तु बन्ध्यात्व नामक दोष से युक्त थी, किसी भी उपाय से उसको पुत्र नहीं हुआ था, एक दिन अवसर पाकर उसने अपने पति से कहा! पुत्र के विना कुल सुशोभित नहीं होता है, तथा वंश का विच्छेद भी हो जायगा, इसलिए सन्तान की वृद्धि के लिए आप दूसरा विवाह करने योग्य हैं, जैसा कि कहा है- 'जवानी, लावण्य, प्रेम, आभूषण इत्यादि सभी सुपुत्र के विना भूसा के सामान है।'
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संसार से थके हुए जीवों के लिए सन्तान, स्त्री और सज्जनों की सङ्गति ये तीन विश्राम की भूमियाँ हैं।
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